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“सनातन का ध्वजारोहण: एक परंपरा”: आचार्य श्री अमिताभ जी महाराज

“सनातन ध्वजारोहण – एक परंपरा”
आचार्य श्री अमिताभ जी महाराज (सुप्रसिद्ध श्रीमद् भागवत कथा व्यास)
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“अनंत काल का संघर्ष तथा उस संघर्ष के समुद्र को पार करके लक्ष्य को प्राप्त कर लेने की प्रतिबद्धता”
यह सब इतना महत्वपूर्ण है कि अयोध्या की राम जन्मभूमि के संदर्भ में राम भक्तों के रक्त से सींची हुई भूमि पर इस अनंत बलिदान की चरम परिणति के रूप में भारतीय न्याय व्यवस्था के न्याय के प्रति प्रतिबद्ध एवं निरपेक्ष दृष्टिकोण के आश्रय से श्री राम मंदिर की स्थापना हेतु राम जन्मभूमि मंदिर अयोध्या की नीव रखी गई।
इस पवित्र स्थान पर जो यह भी घटनाक्रम हुआ, वह सिद्ध करता है कि दीर्घकाल से चल रहे रक्त से सींचे गए जन आंदोलन की आधार भूमि तथा संकल्पना यदि सत्य पर आधारित है, तो उसे सर्वोच्च न्याय व्यवस्था का अभूतपूर्व प्रश्नय भी प्राप्त होता है।
सम्राट विक्रमादित्य के द्वारा बनवाए गए राम जन्मभूमि मंदिर की जो कुछ सीमा तक विलुप्त श्रृंखलाएं हैं, उनसे जब हम थोड़ा आगे बढ़ते हैं, तब उत्तर भारत में तुलसीदास जी महाराज के द्वारा रचित रामचरितमानस ने उत्तर भारत में फैले हुए विधर्मी शासन के मध्य हतोत्साहित सनातन जनों को प्रबुद्धता प्रदान करने के उद्देश्य से एक प्रदीप्त आशा के स्तंभ के रूप में श्री राम – राघवेंद्र सरकार की जिस प्रकार से सनातन हिंदू वर्ग के मस्तिष्क में प्रतिस्थापना की, उसने भगवान श्री राम के प्राचीन काल से चले जा रहे जीवंत स्वरूप को और अधिक तेजस्विता प्रदान की तथा एक संकल्पना के रूप में श्री राम जन्मभूमि को आतताई वर्ग के हाथ से मुक्त करने का जाति – वर्ग एवं समुदाय का अतिक्रमण करते हुए एक समग्र भाव मूर्त रूप में अधिकाधिक प्रबल एवं उग्र होता गया।

इतिहास में ऐसे प्रमाण उपलब्ध हैं जब बैरागी संन्यासियों ने श्री राम के स्थान की प्रतिष्ठा के लिए उस स्थान को अपने रक्त से सींचा है।
कुछ सूत्र यह भी संकेत करते हैं पंजाब से आई निहंगों की टोली ने भी अपने रक्त की आहुति यहां पर अर्पित की है।
अपने रक्त से जन्मभूमि के स्थल पर आहुति अर्पित करने के अंतिम घटनाक्रम के रूप में हम एक विशिष्ट सरकार के समय राम भक्तों पर अनियंत्रित गोलाबारी के फलस्वरूप बलिदान हो गए अनगिनत राम भक्तों को भी अपनी श्रद्धांजलि अर्पित कर सकते हैं।

इस अंतिम बलिदान के उपरांत सहज प्राकृतिक न्याय के आधार पर चिरंतन सत्य की प्रतिष्ठा के रूप में श्री राम जन्मभूमि पर श्री राम लला के भव्य तीर्थ मंदिर के निर्माण की संकल्पना अपने मूर्त होने की दिशा में गतिशील हो गई। अतः यह स्पष्ट है अपना कोदंड हाथ में लेकर के दैत्य, दानव, दनुज का समापन कर देने की उद्घोषणा करने वाले राघवेंद्र सरकार की जन्मभूमि को उनके बलिदानी भक्तों के द्वारा वीर पूजन प्रदान किया गया जिससे उस भूमि की तेजस्विता में और वृद्धि हुई।

राम जन्मभूमि स्थान पर मध्यकाल में हुए आघातों ने एक आंतरिक समाजशास्त्रीय जटिलता की प्रक्रिया को प्रारंभ किया।
शिक्षित हो चाहे अशिक्षित हो सभी सनातनी हिंदुओं ने इस समस्या के समाधान को अपनी अवरुद्ध आध्यात्मिक मुक्ति के मार्ग के प्रशस्त होने के माध्यम के रूप में स्वीकार किया। बाहर दिखाई देने वाले संघर्ष के साथ ही सनातनी हिंदुओं के हृदय में भी उस संघर्ष की निरंतरता बनी रही। अर्थात चाहे सक्रिय हो या निष्क्रिय कोई भी हिंदू हो।
राम जन्मभूमि के विधर्मियों के कब्जे से मुक्ति एवं रामलला के भव्य मंदिर के निर्माण की संकल्पना एक विराट स्वत: आरोपित आत्म निर्णय के रूप में समस्त सनातनी हिंदुओं की अंतस चेतना में निरंतर गतिशील रहने वाले एक लक्ष्य के रूप में स्थापित हो गई।
लगभग 550 साल से चला आ रहा यह संघर्ष अपने सार्थक विराम को प्राप्त होता है।
जब विधिक निर्णय के उपरांत प्राप्त हुई जन्मभूमि पर श्री राम का भव्य तीर्थ मंदिर स्थापित हुआ तथा उसकी पूर्णता के संकेत के रूप में तीर्थ के सर्वोच्च बिंदु पर अद्भुत तथा आध्यात्मिक अर्थवत्ता को संकेत देती हुई ध्वजा का आरोहण हुआ। तब हिंदू मानस के हृदय से वह ग्रंथि गल कर अलग हो गई तथा मानसिक दासता का भाव विगलित हो गया।
इसी अनुक्रम में समग्र रूप से हिंदू जनमानस ने आत्म संतोष की अनुभूति को आत्मा के स्तर पर अनुभव किया।
यद्यपि सनातन के साथ संबंधित कई गांठे और भी हैं जिनका खुलना भी भविष्य के पटल पर सुनिश्चित रूप से परिलक्षित होता है। किंतु समय का निर्धारण संभव नहीं है। यह कब होगा यह तो ठाकुर जी ही जाने!
किंतु एक लक्ष्य पूर्ण हुआ तथा सनातन के मुकुटमणि के रूप में राम जन्मभूमि मंदिर की स्थापना हुई। यह अत्यंत संतोष का विषय है ।
इस पूर्व घटनाक्रम का स्पष्टीकरण यहां पर दिया जाना अत्यंत अनिवार्य है। क्योंकि यह भविष्य में घटित हुए घटनाक्रम के साथ अविभाज्य रूप से संबंधित है।
स्वतंत्र भारत के स्थापित होने के इतने वर्षों के उपरांत चलते रहे दीर्घकालिक विधिक विवाद की चरम परिणति भगवान श्री राम के जन्म स्थान अयोध्या जी में ठाकुर जी के अपने स्थान के रूप में प्रकट हो गई। उसी प्रकार से जैसे पाषाण खंड को भेद करके अग्नि की ज्वाला प्रकट होती है।
अग्नि का मूल स्वभाव ऊष्मा प्रदान करना है, किंतु श्री राम जन्मभूमि पर बने हुए इस अत्यंत तेजस्वी सनातन की ध्वजा के रूप में दीपक स्वरुप प्रतिस्थापित मंदिर से निकली हुई उस अद्भुत ऊष्मा ने सनातनी हिंदुओं के हृदय में शीतलता का संचार कर दिया।
एक दीर्घकालिक संघर्ष अपने सकारात्मक स्वरूप को प्राप्त हुआ। इसमें सब का बहुत योगदान है किंतु भारतवर्ष के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र भाई मोदी की सुनिश्चित संकल्पना तथा इस कार्य को पूर्ण करने के लिए दुर्लभ जैसी प्रतीत होने वाली प्रतिबद्धता मूल कारण के रूप में प्रभावी प्रतीत होती हैं। इसके लिए वह साधुवाद के पात्र हैं।
श्री राम जन्मभूमि तीर्थ स्थल मंदिर के शीर्ष पर ध्वजारोहण के घटनाक्रम ने इस परंपरा की तरफ लोगों का ध्यान आकर्षित किया।
उसी अनुक्रम में भारतवर्ष की वैदिक परंपरा में जब हम अनुशीलन करते हैं तब स्पष्ट होता है ध्वज या ध्वजारोहण का बहुत पारंपरिक धार्मिक और सामाजिक महत्व दीर्घकाल से निरंतरता में स्थापित है। यह अध्यात्म के उस पुंज का प्रतीक है, जो समर्पण के भाव को उत्पन्न करने के साथ-साथ जीवन के प्रति सकारात्मकता को भी आश्रय प्रदान करता है l
किसी भी तीर्थ में प्रवेश के पूर्व उसकी ध्वजा का दर्शन करके उसको प्रणाम करना मंदिर में स्थापित देवता के प्रति भी सम्मान एवं अपने अस्तित्व हेतु उसके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का संकेत है।
कभी-कभी यह रक्षा के आवरण का भी कार्य करती है तथा अपने चतुर्दिक क्षेत्र की सुरक्षा का संकेत भी प्रदान करती है।
सनातन के अंतर्गत विभिन्न देवी देवताओं के पृथक पृथक वाहन एवं ध्वज का विवरण प्राप्त होता है।एक अंतर विरोधी संदर्भ भी है। वैदिक वाङ्मय में केतु को ध्वजा के रूप में अभिहित किया गया है। यह सम्मान का भी प्रतीक है तथा अहंकार का भी, किंतु जब मंदिर के शिखर पर लहरा रही ध्वजा को भक्त प्रणाम करता है, तब ठाकुर जी उसके अहंकार का तो शमन करते ही हैं साथ ही साथ उसके सम्मान को सुरक्षा भी प्रदान करते हैं।
धर्म ध्वजा को दूर से ही देख करके यह स्पष्ट हो जाता था कि यह सनातन के ईश्वरीय स्वरूप का प्रतीक है तथा हमको यहां पर दर्शन करने जाना है।
हमारे शास्त्रीय समुद्र में ऐसे बहुत से उल्लेख प्राप्त होते हैं, जो स्पष्ट करते हैं कि सनातन में स्थापित तीर्थ स्थलों तथा मंदिरों में ध्वज का क्या महत्व है तथा उसकी क्या अनिवार्यता है ? ऋग्वेद , अथर्ववेद के उल्लेखों के अनुसार ध्वज तथा ध्वज स्तंभ का उल्लेख प्राप्त होता है।
इसके कई उद्देश्य हुआ करते थे, जैसे कि दैवी शक्तियों का आवाहन उनके पवित्र आगमन के उद्देश्य से। किसी विशिष्ट उद्देश्य से किए जाने वाले यज्ञ स्थल की पहचान को सुनिश्चित करना तथा नकारात्मक शक्तियों से मुक्त हो जाने हेतु भी इनका प्रयोग होता था।
स्कंद पुराण के अनुसार कहते हैं देवस्थान के शीर्ष पर जब ध्वज की स्थापना होती है तब उसके लहराने से शुभता की वृद्धि होती है तथा नकारात्मकता शांत हो जाती है। हमारे विविध ग्रंथ संग्रह यथा अग्नि तथा गरुड़ पुराण , विष्णु धर्म उत्तर पुराण आदि में भी मंदिर के द्वार और शिखर पर ध्वज आरोहित किए जाने का उल्लेख मिलता है।
कहां तक उल्लेख किया जाए? वैखानस आगम, मारकंडेय संहिता , कश्यप संहिता के अंतर्गत भी ध्वज की स्थापना की अपरिहार्यता को स्पष्ट किया गया है। पांचरात्र आगम की उद्घोषणा है कि ध्वजारोहण विजय और मंगल का प्रतीक है।
भविष्य पुराण का संदर्भ है। जिस देवालय पर ध्वज की स्थापना न हो, तो उल्लेख करना थोड़ा अनुचित और कठिन है, तब वह मंदिर श्मशान भूमि तुल्य ही होता है।
श्रीमद्भागवत, पद्म पुराण, स्कंद पुराण, विष्णु पुराण, इन सभी पुराण ग्रंथ में ध्वज का वर्णन प्राप्त होता है। वैष्णव मंदिर में गरुड़ ध्वज तथा शिव मंदिर में वृषभ ध्वज का उल्लेख प्राप्त होता है।
हमारे सामने आज भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने वाले उदाहरण प्रकट है। रामेश्वरम ,श्रीरंगम ,सोमनाथ, द्वारिका, जगन्नाथ पुरी आदि – आदि प्रमुख मंदिरों में बहुत कर्मकांड और बहुत विराट स्तर पर ध्वजारोहण की प्रक्रिया का अनुपालन किया जाता है।
जगन्नाथ जी में तो रोज ही ध्वजा बदली जाती है।
जब हम ध्वजा के इन प्राचीन संदर्भों का उल्लेख कर रहे हैं तब महाभारत में उल्लिखित ध्वजा से संबंधित संदर्भों का वर्णन करने के लोभ से स्वयं को कैसे संवरित कर पाएंगे ?
पांचो पांडवों के ध्वजों का वर्णन महाभारत के द्रोण पर्व के अध्याय 23 में किया गया है। यह पूर्ण रूप से स्पष्ट है।
युधिष्ठिर का ध्वज नक्षत्र से युक्त चंद्रमा को प्रदर्शित करता था।
अर्जुन के ध्वज पर हनुमान जी का चिन्ह था। जिसके कारण उसे कपिध्वज भी कहा जाता था।
भीष्म के ध्वज पर ताड़ के वृक्ष और पांच तारों का चिन्ह था।
नकुल के ध्वज पर लाल हिरण का चिन्ह था।
सहदेव के ध्वज पर चांदी से जड़ा हुआ हंस बना था।
अभिमन्यु के ध्वज पर पीले पत्तों से युक्त एक वृक्ष था।
द्रोणाचार्य के ध्वज पर एक यज्ञ बेदी का प्रतीक चिन्ह था।
महारथी कर्ण का ध्वज स्वर्ण हाथी की रस्सी से युक्त था तथा अन्य शूरवीरों के इसी प्रकार के उल्लेख प्राप्त होते हैं।
इन ध्वजों का एक गंभीर अंतर निहित अर्थ भी है।जैसे अर्जुन का कपिध्वज हनुमान जी महाराज के आशीर्वाद को संकेत करता है।
महाभारत के संदर्भ का उल्लेख इसलिए अपरिहार्य है क्योंकि यह स्पष्ट करता है जिस प्रकार से ध्वज की परंपरा आध्यात्मिक एवं धार्मिक परिवेश में अत्यंत महत्वपूर्ण कर्म एवं कर्मकांड के रूप में स्थापित है।
उसी प्रकार से व्यावहारिक एवं सामाजिक जीवन में भी संबंधित व्यक्तियों के व्यक्तित्व के मूल्यांकन तथा सामर्थ्य के संकेत हेतु भी ध्वज का प्रयोग अनिवार्य सा ही था।
यहां पर एक बात बड़ी अद्भुत है कि किया जाने वाला ध्वजारोहण संपूर्ण मंदिर के निर्माण के उपरांत होने वाले उत्सव का उद्घोष है। जबकि शिखर पूजन उस निर्माण की चरम परिणति है।
जहां तक श्री राम के वंश की ध्वजा का प्रश्न है, उस पर कोविदार वृक्ष का अंकन है। वस्तुत: यह कचनार का वृक्ष है। मान्यता है इस वृक्ष को महर्षि कश्यप ने पारिजात और मंदार को मिलाकर बनाया था।
बैगनी रंग के अत्यंत सुगंधित फूलों से युक्त इस वृक्ष की पौराणिक उत्पत्ति उसे अत्यंत दिव्यता प्रदान करती है। अतः इसे रामध्वज में सम्मिलित किया गया है।
अगर वैज्ञानिक रूप से विचार करें तो यह प्राचीन काल का पहला हाइब्रिड वृक्ष कहा जा सकता है।
अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर के शिखर पर स्थापित की गई धर्म ध्वजा पर ओंकार, सूर्य तथा कोविदार वृक्ष के प्रतीक अंकित किए गए हैं।
सूर्यवंश होने के कारण सूर्य, सनातन के मूल बिंदु के रूप में ओम तथा वंश की प्रतिष्ठा को प्रसारित करने के साथ ही साथ अपने भक्तों को सुरक्षा का भाव प्रदान करने के उद्देश्य से कोविदार वृक्ष का अंकन किया गया।
25 नवंबर 2025 को भारतवर्ष के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र भाई मोदी के द्वारा राम जन्मभूमि स्थल पर बने हिंदू अस्मिता के प्रतीक विराट राम मंदिर के सर्वोच्च बिंदु पर अद्भुत ध्वजा का आरोहण संपन्न किया गया।

ll धर्मो रक्षति रक्षित: ll का यह एक उत्कृष्ट उदाहरण सिद्ध हुआ। अर्थात धर्म हमारी रक्षा करेगा जब हम उसकी रक्षा करेंगे।
इसके अतिरिक्त राज्य शासन की धर्म के साथ अन्योन्याश्रित संबद्धता शासन को विवेकशील होने का संकेत प्रदान करती है तथा धर्म के माध्यम से जनमानस को प्रबुद्धता एवं विवेक प्रदान करने के मार्ग को प्रशस्त भी करती है।
मैं ठाकुर जी से प्रार्थना करता हूं कि सनातन की अस्मिता एवं सनातन के सम्मान की प्रतीक यह ध्वजा अनंत काल तक इसी प्रकार से लहराती हुई सनातनी हिंदुओं के हृदय में आस्था, समर्पण एवं विश्वास की लहर उत्पन्न करती रहे।
ll शुभम भवतु कल्याण ll
मोबाइल – 941 530 8509
WhatsApp No. 9415308509:
होलिका दहन
2/3 की रात्रि में भद्रा की (पूछ) के भाग अर्थात रात्रि शेष 12:20 से रात्रि शेष 1:28 के मध्य होगा और इसी के साथ होलाष्टक समाप्त हो जाएगा।
ll जय श्री कृष्ण ll

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