
प्रयागराज ।
होली के पावन अवसर पर शहर समता (हिन्दी साप्ताहिक) के होली रंग विशेषांक का लोकार्पण हुआ और होली पर आधारित होली रंग काव्यगोष्ठी आयोजित हुई। इस काव्यगोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ गीतकार अशोक स्नेही ने किया ।उन्होंने इस अवसर पर पढ़ा “रत्ना तुम हो धन्य, प्रेरणा नारी के सर्वस्व दान की। माया तिमिर दूर करने को, नई किरन नूतन विहान की। तुम न लगाती कहीं धर्म के पौधे, इतने पास न होते तुम न सीचती कहीं भांग से तुलसी तुलसीदास न होते।” मुख्य अतिथि डा. शंभुनाथ त्रिपाठी अंशुल एवं विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ कवयित्री जया मोहन रही ।होली रंग विशेषांक का लोकार्पण करते हुऐ सभी ने हर्षोल्लास के साथ होली से सराबोर अपनी अपनी रचनाओं का काव्य पाठ किया। संचालन उमेश श्रीवास्तव ने किया ।इस काव्यगोष्ठी में रचना सक्सेना ने “कौन रंग से खेलूँ होली, भरूँ कौन रंग पिचकारी” केशव सक्सेना ने “यह होली का त्योहार बड़ा रंगीला होता है, प्रकृति में है फूल खिले, खुशियों का दौर होता है”।
संजय सक्सेना ने लिखना “न धुंधले हर्फो में मेरा नाम” उमेश श्रीवास्तव ने “होली पर कोई गीत अगर हो भेज दीजिए मेल पर। इधर उधर की बात लिखी हो भेज दीजिए।
बेल पर” राम कैलाश पाल प्रयाग ने” झूमये सरसो बनी दुल्हनिया चने से करे सगाई , अरहहर सरसों सगी है बहने, मटर बनी भौजाई’ पढ़कर आयोजन को सफल बनाया ।अंत में शहर समता की साहित्यिक संयोजक रचना सक्सेना ने आभार ज्ञापन किया।
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