
एक संस्मरण
“…भइया, रामायण छूट रहा है”
रामकृपाल सिंह
अक्सर अखबारों में मुस्लिम मौलानाओं का फतवा पढ़ने को मिलता है कि” मुसलमान हिंदू प्रतीकों और हिंदू धार्मिक आयोजनों से दूरी बनाकर रखें।” इन फतवों को पढ़ने के बाद एक बहुत पुरानी घटना याद आ जाती है।
बात 1988 की है और इलाहाबाद की है। बोफोर्स दलाली कांड में राजीव गांधी और सोनिया के साथ अपना नाम आ जाने के बाद आहत होकर अमिताभ बच्चन ने अपनी इलाहाबाद लोकसभा सीट छोड़ दी थी और राजनीति से हमेशा के लिए नमस्ते कर लिया था।
उन्हीं की खाली की हुई इलाहाबाद सीट पर उप चुनाव हो रहा था। विपक्ष के उम्मीदवार थे- गांधी परिवार पर घूसखोरी का आरोप लगाकर कांग्रेस छोड़ने वाले राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह और कांग्रेस के उम्मीदवार थे- श्री लाल बहादुर शास्त्री के पुत्र श्री सुनील शास्त्री।
इलाहाबाद में कांग्रेस का मुख्य चुनाव कार्यालय तो था ही, एक अतिरिक्त कार्यालय भी था जहां दो काम होते थे। एक तो देश- प्रदेश के प्रमुख मुस्लिम मौलानाओं को बुलाकर क्षेत्र के मुस्लिम इलाकों में प्रचार के लिए भेजा जाता था जिसके प्रभारी प्रदेश सरकार के मंत्री डॉक्टर अम्मार रिजवी थे और दूसरा उसी कार्यालय में पोलिंग के दिन के लिए भी तैयारियां हो रही थी जिसकी जिम्मेदारी मेरे ऊपर थी।
उन्हीं दिनों टी. वी. पर रामायण सीरियल आता था। उस समय सिर्फ एक टीवी चैनल- दूरदर्शन था और कोई दूसरा चैनल नहीं था। दूरदर्शन पर हर रविवार सुबह 9:00 बजे धारावाहिक रामायण प्रसारित होता था। उसकी लोकप्रियता का आलम यह था कि रामायण के ब्रॉडकास्ट के समय सड़कें सूनी हो जाती थी और गलियों में सन्नाटा छा जाता था।
हमारे चुनाव कार्यालय के सभी कार्यकर्ता रामायण देखने बगल की कोठी में चले जाते थे।बच जाता था सिर्फ मैं। चूंकि महत्वपूर्ण चुनाव था और दिल्ली, लखनऊ से आने-वाले टेलीफोन पर बात करना, प्रभारी होने के कारण मेरी जिम्मेदारी थी।
ऐसे ही एक रविवार की सुबह कार्यालय के सभी कार्यकर्ता रामायण देखने बगल की कोठी में जा चुके थे और मैं हाल में अकेला बैठा कुछ काम कर रहा था। इतने में एक मुस्लिम मौलाना बैग हाथ में लिए ऑफिस में आए। उन्हें दोपहर में किसी मुस्लिम इलाके में प्रचार के लिए जाना था।
मौलाना का लम्बा चोंगा, लंबी दाढ़ी, सिर पर काली पगड़ी और माथे पर नमाजियों वाला काला चोंगा- वास्तव में पहुंचे हुए आलिम लग रहे थे।
मैंने उनसे कहा- “मौलाना सामान यहीं रख दीजिए। चाय पीना हो तो बाहर होटल है। आप का कार्यक्रम दोपहर को है।” इतना कहकर मैं पुनः मेज पर झुक कर काम करने लगा।
कुछ क्षण बाद मैंने आंखें उठाई तो देखा -मौलाना सामान रखकर हाल में बड़ी बेचैनी से चहल कदमी कर रहे थे। मैंने पूछा- “मौलाना कुछ परेशान लग रहे हैं, कोई समस्या है क्या?”
” भइया रामायण छूट रहा है।”
मौलाना ने बड़े दयनीय भाव से कहा और मैं बड़े आश्चर्य से उस कट्टर मौलाना का चेहरा देख रहा था और रामायण के लिए उनकी दीवानगी पर चकित था।
मैंने कहा- ” मौलाना परेशान मत होइए। बगल में सफेद कोठी में सब रामायण देखने गए हैं। आप भी चले जाइए।” मौलाना ने मेरा शुक्रिया अदा किया और तेजी से बढ़ लिए।
आज भी जब किसी मौलाना का फतवा आता है कि मुसलमान हिंदू प्रतीकों से दूर रहें तो वही तस्वीर सामने घूम जाती है- लंबी दाढ़ी, लम्बा चोंगा, काली पगड़ी, माथे पर काला निशान और वही बेसब्री की आवाज- “भइया, रामायण छूट रही है।”
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