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“खादी और ख़ाकी का अपवित्र गठबंधन”: वीएन राय IPS

“इन आँखिन देखी” :35: विभूति नारायण राय IPS

…दुर्भाग्य से आज़ादी के बाद हम अपनी पुलिस को नही समझा पाये कि एक लोकतंत्र मे वह जनता की सेवक है और उसे संविधान तथादेश के क़ानूनों का सम्मान करना ही पड़ेगा ।दिक्कत यह है कि जब हमारी सरकारें पुलिस सुधारों या पुलिस आधुनिकीकरण की बातें करतीं हैं तो उनकी चिंता के केंद्र मे मुख्य रूप से वाहन , शस्त्र या संचार जैसे उपकरणों के स्तरों मे बेहतरी ही होती है । सबसे कम ध्यान उस मानसिकता को बदलने पर दिया जाता है जो भारतीय पुलिस को सभ्य और लोकतंत्र के लायक बनने से रोकती है ।…. 

विभूति नारायण राय, IPS

विभूति नारायण राय, IPS

लेखक उत्तर प्रदेश में पुलिस महानिदेशक रहे हैं और महात्मा गांधी हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के कुलपति भी रह चुके हैं

“खादी और ख़ाकी का घालमेल!”

खादी और ख़ाकी के अपवित्र गठ बंधन को लेकर भारत के प्रधान न्यायाधीशएनवी रमनाकी हालिया टिप्पणी से किसी को आश्चर्य नही होना चाहिये । आश्चर्य तब होगा जब इस पर सरकार की तरफ़ से कोई सकारात्मक कार्यवाही होती दिखेगी या पुलिस के आचरण और व्यवहार मे बड़ा परिवर्तन नज़र आने लगेगा ।प्रधान न्यायाधीश ने इस सिलसिले मे एक आयोग भी नियुक्त करने की बात की है । उन्हे किसी ने तो याद दिलाया होता कि आज़ादी के बाद कई आयोग पुलिस सुधारों के लिये नियुक्त किये गये थेऔर उन्होंने दूरगामी परिणामों वाले सुझाव भी दिये थे। कई बार ख़ुद अदालतों ने ऐसे निर्णय दिये हैं कि अगर उनका अनुपालन किया जाय तो पुलिस के चाल और चरित्र मे व्यापक परिवर्तन हो सकता है । आपात काल समाप्ति के बाद तत्कालीन जनता पार्टी की सरकार नेधर्मवीर आयोग नियुक्त किया था जिसने बड़ी मेहनत के बाद संभवतः1860 के बाद के सबसे परिवर्तन कारी सुझाव दिये था पर पर दुर्भाग्य से कई जिल्दों मे फैली उसकी अनुशंसाओं चार से अधिक दशकों से धूल ही जम रही है ।

मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी छत्तीसगढ़ के एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारीजीपी सिंह के संदर्भ मे आयी है जो दूसरे दल की पिछली सरकार के दौरान महत्वपूर्ण ओहदों पर तैनात रहा था और अब सरकार बदलते ही गर्दिश मे आ गया है । जिस समय उसकी गिरफ़्तारी रोकने की याचिका पर मुख्य न्यायाधीश उपरोक्त टिप्पणी कर रहे थे उन्ही दिनो मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह के गिरफ़्तारी से बचने के लिये फ़रार होने की खबरें मीडिया मे गश्त कर रही थीं ।इनदोनो अधिकारियों की एक जैसी कहानियाँ हैं – किसी प्रभावशाली राजनेता की सहायता से मलाईदार तैनातियाँ हासिल करना और फिर एवज़ मे उस राजनेता की हर ग़लत सलत अपेक्षा को पूरा करने के लिये ग़ैर पेशावराना आचरण करना । देखना होगा कि मुख्य न्यायाधीश की इस टिप्पणी के बाद कितना कुछ बदलाव आता है ।

पिछले दिनों लखीमपुर खीरी मे प्रदर्शन कारी किसानों के साथ जो घटना घटी वह खादी और ख़ाकी के इसी गठजोड़ का नमूना है । इस समय एक वीडियोवायरल हो रहा है जिसमे एक आम सभा मे स्थानीय सांसद और मंत्री खुले आम किसानों को धमकी दे रहे हैं । यदि क़ानून सम्मत कार्यवाही करनेवाली पुलिस होती तो उनके इस वीडियो की जाँच होती और सच पाये जाने पर उनके ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्यवाही की जाती । इज़राइल या फ़्रांस मे पुलिस अपने प्रधानमंत्रियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोपों की स्वतंत्र जाँच कर सकती है तो भारत मे एक मंत्री के विरुद्ध धमकी देने पर मुक़दमा क्यों नही क़ायम हो सकता ?  बाद मे किसानों पर गाड़ियाँ चढ़ाई गयीं और हिंसा मे दोनो पक्षों के कई लोग मरे । इस दौरान पुलिस की किमकर्तव्य विमूढ़ता साफ़ साफ़ दिखी ।  यह भी सत्ता पक्ष के ख़िलाफ़ कार्यवाही कर सकने मे हिचक की वजह से थी।

गोरखपुर एक सप्ताह पहले घटी हृदयविदारक घटना इसी बेशर्म गठजोड़ का एक और उदाहरण है । जिस इंस्पेक्टर के नेतृत्व मे पुलिस बल ने यह हत्या की थी, उसके बारे मे यह आम शोहरत है कि पिछले कुछ दिनो मे ही वह मुठभेड़ों और पुलिस कस्टडी मे यातना देकर एक दर्जन से अधिक़ लोगों को मार चुका था । मुठभेड़ों के , जिन परहमेशा संदिग्ध होने के आरोप और संभावना रहती है , चलते वह दूसरे इनाम इकराम के अलावा समय पूर्वतरक़्क़ी हासिल करते हुये थोड़े ही वक्त मे सिपाही से इंस्पेक्टर बन गया था ।यह कोई छिपी बात नही है कि आज कल उत्तर प्रदेश मे ‘अपराधियों’ को अदालत मे पेश करने के पहले पैर मे गोली मार दी जाती है ।

गोरखपुर के मानवाधिकार कार्यकर्ता मनोज कुमार सिंह के अनुसार यह इंस्पेक्टर भी कई ‘मुठभेड़ों’ मे गोली मार दल का सदस्य रहा है और उनमे बजाय सज़ा के इनाम पाते पाते उसके मुँह मे इस कदर खून लग चुका था कि पिछले एक वर्ष मे ही कई लोगों ने उसकी यातना के चलते दम तोड़ा है । जान गवाने वाले ये ग़रीब गुरबा लोग आम तौर से दलित परिवारों से आते हैं और किसी मामले मे उसे दंड नही दिया जा सका , परिणाम स्वरुप उसका हौंसला बढ़ता गया । इस बार उसका मुक़ाबला एक बहादुर औरत से पड़ा और वह बच नही पाया । मृतक मनीष गुप्ता की पत्नी से कोई क़ानूनी कार्यवाही न करने की ‘दोस्ताना’ सलाह दे रहे थे । इस सलाह का वीडियो सार्वजनिक हो जाने के बाद अच्छी तरह से समझा जा सकता है जिन उच्चाधिकारियों पर अपने मातहतों को अनुशासित कर जनता को न्याय दिलाने कीज़िम्मेदारी है, वे कैसे देर रात तक हत्यारे पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ खुद कोई कार्यवाही करने से बचते रहे ।

किसी भी सभ्य समाज के लिये गोरखपुर की घटना एक वेकअप काल की तरह हो सकती है पर हमारा अनुभव बताता है कि हमने पुलिस क्रूरता को सामाजिक स्वीकृति दे रखी है । मानवाधिकार कार्यकर्ता मनोज कुमार सिंह  गोरखपुर के करीबी ज़िलों मे ऐसे पाँच मामलों का ज़िक्र करते हैं जिनमे हाल ही मे पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ हत्या के मुक़दमे दर्ज़ हुये हैं । यदि इनमे से एक मामले मे भी सख़्त सज़ा मिली होती तो गोरखपुर के इस मनबढ़ू इंस्पेक्टर का इतना हौसला नही होता कि वह शहर के केंद्र मे स्थित एक होटल मे जाकर किसी व्यापारी को लूटने की प्रक्रिया मे उसे मार ही डालता ।

मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी को यदि गोरखपुर और लखीमपुर खीरी की घटनाओं से जोड़ कर देखा जाय तो किसी के मन मे संदेह नही रह जायेगा कि पुलिस मे व्यापक और बुनियादी सुधारों की ज़रूरत है । केवल ऊपरी लीपापोती से काम नही चलेगा । दुर्भाग्य से आज़ादी के बाद हम अपनी पुलिस को नही समझा पाये कि एक लोकतंत्र मे वह जनता की सेवक है और उसे संविधान तथादेश के क़ानूनों का सम्मान करना ही पड़ेगा ।दिक्कत यह है कि जब हमारी सरकारें पुलिस सुधारों या पुलिस आधुनिकीकरण की बातें करतीं हैं तो उनकी चिंता के केंद्र मे मुख्य रूप से वाहन , शस्त्र या संचार जैसे उपकरणों के स्तरों मे बेहतरी ही होती है । सबसे कम ध्यान उस मानसिकता को बदलने पर दिया जाता है जो भारतीय पुलिस को सभ्य और लोकतंत्र के लायक बनने से रोकती है । बजाय पुलिस को क़ानून सम्मत आचरण के लिये प्रोत्साहित करने के , सरकारें उन्हे स्वयं विवेचक , जज और जल्लाद तीनो भूमिकाएँ निभाने को मजबूर करती हैं । वे चाहती हैं कि पुलिस ख़ुद ही अपराधियों को मार दे या कम से कम पैर मे गोली मार कर अपंग तो कर ही दे । इसी प्रोत्साहन से गोरखपुर जैसे हत्यारे पुलिसकर्मी पैदा होते है ।

यह देखना दिलचस्प होगा कि इस बार की न्यायिक सक्रियता कितनी सकरात्मक सिद्ध होगी । कहीं ऐसा न हो कि प्रस्तावित आयोग की सिफ़ारिशें भी पुराने आयोगों की सिफ़ारिशों की तरह सचिवालयों की फ़ाइलों मेधूल फाँकती रहें ।

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