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‘कबिरा खड़ा बाज़ार में’-4 : हरिकान्त त्रिपाठी

वह नचनियों की तरह लम्बे केश रखने वाला, दुबला-पतला साढ़े चार फुटिया ग़ज़ब का रसिक था । महिलाएं तो उसके इस नगण्य से व्यक्तित्व और भोले विनम्र चेहरे पर लट्टू थीं । उसकी कई महिला मित्र थीं और एक को तो लखनऊ में अलग घर बनवा कर रख भी छोड़ा था उसने । सर्विस में उसने माल तो अच्छा बनाया, पर महिलाओं पर होने वाले खर्च के चलते, वह तबाह ही रहता था ।

संस्मरण: साधो, सारा जग बौराना !
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लेखक: हरिकान्त त्रिपाठी सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं

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* अजय प्रताप मुझसे पीसीएस में जूनियर थे । महराजगंज में मुझसे कई साल बाद एडीएम बने और कदाचित् मेरे बाद उनका ही वहाँ सबसे लम्बा कार्यकाल रहा । मैं पूरे पाँच साल तक वहाँ का एडीएम रह चुका था और वहाँ बच्चों की पढ़ाई के लिए अच्छे स्कूल न होने के कारण मैंने अपने ट्रांसफर के बहुतेरे प्रयास किये पर मेरे एक शुभचिंतक नेता की कृपा से सब विफल हो गये तो मैंने तीन साल बाद एक डेढ़ कमरे का मकान बिजली खर्च सहित कुल १५०० रूपये में किराए पर लेकर वर्ष २००१ में परिवार लखनऊ शिफ्ट कर दिया ।

अजय प्रताप से मेरी सहानुभूति लाज़िमी थी क्योंकि वे बेचारे भी सब असुविधायें झेल चुके थे । वे कोई साढ़े चार से पाँच फुट के दरमियान की उँचाई वाले दुबले-पतले इन्सान हैं और उनके चेहरे पर सदा सरलता और विनम्रता तैरती रहती है । वे जब भी मुझसे मिलते तो अतिविनम्रता दिखाते थे तो धीरे-धीरे वे मुझे बहुत भले व्यक्ति लगने लगे।


मै वर्ष २०१२ में जब शासन में विशेष सचिव खाद्य के पद पर तैनात था तो मुझे नवीन भवन में एक कक्ष आबंटित हुआ था जो अमूमन मंत्रियों को एलाॅट होता था । बड़ा सा कक्ष, साथ में जुड़ा रिटायरिंग रूम और बढ़िया संलग्न वाशरूम देख मेरे मित्रों /बैचमेट्स ने उसे अपनी गपबाजी का अड्डा बना लिया और उसमें अकसर मेरे साथ चार-छ: मित्र बैठे चाय पीते गप मारते रहते थे।

वहाँ अध्यात्म से लेकर राजनीति और अर्थनीति पर बेबाक बहसें होतीं और बड़े से बड़े नेताओं और अधिकारियों पर बिंदास भाषा में स्वस्तिवाचन होता था । कभी कभी तो बहस के दौरान आपस मे भी पकड़ा-पकड़ी की नौबत आ जाती ।

एक दिन अजय प्रताप भी पता नहीं कहाँ से आकर वहां पर बैठ गये और लगभग आधा दिन बैठे रह गये । लंच के लिए जब सब निकलने लगे तो अजय प्रताप ने मुझे रोक कर धीरे से कहा कि उन्हें मुझसे अकेले में कुछ बात करनी है । जब हम अकेले हो गये तो वे बोले कि उन्हें अर्जेंट ६० हजार रुपये की ज़रूरत है और वे उसे दो दिन में वापस कर देंगे । मुझे थोड़ी झिझक हुई क्योंकि रकम मामूली न थी और अजय प्रताप को मैं बहुत निकट से जानता भी न था । कुछ सोचा मैंने और बैंक से घर खर्च के लिये निकाला गया पैसा मैंने अजय प्रताप के हाथ पर रख दिया ।


तीन चार दिन बीत जाने के बाद मैंने अजय प्रताप को फोन किया तो वे बोले कि मैं आ रहा हूँ । एकाध घंटे बाद वे आये तो बोले कि पैसे का इन्तज़ाम अभी नहीं हो पाया और अगले सोमवार को ज़रूर दे देंगे । सोमवार को मैं प्रतीक्षा करता रह गया वे नहीं आये । मंगलवार को मैंने फोन किया तो उन्होंने उठाया ही नहीं । कई दिन फोन करने पर जब वे नहीं उठाये तो मुझे अजीब सा लगा और मैंने मित्रों से इस बारे में चर्चा चला दी ।

मुझे लोगों ने बताया कि अरे उसने तो कितने मित्रों से लाखों की रकम उधार ले रखी है और वह उधार कभी लौटाता ही नहीं । सब मित्र मुझे ही बुरा भला कहने लगे । वे बोले कि अब मैं उस पैसे को भूल ही जाऊँ, वह मेरी किस्मत में नहीं था । बाबा राम विशाल खिल्ली उड़ाते हुए बोले कि आपका पैसा केवल आपके परम मित्र सुधेश ओझा नियुक्ति विभाग में अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर अजय प्रताप पर दबाव डलवा कर वापस करा सकते हैं ।

सुझाव मखौल उडा़ने वाला और अव्यवहारिक था । देवरिया के बैहारी बघेल के बाहुबली बसन्त बघेल बोले कि भैया अगर आप आदेश दें तो अभी मैं उसको पकड़ कर पीटता हुआ आपके पास ले आऊँ। मैंने हँसते हुए बसन्त को मना किया कि रुपये वसूलने के लिए मुझे इसकी आवश्यकता न पडे़गी । बहरहाल मैं इसे निहायत अपमानजनक और बाबा भारती के घोड़े वाले प्रकरण की तरह ठगा हुआ महसूस करने लगा।

जब मैंनै अजय प्रताप के बारे में कुछ ज़्यादा छानबीन की तो विचित्र तथ्य सामने आने लगे । वह नचनियों की तरह लम्बे केश रखने वाला, दुबला-पतला साढ़े चार फुटिया ग़ज़ब का रसिक था । महिलाएं तो उसके इस नगण्य से व्यक्तित्व और भोले विनम्र चेहरे पर लट्टू थीं । उसकी कई महिला मित्र थीं और एक को तो लखनऊ में अलग घर बनवा कर रख भी छोड़ा था उसने । सर्विस में उसने माल तो अच्छा बनाया, पर महिलाओं पर होने वाले खर्च के चलते वह तबाह ही रहता था।

चूँकि बहुत सीधा सादा था तो कुछ महिलाएं उसकी उदारता का फ़ायदा उठा उससे पैसे ऐंठने का काम भी ज़रूर करती रही होंगी । बेचारा किसी को मना तो कर नहीं सकता था सो वह जिन जिन मित्रों परिचितों से जितना भी उधार मिल सकता था लेता रहता था । लौटाने का तो सवाल ही नहीं उठता था अतएव असलियत जानने के बाद पैसे देने वाले भी चार गाली देकर सन्तोष कर लिया करते थे ।

अपने को ठगा महसूस कर और यह सोच कर कि मेरे परिश्रम की कमाई ऐय्याशी में उड़ाई जा रही है, मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था।

इसी दौरान एक दिन न्याय विभाग से वापस लौटते वक़्त अजय प्रताप मुझे बहुखण्डी भवन के गलियारे में मिल गया । वह सकपका कर मुझे नमस्ते सर बोला तो मैने उसे दीवार से सटा बाहों के घेरे में कर लिया । मैंने कहा कि तू अब मेरे पैसे लौटाना तो दूर फोन भी नहीं उठाता , बोल मेरे पैसे कब लौटायेगा ?

वह काँप गया और गिड़गिड़ाते हुए बोला कि सर कल मैं आपके कक्ष में ज़रूर आऊँगा । मैंने कहा सोच लो कल का मतलब सिर्फ़ कल। उसने कहा नहीं सर मैं आर्थिक संकट में हूँ नहीं तो ऐसा क़तई न होता।

अगले दिन फिर मेरे कक्ष में दरबार लगा था और पाँच सात मित्र बैठे बहस कर रहे थे । संयोग से उस दिन बसन्त बघेल भी मौजूद थे । तभी अजय प्रताप भी आकर कक्ष में बैठ गया । उसे देखते ही मुझे लगा कि अब आज तो मेरा पैसा मिल ही जायेगा और मित्रगण भी देख लेंगे कि मुझे कोई ठग नहीं सकता । बसन्त अजय प्रताप को पहिचानते नहीं थे पर पता नहीं कैसे उन्हें आभास हो गया कि यही वह शख़्स है जिसने भैया के पैसे दबा रखा है । बसन्त जोर से भोजपुरी में बोले कि भैया जिसने आपका पैसा दबा लिया था लौटाया कि नहीं, अरे आप आदेश तो दे दीजिये मैं दो मिनट में वसूल लूँगा साले से । मुझे बहुत खराब लगा कि जब अजय प्रताप पैसे लौटाने आ ही गया तो यह बसन्त बिलावज़ह उसे गालियाँ दे रहा है । मैंने बसन्त को इशारे से चुप रहने को कहा । कमरे में बहस चलती रही और चाय के कई दौर हो गये पर अजय प्रताप कुछ बोल ही नहीं रहा था । मैं समझ गया कि वह सबके सामने पैसे लौटाने में संकोच कर रहा है ।

बहुत देर बाद उसके मुँह से आवाज निकली कि सर मुझे कुछ बात करनी है । अब मुझे शतप्रतिशत विश्वास हो गया कि वह अकेले में पैसे लौटाना चाह रहा है । मैं उसे इशारे से रिटायरिंग रूम के अन्दर ले गया । वहाँ पहुँच कर अजय प्रताप बोला कि सर आज पैसे का इन्तज़ाम नहीं हो पाया मैं कल हर हाल में पैसे वापस कर दूँगा । मैं सिर्फ़ आपको इसलिए बताने चला आया कि आपको यह न लगे कि मैं आपसे टालमटोल कर रहा हूँ ।

मेरी आशाओं पर तुषारापात हो चुका था । पर कोई चारा भी न था । मैंने लाचारी से कहा कि जैसे इतने दिन इन्तज़ार किया अब एक दिन और सही । जब कक्ष में वापस लौटा तो एक साथ मित्रों के मुंह से निकला – पैसे लौटाया उसने ? मैंने मरी मरी आवाज में कहा कि नहीं , उसने कल लौटाने को कहा है । सभी लोगों ने जोरदार ठहाका लगाया और बोले कि अब आप यह मानकर सन्तोष कर लीजिए कि वह पैसा आपके भाग्य में नहीं है।

अगले दिन जब मैं पैसे की वापसी को लेकर निराश बैठा था, अजय प्रताप आकर चुपचाप पैसे वापस लौटा गया।

 

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