भारत के
प्रथम शास्त्रीय “की बोर्ड” प्लेयर विजय चन्द्रा आज प्रयागराज में

प्रयागराज के पं. विजय चन्द्रा सिर्फ एक नाम नहीं बल्कि भारतीय शास्त्रीय संगीत को जानने व पसन्द करने वालों के बीच एक सुपरिचित हस्ताक्षर हैं। कीबोर्ड /सिंथेसाइजर पर पं. विजय चन्द्रा की श्रेष्ठ प्रस्तुति की प्रशंसा संगीत की सभी विधाओं में पारंगत कलाकारों द्वारा की जाती है। इन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रदर्शन के लिए लीक से हट कर एक ऐसा विदेशी वाद्य यंत्र-इलेक्ट्रानिक सिंथेसाइज़र /कीबोर्ड को चुना जिस पर शास्त्रीय संगीत की साधना एक बेहद दुश्वार और मुश्किल काम था। पथ आसान नहीं था, फिर भी पं. विजय चन्द्रा ने इस वाद्ययंत्र पर श्रेष्ठ प्रदर्शन करने का प्रशंसनीय कार्य किया है।
उन्हें आशीर्वाद मिला मशहूर गजल गायक अनूप जलोटा जी का जिन्होंने न सिर्फ विजय चंद्रा जी को अपने साथ जोड़ा बल्कि उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किए जाने का भी मुक्त कंठ से आशीर्वाद प्रदान कर दिया।
इस राम बाण ने विजय चंद्रा जी को संगीत के क्षेत्र में उभर रहीं प्रतिभाओं के आकाश पर बिठा दिया है और संगीतज्ञों की उनसे अपेक्षाएं भी बढ़ गई हैं। निश्चित रूप से विजय चंद्रा को मिलने वाली उपलब्धियों से प्रयागराज के साथ मिर्जापुर और मुगलसराय को भी ख्याति मिलेगी क्योंकि विजय चंद्रा जी का बाल्यकाल तो मिर्जापुर और मुगलसराय में ही बीता है जबकि कर्मक्षेत्र इलाहाबाद रहा है। यह संयोग ही कहा जा सकता है कि इलाहाबाद के प्रयागराज बनते ही उनकी जिंदगी ने ऐसी उछाल मारी कि संगीत के सागर मुंबई ने उन्हें अपनी बाहों में खींच लिया और अपनी प्रतिभा को अंतरराष्ट्रीय ख्याति दिलाने के लिए उन्हें एक नया प्लेटफॉर्म मिल गया।

इच्छा शक्ति प्रबल हो और भीड़ में अलग पहचान बनाने का जज्बा जुनून हो तो नामुमकिन सा लगनेवाला संकल्प भी पूरा हो जाता है और व्यक्ति दूसरों के लिए प्रेरणास्पद बन जाता है। सिंथेसाइजर या कहें की-बोर्ड प्लेयर, इस वाद्य यंत्र के जादूगर विजय चन्द्रा की तपस्या और लगन को देखकर कुछ ऐसा ही लगता है कि रेगिस्तान में भी बहारें आ सकती हैं और पत्थर के पहाड़ों में भी बगीचे खिल सकते हैं। विजय चन्द्रा भारत के प्रथम ऐसे कलाकार बने जो की-बोर्ड पर शास्त्रीय वादन के लिए मशहूर हो गए हैं। इलाहाबाद आकाशवाणी और लखनऊ रेडियो एवं दूरदर्शन की कलाकार गायिका मैना देवी के सुपुत्र विजय चन्द्रा से हुई संक्षिप्त भेंटवार्ता में उनकी जो भावना व्यक्त हुई, वह उल्लेखनीय और सभी कलाकारों के लिए प्रेरणास्पद हैं।
विजय चन्द्रा ने बताया कि बचपन से ही संगीत उनकी रगों में बह रहा था और ऑर्केस्ट्रा में सिंथेसाइजर बजाते हुए उनके मन में की-बोर्ड जैसे इस आधुनिक साज को हाइलाइट करने की भावना जागी और वे इसे मूर्त रूप देने के लिए संकल्पित होकर तपस्या में जुट गये। उस समय तक की बोर्ड शास्त्रीय संगीत में रुचि रखने वालों के लिए आकर्षक वाद्य यंत्र नहीं था लेकिन फिर भी उनका मन उसमें छिपी संभावनाओं को तलाशते में लगा रहता था। अचानक उनके इस प्रयास को पंख तब लग गए जब उन्होंने अदनान सामी को इस यंत्र को बजाते हुए सुना और अदनान सामी की प्रस्तुति में नया प्रयोग देखकर विजय चन्द्रा प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाए। विजय चंद्रा की-बोर्ड पर शास्त्रीय वादन के अभ्यास में जुट गये और तमाम विरोधों के बावजूद उन्होंने इस तपस्या को ही अपने जीवन का मकसद बना लिया।

उन्होंने बताया कि इसके लिए रागदारी सीखी, अभ्यास जारी रखा और कीबोर्ड प्लेयर के रूप में कई शहरों में यशभागी भी बने। देशभर में अपनी प्रस्तुतियां दी और इस वाद्य यंत्र को लोकप्रिय बनाया। थाइलैंड, मलेशिया, कम्बोडिया आदि कई देशों में शास्त्रीय की-बोर्ड वादन से भारत को गौरवान्वित किया।
भविष्य में संगीत की नई पीढ़ी को उनकी इस तपस्या का लाभ मिले, इसलिए विजय चन्द्रा ने प्रयाग संगीत समिति से अन्य विधाओं के साथ शास्त्रीय की-बोर्ड वादन में भी शिक्षा प्रशिक्षण परीक्षा और डिग्री देने का आग्रह किया। विजय चन्द्रा का प्रयास सफल हुआ और वर्ष 2010 से प्रयास संगीत समिति शास्त्रीय की-बोर्ड वादन में भी प्रभाकर तक की डिग्री को शामिल कर लिया। यह विजय चंद्रा की बड़ी सफलता थी।
पंडित विजय चंद्रा अब न केवल एक प्रख्यात नाम हैं, बल्कि शास्त्रीय संगीत प्रेमियों की असंख्य विधाओं के बीच उनकी एक अत्यंत प्रभावशाली पहचान बनती जा रही हैं। अब उन्हें शास्त्रीय हिंदुस्तानी संगीत क्षेत्र में हर जगह श्रोताओं द्वारा सराहा जाता है। प्रसिद्ध संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल जी सहित तमाम प्रतिष्ठित संगीतज्ञों ने कीबोर्ड में से शास्त्रीयता के सुर निकालने की उनकी इस प्रवीणता को सराहा और इसे जारी रखने की सलाह दी।
पंडित विजय चंद्रा की सफलता की राह आसान नहीं थी। उन्होंने अपने शास्त्रीय जुनून के लिए एक अपरंपरागत वाद्य यंत्र – इलेक्ट्रॉनिक सिंथेसाइज़र का चयन किया। हालाँकि इलेक्ट्रॉनिक सिंथेसाइज़र ऐसे शास्त्रीय प्रदर्शनों के लिए नहीं है, लेकिन पंडित विजय चंद्रा ने इस उपकरण में महारत हासिल करने के लिए बहुत मेहनत की।


इसके अलावा पं. विजय चंद्रा उन्होंने प्रसिद्ध गजल गायिका पिनाज़ मसानी (मुंबई), भजन सम्राट अनूप जलोटा (मुंबई), उस्ताद अहमद हुसैन और मोहम्मद हुसैन (जयपुर) के साथ संगत की है।
पं. विजय चंद्रा को सिंथेसाइजर पर हिंदुस्तानी शास्त्रीय रागों की एकल प्रस्तुति के लिए उत्तर प्रदेश कला अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। वे आकाशवाणी और दूरदर्शन के नियमित कलाकार हैं और भारत के कई प्रमुख शहरों में अपनी प्रस्तुतियां दे चुके हैं। पं. विजय चंद्रा को आईसीसीआर के पैनल आर्टिस्ट के रूप में भी चुना गया है। उनके जीवन का लक्ष्य भारत और विदेशों में “सिंथेसाइजर” बजाने की कला की मधुर सुगंध फैलाना है, उनके महान सहयोग से प्रयाग संगीत समिति, इलाहाबाद द्वारा वर्ष 2010 से भारतीय शास्त्रीय रागों के मूड के साथ “सिंथेसाइजर प्रभाकर” परीक्षा का आयोजन किया जा रहा है।

मुंबई प्रवास के दौरान संगीत की विश्व प्रसिद्ध जोड़ी में से सम्माननीय प्यारेलाल जी के आवास पर उनका स्वास्थ्य का हाल पूछने के साथ साथ आशीर्वाद प्राप्त करने का सौभाग्य मिला।
आज पं. विजय चंद्रा जी प्रयागराज में हैं। वह यहां पर आयोजित एक संगीत प्रतियोगिता में जूरी के रूप में आमंत्रित किए गए हैं।


Pandit Shri Vijai Chandra ji in a function where he was Jury to decide the best tallent.










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