
(अमृत कलश)
“डॉ मोहन यादव ने इस एक वर्ष में अपनी छवि एक हिंदुत्व ब्रिगेड के नेता के रूप में बनाने की कोशिश की है…”
वरिष्ठ पत्रकार रंजन श्रीवास्तव
भोपाल

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के कार्यकाल का एक वर्ष पूरा हो रहा है। ऐसे में राजनीतिक, अफसरशाही या पत्रकारिता के क्षेत्र में जो अटकलबाजियां चल रही थीं कि क्या वे अभी भी भाजपा केंद्रीय नेतृत्व की पहली पसंद बने हुए हैं, उन पर विराम लग जाना चाहिए। एक वर्ष पूर्व जब भाजपा विधायक दल की बैठक हुई जिसमें विधायक दल का नया नेता चुना जाना था, तब डॉ मोहन यादव तीसरी पंक्ति में बैठे हुए थे। पहली पंक्ति में भाजपा के कई कद्दावर नेता बैठे हुए थे। पर भाजपा नेतृत्व ने मोहन यादव को विधायक दल के नेता के रूप में चुनकर सबको चौंका दिया।

यह स्वाभाविक है कि एक वर्ष का कार्यकाल पूरा होने पर लोग मोहन यादव के निर्णय और नेतृत्व क्षमता की तुलना उनके पूर्ववर्ती शिवराज सिंह चौहान से करें, पर मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्य में सिर्फ एक वर्ष के कार्यकाल के आधार पर किसी भी मुख्यमंत्री के कार्य को किसी स्केल पर नापना जल्दबाजी हो सकती है। यह जरूर है कि डॉ मोहन यादव ने इस एक वर्ष में अपनी छवि एक हिंदुत्व ब्रिगेड के नेता के रूप में बनाने की कोशिश की है जिससे वे पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साये में न दिखें तथा राष्ट्रीय स्तर पर भी उनकी एक अलग पहचान हो।
जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने “बंटोगे तो कटोगे” का नारा लगाया तब मोहन यादव ने भी एक नारा दिया कि “भारत में रहना होगा तो राम – कृष्ण की जय कहना होगा”। वस्तुतः डॉ मोहन यादव ने भगवान राम और कृष्ण से संबंधित स्थलों के विकास का रोडमैप बनाकर एक आक्रामक हिंदूवादी नेता के तौर पर अपनी पहचान बनाने की कोशिश की है। डॉ मोहन यादव उज्जैन के निवासी हैं जहाँ धार्मिक ग्रंथों के अनुसार भगवान कृष्ण ने महर्षि सांदीपनि आश्रम में शिक्षा प्राप्त की थी।
इसी आश्रम में उनके सहपाठी सुदामा थे और कृष्ण और सुदामा के मित्रता का दिल छूने वाला एक प्रसंग भी धार्मिक ग्रंथों में आता है । डॉ मोहन यादव संभवतः पहले मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने भगवान् कृष्ण से जुड़े स्थलों के समुचित विकास की बात की है। भगवान् कृष्ण शारीरिक रूप से उपस्थित तो नहीं हैं, पर प्रदेश में हजारों लाखों सुदामा ऐसे हैं जो अपने भविष्य संवरने के इंतज़ार में, अपने अपने कृष्ण के इंतज़ार में दशकों से मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। न उनके बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा मौजूद है और न ही उनके और उनके परिवार के लिए अच्छे अस्पताल। शाम होते होते दो वक़्त की रोटी जुटा लेना ही उनकी बड़ी उपलब्धि साबित होती है। रोजगार की तलाश मजदूरी पर ख़त्म होती है और अगर कोई घर में बीमार पड़ जाए तो गहने और खेत बेचने तक की नौबत आ जाती है। और गहने और खेत भी सभी नहीं बेच पाते क्योंकि यह सबके पास है भी नहीं। क़र्ज़ लेने के लिए अगर सूदखोरों के चक्कर में पड़ गए तो सूद चुकाते चुकाते ही पूरा जीवन निकल जाता है। खाट पर मरीज को कस्बे या नगर ले जाते या अस्पताल से शव को मोटरबाइक या खाट पर ले जाने वाली कितनी तस्वीरें अख़बारों में छप चुकी हैं, पर स्थिति में शायद ही कोई बदलाव आया हो। कृषि को फायदे का धंधा बनाना सरकारी फाइलों के पन्नों में कैद है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार भले ही प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय में कई गुना इज़ाफ़ा हुआ हो, उसका फायदा पंडित दीनदयाल उपाध्याय के अंत्योदय दर्शन के अनुसार समाज के अंतिम व्यक्ति तक अभी भी नहीं पहुंचा है। हाँ यह जरूर हुआ है कि राजनेता, सरकारी अधिकारी, व्यापारी और उद्योगपति, ठेकेदार, बिचौलिए, दलाल, डॉक्टर, इंजीनियर तथा अन्य पेशेवर लोग अमीर से और अमीर हुए हैं।
लोकायुक्त संस्था द्वारा छापों के दौरान चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी तथा संविदाकर्मी तक के यहाँ भी करोड़ों की संपत्ति मिलना बताता है कि भ्रष्टाचार सुरसा के तरह मुंह फैलाते ही जा रही है। भ्रष्टाचारियों के अंदर कानून और सरकार का कोई डर दिखता नहीं है। अगर सरकार के नाक के नीचे कार्यालयों में बिना रिश्वत के कोई काम न हो और राजधानी में ही कलेक्टर के नाक के नीचे राजस्व के कर्मचारी अपना प्राइवेट ऑफिस चला रहे हों तो भ्रष्टाचार का इससे बड़ा सबूत क्या हो सकता है।
ऐसे में मुख्यमंत्री मोहन यादव के सामने इस कार्यकाल के बचे 4 वर्षों में सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि क्या वे मध्य प्रदेश के सुदामाओं के जीवन में कोई गुणात्मक बदलाव ला सकते हैं? क्या प्रदेश में एक नयी कार्य संस्कृति का विकास कर सकते हैं जो मध्य प्रदेश को तरक्की के एक नयी राह पर ले जाए ?
क्या यह संभव है कि सरकारी कार्यालयों में बिना रिश्वत के कोई काम हो जाए? क्या अच्छे अस्पतालों और अच्छे स्कूल की सुविधा उन लोगों को मिल सकती है जो गावों में रहते हैं और शहरी जीवन से बहुत दूर हैं? या अन्य बहुत से सवाल जिनसे मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग के लोगों को रोजाना जूझना पड़ता है उनका जवाब मिल पायेगा?
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