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“सामूहिक धिक्कार की ज़रूरत’ : विभूति नारायण राय, IPS

हैदराबाद कांड

‘ इन आँखिन देखी ‘-4 : विभूति नारायण राय, IPS

जब तक मीडिया और नागरिक अधिकार संघटनों ने हल्ला गुल्ला नही मचाया, दोनो प्रसंगों मे हमे एक जैसी संवेदनहीन राजनीति और पुलिस कार्यवाही दिखी । 

विभूति नारायण राय

लेखक सेवानिवृत्त पुलिस महानिदेशक हैं और महात्मा गांधी हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के कुलपति भी रह चुके हैं

ऐसा क्योंकर हो सका कि निर्भया कांड के बाद इतना सब कुछ होने के बाद भी हैदराबाद हो गया ?

हैदराबाद के डॉक्टर के मामले मे कुछ पुलिसकर्मियों को हर बार की तरह निलम्बित किया गया है, पर मेरा अनुभव कहता है कि हर बार की तरह कुछ महीने बाद ये सभी बिना किसी दण्ड या बहुत छोटी सज़ा के साथ बहाल कर दिये जायेंगे । यदि निर्भया कांड के बाद तंत्र सचमुच गंभीर होता तो यह कैसे संभव हुआ कि महिला डाक्टर के परिजन अपनी रपट लिखाने के लिये एक थाने से दूसरे थाने की दौड़ लगाते रहे और वह मूल्यवान समय जाया हो गया जिसमें भागदौड़ करने पर कम से कम उसकी जान बच सकती थी । निर्भया के मामले मे भी ऐसी ही लापरवाही हुई थी । इस बार भी नेताओं ने उतने ही ग़ैर ज़िम्मेदाराना बयान दिये । 

क्या इस पर गंभीरता से विचार नही किया जाना चाहिये कि सीआरपीसी और पुलिस रेगुलेशन मे ऐसे संशोधन किये जायँ कि गंभीर मामलों मे फ़रियादी बिना क्षेत्राधिकार के पचड़ों मे उलझे किसी भी थाने को सूचित कर कार्यवाही की माँग कर सके ? 

अपने देश में फिर वही नृशंसता? फिर वही निरवीर्य पुरुष कामुकता और फिर वही संवेदन शून्य तंत्र? हैदराबाद मे 28 नवंबर को एक महिला डाक्टर के साथ जो कुछ हुआ वह दिसम्बर 2012 की एक सर्द रात दिल्ली मे निर्भया के साथ घटी की पुनरावृत्ति मात्र ही था । यह भी कम चिंताजनक नही है कि दोनो महिलायें राजधानियों मे पशुओं का शिकार हुई, एक देश की और दूसरी तेलंगाना की राजधानी मे और दोनो शहरों की पुलिस को संसाधनों के मामले मे देश मे अव्वल माना जाता है और दोनो क्षेत्रों की सरकारें इन शहरों के महिलाओं के लिये सुरक्षित होने का दावा करती हैं । जब तक मीडिया और नागरिक अधिकार संघटनों ने हल्ला गुल्ला नही मचाया, दोनो प्रसंगों मे हमे एक जैसी संवेदनहीन राजनीति और पुलिस कार्यवाही दिखी ।
ऐसा क्योकर हो सका कि निर्भया कांड के बाद इतना सब कुछ होने के बाद भी हैदराबाद हो गया । निर्भया के बाद क़ानून सख़्त किया गया और बलात्कार के मामलों मे मृत्यु दंड का अनिवार्य प्रविधान क़ानून का अंग बना , दूसरे क़ानूनी झोल दूर हुये और तंत्र को सुदृढ़ करने के लिये निर्भया फ़ंड की व्यवस्था की गयी । यह अलग बात है कि विधायिका की बहसों और सूचना के अधिकार के तहत अलग अलग श्रोतों से मिली जानकारियों से स्पष्ट है कि इस फ़ंड का बड़ा हिस्सा या तो ख़र्च ही नही हुआ या बहुत से मामलों मे उसका दुरुपयोग हुआ ।

स्पष्ट है कि इस महान जगदगुरु देश मे वांगमय मे भले औरत को देवी घोषित कर दिया जाय उसे एक मनुष्य के रूप मे जीने का अधिकार देने मे शासक वर्ग की कोई दिलचस्पी नही है ।

यदि निर्भया कांड के बाद तंत्र सचमुच गंभीर होता तो यह कैसे संभव हुआ कि महिला डाक्टर के परिजन अपनी रपट लिखाने के लिये एक थाने से दूसरे थाने की दौड़ लगाते रहे और वह मूल्यवान समय जाया हो गया जिसमें भागदौड़ करने पर कम से कम उसकी जान बच सकती थी । निर्भया के मामले मे भी ऐसी ही लापरवाही हुई थी । इस बार भी नेताओं ने उतने ही ग़ैर ज़िम्मेदाराना बयान दिये । सोशल मीडिया पर लताड़े जाने पर तेलंगाना के गृहमंत्री ने अपना अविवेकी वक्तव्य वापस लिया ।
हर गंभीर प्रकरण की ही तरह यह प्रसंग भी एक विस्तृत विमर्श की माँग करता है।भारतीय पुरुषों को समझने की ज़रूरत है कि स्त्री के शरीर पर उसका अधिकार है और मनु की यह व्यवस्था कि वह वय की विभिन्न स्थितियों मे पिता , पति या पुत्र के अधीन होगी एक मनुष्य विरोधी अवधारणा है । एक बार मनुवादी संस्कारों से मुक्त होने पर ही भारतीय पुरुष यह भी स्वीकार कर सकेगा कि बलात्कार या उसके भय से मुक्त होकर निर्द्वंद विचरण , पोशाक का ख़ुद चयन या रोज़गार औरत के मौलिक अधिकार है और तभी ऐसे बीमार मानसिकता वाले तर्क नही दिये जा सकेंगे कि लड़कियाँ अपने कपड़ों, देर तक बाहर घूमने या लड़कों से दोस्ती के चलते ख़ुद बलात्कार को निमंत्रित करती हैं । ये तर्क सिर्फ़ कम पढ़े लिखों के मुँह से सुनने को मिलते हों ऐसा भी नही, अक्सर भारी भरकम डिग्रियों वालों के मुख़ारविंद से भी यही सब सुनने को मिलता है । कई बार कुछ महिलायें भी ऐसी ही राय प्रकट करती दिखतीं हैं ।

निर्भया से दरिंदगी के बाद राजनीति मे सक्रिय एक साध्वी का मांनना था कि कोई ‘भली’ लड़की देर रात तक अपने पुरुष मित्र के साथ नही घूमती मतलब ‘बुरी’ निर्भया अपने साथ घटे की ज़िम्मेदार है । सिमोन द बुआ ने लिखा था कि औरत पैदा नही होती उसे बनाया जाता है । अपने प्रचलित मूल्यों से समाज उसे ‘अच्छा’ या ‘बुरा’ बनाता है।

भारतीय समाज तो इस मामले मे ज़्यादा शातिर है , वह औरत को ‘देवी’ घोषित कर देता है और इस तरह उसके इंसानी हकूक से अपना पीछा छुड़ा लेता है । एक लम्बी लड़ाई के बाद ही भारतीय पुरुष को यह सिखाया जा सकेगा कि स्त्री देवी नही है , वह भी हाड़ माँस युक्त एक मनुष्य है और हिंसा मुक्त जीवन उसका मौलिक अधिकार है ।

निर्भया से लेकर इस महिला डाक्टर तक अनगिनत मामलों मे पीड़ित परिवारों को पुलिस और न्याय दिलाने वाले तंत्र की असंवेदनशीलता से जूझना पड़ा है । एफआइआर दर्ज कराने मे हर बार देरी होती है और हर बार वह क़ीमती समय नष्ट होता है जो किसी शिकार को शिकारियों के चंगुल से बचा सकता है या अपराधियों तक पहुँचने मे पुलिस की मदद कर सकता है । डॉक्टर के मामले मे कुछ पुलिसकर्मियों को हर बार की तरह निलम्बित किया गया है, पर मेरा अनुभव कहता है कि हर बार की तरह कुछ महीने बाद ये सभी बिना किसी दण्ड या बहुत छोटी सज़ा के साथ बहाल कर दिये जायेंगे । क्या इस पर गंभीरता से विचार नही किया जाना चाहिये कि सीआरपीसी और पुलिस रेगुलेशन मे ऐसे संशोधन किये जायँ कि गंभीर मामलों मे फ़रियादी बिना क्षेत्राधिकार के पचड़ों मे उलझे किसी भी थाने को सूचित कर कार्यवाही की माँग कर सके ?

क्षेत्राधिकार का मसला जिले का एसपी एक निश्चित समय सीमा के अंदर निपटाए । यह भी ज़रूरी है कि पुलिस रेगुलेशन मे ही अंतर्निहित प्राविधान होने चाहिये कि एफआइआर दर्ज न करने वाले की न्यूनतम सज़ा सेवा से बर्ख़ास्तगी होगी । हर बार शोरशराबे के बाद ही फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना क्यों हो ? इसके क़ानूनी प्राविधान होने चाहिये कि स्त्री हिंसा के मामले फ़ास्टट्रैक अदालतों में ही सुने जाँय ।

मैं जब ये पंक्तियाँ लिख रहा हूँ , मेरे मन मे ख़ास तरह का अविश्वास है । क्या इस डाक्टर के साथ घटी दरिंदगी भारतीय पुरुषों के आचरण और क़ानूनों मे कोई बड़ा बदलाव ला सकेगा ? हमें एक सामूहिक धिक्कार की ज़रूरत है । चीख़ चीख़ कर कहने की ज़रूरत है कि हम एक अपराधी समाज हैं जो अपने दलितों और औरतों के साथ अमानवीय आचरण करते रहें है । कहीं ऐसा न हो कि तमाम घटनाओं की तरह हैदराबाद का यह शर्मनाक वाक़या भी हमारी सामूहिक चेतना को अल्प अवधि तक झकझोरने के बाद कुछ दिनो मे हमारी स्मृतियों से बिला जाय और हम फिर शतुर्मुर्ग की तरह दोषारोपणों की रेत मे गर्दन घुसेड़े , हमारे अपनों के साथ ऐसा कुछ न हो इस कामना के साथ , अगली वारदात की प्रतीक्षा करते रह जायँ । केवल आशा की एक ही किरण है । निर्भया के मामले मे हमने देखा कि बड़ी संख्या मे महिलायें और नागरिक अधिकार संघटन सड़कों पर आये और सरकार को कई सकारात्मक क़दम उठाने पड़े । मूल्यों के स्तर पर भी यह छोटी बात नही है कि अब ज़्यादा लड़कियाँ बलात्कार की शिकायतें लेकर सामने आ रहीं हैं और ज़्यादा मॉ बाप भी उन्हें कोसने की जगह उनके साथ खड़े दिखते हैं । यह बात ज़्यादा लोगों की समझ मे आ रही है कि बलात्कार के बाद शर्मिंदा पीड़िता को नही अपराधी को होना चाहिये । कामना है कि इस दुर्घटना के बाद यही स्वर और मज़बूत हो , तभी वह प्रक्रिया आगे बढ़ेगी जो निर्भया के साथ शुरू हुई थी ।

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