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श्री दुर्गा सप्तशती कथा तत्व (2): आचार्य अमिताभ जी महाराज

श्री दुर्गा सप्तशती कथा तत्व (2)
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दुर्गा सप्तशती एक अद्भुत तंत्र ग्रंथ है l जो भगवती की उपासना हेतु संकेंद्रित है l इसके सुचिंतित पाठ से आत्म चैतन्य की शक्ति प्राप्ति होने के साथ लौकिक हितों की पूर्ति भी होती है l

किसी ग्रंथ की आंतरिक ऊर्जा तथा रहस्यात्मकता को समझने के पूर्व उसकी विषय वस्तु का ज्ञान होना अत्यंत अनिवार्य है l

सप्तशती व्यक्ति की ऊर्जा को गति प्रदान करते हुए निराशा से आशा की दिशा में गति का संकेत भी प्रदान करती है l

इसी उद्देश्य से उसके मूल संदर्भों का इस द्वितीय अंक में दिग्दर्शन करने का प्रयास करूंगा l
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परम पूज्य संत आचार्य श्री अमिताभ जी महाराज

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भक्ति व मोक्ष की प्रदायक हैं भगवती 

श्री दुर्गा सप्तशती तृतीय अध्याय
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तृतीय अध्याय स्तुति:

जगदम्बा के स्वरूप की कांति उदयकाल के सहस्त्रों सूर्यो के समान है। मुण्ड माला से सुशोभित भगवती रक्त वर्ण की रेशमी साड़ी पहने हैं। वे अपने कर कमलों में जप मालिका, विद्या, अभय तथा वर नामक मुद्राएँ धारण किए हैं। त्रिनेत्रों से सुशोभित मुखारविंद की बड़ी शोभा हो रही है। कमल के आसन पर विराजमान भगवती के मस्तक पर चन्द्रमा के साथ रत्नमय मुकुट बँधा है। ऐसी भगवती को मैं भक्ति पूर्वक प्रणाम करता हूँ।

मेधा ऋषि कहते हैं दैत्य सैन्य के नष्ट होने को देखकर महिषासुर के सेनापतियों चिक्षुर, चामर आदि सेनापतियों ने भगवती के साथ भयंकर युद्ध किया । किन्तु सूर्य के समक्ष नष्ट हो जाने वाले कुहासे के समान वो सब नष्ट हो गए।

अपनी सेना की ये दुर्गति देखकर महिषासुर ने मूलतः भैंसे बन कर अनेकानेक रूपों को धारण करके भगवती से भीषण युद्ध किया। किन्तु भगवती ने अपने चन्द्रहास खड़ग से उसका मस्तक काट दिया। इससे देवता प्रसन्न हुए। उन्होंने दिव्य महाऋषियों के साथ भगवती दुर्गा देवी का स्तवन पूजन किया l
साथ भगवती दुर्गादेवी का स्तवन (पूजन) किया।

चतुर्थ अध्याय स्तुतिः
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सिद्धि की इच्छा रखने वाले पुरुष जिनकी सेवा करते हैं उन जया नाम वाली दुर्गादेवी का ध्यान करें। शत्रुओं को भयभीत करने वाली भगवती के मस्तक पर चन्द्रमा की रेखा शोभा बढ़ाती है। अपने हाथ में शंख, चक्र, कृपाण तथा त्रिशूल धारण करती हैं। उनके तीन नेत्र हैं। सिंह पर आरूढ़ होकर अपने तेज से तीनों लोकों को परिपूर्ण कर रही हैं।

मेधा ऋषि कहते हैं, ‘महिषासुर और उसकी सेना नष्ट होने के उपरांत इन्द्र तथा अन्यान्य देवताओं ने मस्तक झुकाकर भगवती की अद्भुत स्तुति की जो अत्यंत विस्तृत है।

उन्होंने कहा कि सम्पूर्ण जगत को अपनी शक्ति से व्याप्त करने वाली भगवती को हम भक्ति पूर्वक प्रणाम करते हैं। वो सम्पूर्ण जगत का पालन तथा अशुभ भय का नाश करने का विचार करें। वो पुण्यवानों के घर में लक्ष्मी, पापियों के यहाँ दरिद्रता, शुद्ध अंतःकरण वाले पुरुषों के हृदय में बुद्धिरूप,सत्पुरुषों में श्रद्धा तथा कुलीन पुरुषों में लज्जा रूप में निवास करती हैं। उन भगवती दुर्गा को हम प्रणाम करते हैं।

सत्व, रज, तम तीनों गुणों से युक्त होने पर भी आप इससे मुक्त हैं। सम्पूर्ण यज्ञों में जिसके उच्चारण से देवता तृप्त होते ‘हैं वह ‘स्वाहा’ आप हैं। इसके अतिरिक्त पितरों को ‘तृप्त’ करने के कारण आपको ‘स्वधा’ कहा गया है। भगवती परा विद्या आप ही हैं। आप देवी, तीनों वेद तथा षड ऐश्वर्य से युक्त हैं। समस्त शास्त्रों का ज्ञान कराने वाली मेधा शक्ति आप ही हैं। भगवान चन्द्रशेखर द्वारा सम्मानित गौरी देवी आप ही हैं। इस प्रकार से सॉंगोपांग विधि से देवताओं ने भगवती को प्रसन्न किया।

तदोपरांत भगवती ने देवताओं से वर माँगने को कहा। तब देवताओं ने कहा हमारे ऊपर यह कृपा करें, जब हम आपका स्मरण करें तब आप हमारे संकटों को दूर करें। इसके साथ ही जो मनुष्य इन स्तोत्रों द्वारा आपकी स्तुति करे उसे धन, समृद्धि, वैभव प्रदान करने के साथ-साथ जो है। उसकी भी वृद्धि करें।”

पंचम अध्याय स्तुति :

इस उत्तर चरित्र के रुद्र ऋषि,
महासरस्वती देवता, अनुष्टुप छंद, भीमा शक्ति, भ्रामरी बीज, सूर्य तत्व, सामवेद स्वरूप है। महासरस्वती की प्रसन्नता के लिए इसका विनियोग होता है, जो अपने कर कमलों में घण्टा, शूल, हल, शंख, मूसल, चक्र, धनुष और बाण धारण करती हैं। शारद चन्द्र के समान जिनकी मनोहर कांति है। गौरी शरीर से प्रादुर्भूत व त्रिलोकों की आधारभूता तथा शुंभ आदि दैत्यों का नाश करने वाली भगवती महासरस्वती देवी का मैं निरंतर भजन करता हूँ।

मेधा ऋषि कहते हैं कि पूर्वकाल में शुंभ और निशुंभ ने अपनी शक्ति के प्रभाव से त्रिलोक, यज्ञ भाग तथा समस्त देवताओं के संसाधनों का अपहरण कर लिया। पददलित देवताओं ने भगवती अपराजिता का यह सोचकर स्मरण किया कि पूर्वकाल में भगवती ने हमको संकटों से मुक्त करने का वरदान दिया था। इसके बाद गिरिराज हिमालय पर उन्होंने स्तुति प्रारंभ की।

उन्होंने कहा कि समग्र रूप से शरणागतों का कल्याण करने वाली रिद्धि और सिद्धि रूपी देवी को दुर्गा, दुर्गपारा, सारा, सर्वसारिणी, सर्वकारिणी, कृष्णा और धूम्रl देवी को हम नमस्कार करते हैं।

चेतना, बुद्धि, नींद, भूख, छाया, शक्ति, प्यास, क्षमा, जाति, लज्जा, शांति, विश्वास, तेज, लक्ष्मी, वृत्ति, स्मृति, दया, तुष्टि, माँ, भ्रांति, चैतन्य और प्राणियों की इंद्रियाँ वर्ग की अधिष्ठात्री देवी को प्रणाम है l

इस स्तुति काल के दौरान, देवी अम्बा देवी पार्वती के शरीर से प्रकट हुईं, जिन्हें कौशिकी कहा गया। इससे देवी पार्वती का शरीर काला पड़ गया। हिमालय में वह कालिका देवी के नाम से विख्यात हुईं।

शुंभ-निशुंभ के सेवक चंड-मुंड ने भगवती अंबा को देखकर शुंभ को उन्हें अपने अधिकार में लेने की पाप पूर्ण और विनाशकारी सलाह दी। इस आधार पर शुंभ ने महा दैत्य सुग्रीव को भगवती के पास जाकर आत्मसमर्पण करने के लिए कहा।

‘भगवती ने कहा कि ये मेरी प्रतिज्ञा है कि’ जो मुझे संग्राम में पराजित करेगा वही मेरा स्वामी होगा, जाकर शुंभ से कह दो।

षष्टम अध्याय स्तुति :

मैं सर्वज्ञेश्व भैरव के अंग में
निवास करने वाली भगवती पद्मादेवी का चिंतन करता हूँ। नागराज के आसन पर स्थित भगवती की कांति नागमणियों की विशाल माला से कांतिमान हो रही है। सूर्य के समान तेज से युक्त भगवती के त्रिनेत्र उनकी शोभा बढ़ा रहे हैं। वे हाथों में माला, कुंभ, कपाल और कमल लिए हैं और उनके मस्तक पर अर्द्धचन्द्र का मुकुट सुशोभित है।

मेधा ऋषि ने कहा कि दूत के वचन से से क्रुद्ध होकर शुंभ ने दैत्य सेनापति धूम्रलोचन को भगवती को परास्त करने के लिए भेजा। विराट सेना के साथ गए तय धूम्रलोचन दैत्य का भगवती अंबा के साथ भीषण युद्ध हुआ। कालांतर में भगवती ने उसका वध कर दिया। यह के सुनकर इसी कार्य के लिए शुंभ ने चण्ड- मुण्ड नामक दैत्यों को भेजा।

शेष आगामी अंक में l
ll शुभम भवतु कल्याणम ll
ll सर्वे भवंतु सुखिनः ll

आचार्य अमिताभ जी महाराज इलाहाबाद

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