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गीतांजलि श्री के उपन्यास “रेत समाधि” को इस वर्ष के बुकर सम्मान से नवाज़े जाने के निहितार्थ

गीतांजलि श्री

विभूति नारायण राय IPS

“इन आँखिन देखी” :37: विभूति नारायण राय IPS

विभूति नारायण राय, IPS

विभूति नारायण राय, IPS

लेखक उत्तर प्रदेश में पुलिस महानिदेशक रहे हैं और महात्मा गांधी हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के कुलपति भी रह चुके हैं

पिछले दिनो दो ऐसी घटनायें घटीं जिनकी अनुगूँज हिंदी भाषा और साहित्य की दुनिया मे देर तक सुनाई देगी । यह हिंदी के अधिक आत्मविश्वास से भरपूर होते जाने और दुनिया भर मे उसकी रचनात्मकता के शिनाख्त का समय है । याद रहे कि आज जिसे हम हिंदी के नाम से जानते हैं , नागरी लिपि मे लिखी जाने वाली उस खड़ी बोली का साहित्य मुश्किल से सवा सौ साल पुराना है । इतने कम समय मे न तो सौ करोड़ से अधिक लोगों के बीच संपर्क भाषा बनने की क्षमता हासिल करना आसान था और न ही रचनात्मकता के उस शिखर तक पहुँचना संभव था जहाँ देश दुनिया की समृद्धतम भाषायें उस मे रचे गये को नज़रंदाज़ न कर सकें । इसी लिये इन दोनों घटनाओं को गौर से देखा जाना चाहिये ।

महात्मा गांधी ने पहली बार हिंदी को राष्ट्र भाषा की पदवी दी और आज़ादी की लड़ाई के एक महत्वपूर्ण औज़ार के रूप मे उसका महत्व स्वीकार किया था । देश की संविधान सभा ने अनुच्छेद आठ मे उल्लिखित सभी भाषाओं को राष्ट्र भाषा का दर्ज़ा देते हुये हिंदी को अंग्रेज़ी के साथ संघ की राजभाषा बनाया । इस एक परिवर्तन से हिंदी प्रेमियों का आत्मविश्वास कितना डिग गया था इसका पता तो सिर्फ़ इसी से लगता है कि संविधान मे अकेली राजभाषा के रूप मे हिंदी को लागू करने की तिथि 26 जनवरी 1965 के निकट आने पर जब तत्कालीन मद्रास प्रांत मे हिंसा भड़क उठी तो सेठ गोविंद दास जैसे उत्साही हिंदी प्रेमियों ने सेना भेज कर वहाँ हिंदी लागू करने के बात की थी । यह अलग बात है कि भाषा आंदोलनों से निपटने के लिये सरकार को ऐसा क़ानून बनाना पड़ा कि अब अनिश्चित समय तक अंग्रेज़ी हिंदी के साथ संघ की राजभाषा बनी रहेगी । ऐसी ही एक दिलचस्प स्थिति है कि ज़्यादातर हिंदी प्रेमी मानते हैं कि हिंदी भारत की राष्ट्र भाषा है । कई बार तो वे इसे लेकर विरोधियों से लड़ने के लिये भी तैय्यार हो जाते हैं । इसी लिये गाहे ब गाहे उच्च न्यायालयों को स्पष्ट करना पड़ा है कि संविधान के अनुसार हिंदी राष्ट्र भाषा नही राजभाषा है ।

पिछले कुछ दशकों मे , जब यह लगभग मान लिया गया कि राष्ट्र भाषा बनने की ज़िद निरर्थक है और सरकारों के लिये हिंदी का मतलब हर साल मनाया जाने वाला राजभाषा पखवारा मात्र है , कुछ अदभुत चीजें हुईं । आर्थिक तरक़्क़ी और भारी पैमाने पर औद्योगीकरण के चलते बड़ी बसावटें बनी जिनमे उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम से आकर लोग बसे और फिर हिंदी ने वह भूमिका निभानी शुरु की जिसके लिये वह सर्वथा उपयुक्त थी अर्थात वह तमिल , गुजराती , उड़िया या नागा जैसे समाजों के बीच संपर्क भाषा का काम करने लगी । आज़ मुंबई ,बैंगलुरु , पुणे , कोयम्बतूर , गौहाटी या तिरुवनंतपुर मे हिंदी बोल कर आप मज़े से अपना काम चला सकते है । इस भूमिका के लिये उसका समावेशी होना सबसे अधिक मददगार सिद्ध हुआ । किसी भी भाषा का शब्द उसका अपना है । तभी तो एक शताब्दी की उम्र वाली खड़ी बोली ने अपभ्रंश , ब्रज , अवधी , भोजपुरी , मैथिली और बहुत सी बोलियों की साहित्यिक और शब्द संपदा को अपनाकर अपना इतिहास लिखा । सरकार राजभाषा भले न बनाये , जनता ने उसे राष्ट्र भाषा बना दिया है। बाज़ार ने सरकार की कमी पूरी कर दी है ।

इस बदली हुयी हैसियत ने हिंदी का आत्मविश्वास बढ़ाया है । इस बढ़े आत्मविश्वास का ही परिणाम था कि नयी शिक्षा नीति मे हर छात्र के लिये मातृभाषा के अतिरिक्त एक अन्य भारतीय भाषा पढ़ना ज़रूरी किये जाने पर जब दक्षिण के कुछ नेताओं ने विवाद खड़े करने शुरू किये तो हिंदी पट्टी ने उस तरह की उत्तेजना नही दिखायी जो आज़ादी के शुरुआती सालों मे दिखती थी । यह स्पष्ट हो गया है कि इस बहुभाषिक समाज मे संपर्क भाषा तो हिंदी ही रहेगी और हर छात्र बिना दबाव दूसरी भाषा के तौर पर हिंदी ही पढ़ेगा । इसी बढ़े आत्मविश्वास का नतीजा था कि जब दक्षिण के कुछ फ़िल्मी कलाकारों ने हिंदी के ख़िलाफ़ विषवमन करना शुरू किया तो छुटपुट प्रतिक्रियाओं को छोड़कर कहीं से ग़ुस्से भरे बयान नही आये ।

दूसरी बड़ी घटना एक हिंदी रचना को बुकर सम्मान मिलना है । गीतांजलि श्री के उपन्यास रेत समाधि को इस वर्ष के बुकर सम्मान से नवाज़े जाने के निहितार्थ बहुत बड़े हैं । इस बड़बोले समय मे जब हमारे बहुत से लेखक खूब बोलते हैं और सिर्फ़ अपने बारे मे बोलते हैं , किसी ऐसे रचनाकार को दुनिया के बड़े पुरस्कारों मे से एक मिलना, जिसे हम अपनी रचना के बाहर बिरले ही बोलते देखते हैं , किसी चमत्कार से कम नही है । वाद विवादों या आत्म प्रचार से दूर गीतांजलि हिंदी के वृहत्तर पाठक समुदाय के लिये काफ़ी हद तक अपरिचित नाम था लेकिन साहित्य के गंभीर अध्येता मानते हैं कि भाषा के रचनात्मक उपयोग की जो क्षमता उन्होंने विकसित की है वह उनके समकालीनों के लिये स्पृहा की वस्तु हो सकती है । रचना के केंद्र के मनुष्य और नि:सर्ग इसे सिर्फ़ भाषिक चमत्कार नही बनने देते बल्कि भाषा , संवेदना और सरोकारों की एक ऐसी सिम्फनी निर्मित होती है जो पाठक को अतींद्रिय सुख तक ले जाती है । यह अलग बात है कि गीतांजलि ने जो मुहावरे रचे हैं उन तक पहुँचने के लिये पाठक को भी कुछ अतिरिक्त कदम चलने पड़ेंगे । यहाँ सिर्फ़ लेखकीय तैयारी से काम नही चलेगा , पाठकीय तैयारी की भी उतनी ही ज़रूरत पड़ेगी ।

शायद इसी तैयारी की कमी थी कि सोशल मीड़िया पर कई लोगों ने स्वीकार किया कि उन्होंने गीतांजलि श्री का नाम ही बुकर सम्मान के लिये शॉर्ट लिस्टिंग के बाद सुना था ।
अपने एक इंटरव्यू मे गीतांजलि ने सही ही कहा है कि इस एक पुरस्कार से विश्व का ध्यान हिंदी या दूसरी भारतीय भाषाओं मे हुये महत्वपूर्ण लेखन पर जायेगा । अभी तक, ख़ास तौर से पश्चिम का ध्यान भारतीय लेखकों द्वारा सिर्फ़ अंग्रेज़ी मे रचे पर जाता रहा है । इसके लिये डेज़ी राकवेल जैसी अनुवादिका की भी ज़रूरत पड़ेगी जो गीतांजलि को मिलीं । अनुवादक का महत्व इसी से समझा जा सकता है कि अपने कालजयी उपन्यास वन हंडरेड इयर्स आफ़ सोलिट्यूड का स्पैनिश से अंग्रेज़ी मे अनुवाद कराने के लिये मारख़ेज ने अनुवादक ग्रेगरी रबासा के ख़ाली होने का वर्षों इंतज़ार किया । अनुवाद के बाद इस उपन्यास पर उन्हे नोबल पुरस्कार मिला ।

हिंदी मे गद्य और पद्य दोनो मे पिछले सौ वर्षों मे बहुत कुछ ऐसा लिखा गया है जिसे अंग्रेज़ी , फ़्रेंच या स्पैनिश जैसी भाषाओं मे अनुवाद किया जाना चाहिये जिससे उन्हे विश्वसाहित्य मे वह स्थान मिल सके जिसके वे हक़दार हैं । रेत समाधि को बुकर मिलने से इसकी संभावना और उम्मीद बनती है ।

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