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“प्रयागराज का सफर एक नॉस्‍टैल्जिया…बदल रहा है इलाहाबाद”: रामधनी द्विवेदी

प्रयागराज का सफर एक नॉस्‍टैल्जिया

वरिष्ठ पत्रकार रामधनी द्विवेदी

नॉस्‍टैल्जिया का मैं सही हिंदी रुपांतर नहीं तलाश पा रहा हूं। शब्‍दकोश ऐसे शब्‍द बता रहे हैं जो मेरे ही गले नहीं उतर रहा है तो आप लोगों के गले कैसे उतरेगा। अतीत के प्रति प्रेम,उसकी यादें,उन दिनों घटी घटनाएं, उनसे जुड़े लोग जब आपकी यादों में लगातार बने रहें और जब भी उनकी याद आए, आप उन्‍हीं दिनों में खो जांए तो कहा जाएगा आप नॉस्‍टैल्जिक हो गए हैं। मैं इलाहाबाद ( क्‍योंकि तब वह इलाहाबाद ही था और प्रयागराज अभी तक जबान पर चढ़ा नहीं है) को याद करते समय ऐसा महसूस करता हूं। अपने गांव और घर को भी याद कर ऐसा ही लगता है। मानो कुछ छूट गया है,खो गया है, जो कभी अपना था, अब अपना नहीं रहा, किसी ने छीन लिया है। यह सब जागते समय ही नहीं, सोते समय भी लगता है और उनके सपने आते हैं। क्‍या इसी को मायामोह तो नहीं कहते हैं। तो इस समय मैं नास्‍टैल्जिक हो गया हूं।

जब भी इलाहाबाद जाता हूं, अपने उस घर जरूर जाता हूं जहां हम लोग दस साल किराये पर रहे और वहीं हमारे बच्‍चे पढ़े लिखे और परिवार विकसित हुआ। अब मकान तो वही है लेकिन काफी कुछ बातें बदल गई हैं। लोग रिटायर हो गए, कुछ नहीं रहे, बच्‍चे बड़े हो गए हैं, लड़कियां अपने घर चली गई हैं। बची हैं तो बस मकान की दीवालें और उनसे जुड़ी यादें। मेरे पुत्र राहुल जब अपने बच्‍चों के साथ एक बार इलाहाबाद गए तो उस घर गए थे और वह जगह दिखाई थी जहां रह कर वह पढ़े थे बड़े हुए थे। दो कमरों के घर में एक पूरा अंधेरे में डूबा और एक नीम रोशनी में। मेरे पोतों ने विश्‍वास ही नहीं किया कि पापा का बचपन यहां बीता है और यहीं रह कर पढ़े हैं। स्‍नेह मधुर ने भी मुझसे पूछा कि पुराने घर जाना चाहेंगे। मैंने कहा कि वहां अब कोई नहीं होगा, सब अपने में मस्‍त होंगे, नए बच्‍चों को अपना परिचय देना पड़ता है,समय भी नहीं है। इस बार उधर नहीं जाएंगे।

सिविल लाइंस से निकलते समय मैने कहा कि चलिए पत्रिका हाउस चलते हैं। वहीं से कभी अमृत प्रभात छपता था जिसमें मैने 22 साल काम किया था। मधुर बोले कि वहां कुछ नहीं होगा। मैने कहा कि चलो बाहर से ही देख लेंगे। जब हम लोग पत्रिका मार्ग से गुजरे( यह नाम शायद अभी नहीं बदला है।) तो आसपास की बिल्डिंग देख विश्‍वास ही नहीं हुआ कि यह पत्रिका मार्ग है जहां कभी शाम को ही सन्‍नाटा हो जाता था जो अब भीड़ और वाहनों की भोंपुओं की आवाजों से गुंजायमान है।

पत्रिका के गेट के आगे कई छोटी मोटी दूकानें खुल गई हैं। एक दूकान का ढांचा तो अंदर भी दिखा। गेट खुला था और दो एक कुर्सी और मेज रखी थी। मधुर बाइक अंदर ले गए और मुख्‍य भवन के प्रवेश के पास रोका। वहां एक पुरानी बाइक। तीन चार टूटी कुर्सियां पड़ी थी। एक कुत्‍ता बगल में लेटा था और बाइक की आवाज सुन उसने सिर उठाया। उसे लगा होगा कि यहां ये कौन लोग आ गए। जिस हॉल और कमरे में कभी अमृत प्रभात और नार्दन इंडिया पत्रिका का संपादकीय होता था,वहां लाइट जल रही थी लेकिन ग्रिल के बाद का दरवाजा उंठगा हुआ था। मैं अंदर चला गया और दरवाजा खोला तो वहां भी एक कुत्‍ता आराम करता मिला। कुछ मेजें थी, कुछ दूटी कुर्सियां और कुछ पुराने किस्‍म के कम्‍प्‍यूटर।

इससे लगा कि यहां कुछ तो होता है। जब तक एक आदमी आया और हम लोगों को उत्‍सुकता से देखने लगा। मधुर ने बताया कि हम लोग यहां के पुराने कर्मचारी हैं और इसे देखने आए हैं। उसने बताया कि दो एक रिपोर्टर आते हैं,विज्ञापन की एक महिला भी आती है और यहीं से अखबार भी छपता है। न जाने कैसा लगा,यह सुन कर। जहां कभी इतनी रौनक होती थी कि सिविल लाइंस आए लोग सिर्फ हम लोगों से मिलने और पत्रिका परिसर को देखने चले आते थे, उस खंडहर जैसे भवन में अखबार छपने की बात की जा रही है। शाम के छह बजे हैं । दूसरे अखबारेां में जहां इस समय काम की भागमभाग हो रही होगी,यहां सन्‍न्‍नाटा छाया है और यह कह रहा है कि अखबार छपता है। हम लोगों ने उसका नाम पूछा तो उसने कोई यादव बताया और यह भी कि वह अभी कुछ महीने से ही काम कर रहा है। मधुर ने कई लोगों के बारे में पूछा जो अब नहीं काम करते।

प्रवेश द्वार पर एक बड़ा सा बैनर अमृत प्रभात टीवी का लगा था। मैने पूछा कि यह क्‍या है तो उसने बताया कि अब यूट्यूब पर अमृत प्रभात का चैनल शुरू हुआ। इससे हम न तो चौंके और न हीं उत्‍साहित हुए। बाद में गूगल पर देखा तो यूट्यूब के दो एपिसोड मिले। एक उसके शुरू होने का दूसरा पांच छह लोगों के होली मिलन का।

चारो ओर झाडियों उग आई हैं। बस पुरानी सड़क का निशान सा बचा है। रिपोर्टिंग के सेक्‍शन में भी लाइट जल रही थी। पूछा तो यादव ने कहा जला दिया है। लगता है कि बस दिया जलाने के लिए ही उसे रखा गया है और उसी के लिए अन्‍य लोग भी आते होंगे। थोड़ी देर रहने के बाद हम लोग बाहर आग गए। वहां से हम लोग आनंद घिल्डियाल के यहां गए।

स्‍नेह मधुर ने बताया कि कभी हिंदू के विशेष संवाददाता रहे जया भादुड़ी (अब जया बच्‍चन) के पिता तरुण भादुड़ी ने अपने अखबार में लिखे लेख में कहा था इलाहाबाद ऐसा शहर है जो अपने को बदलना नहीं चाहता। आज से दस बीस साल पहले जिन लोगों ने भी इलाहााबाद को देखा है, वे अगर आज देखें तो भादुड़ी दादा की बात गलत साबित हो जाएगी। इलाहाबाद बदल गया है और अब भी तेजी से बदल रहा है। कई इलाकों को देखने के बाद मैं तो पहचान ही नहीं पाया। सिविल लाइंस में बड़े बड़े शो रूम बन गए हैं। सुभाष चौराहे से उत्‍तर जाने वाली सड़क जो कभी उदास उदास सी लगती थी अब जगमग हो गई है। मेरे पास कम समय था, इसलिए मैं केवल शहर उत्‍तरी में ही थोड़ा घूमा लेकिन उससे ही बदलाव की झलक दिख गई। सिविल लाइंस तो काफी बदल गया है। अब वह खाली और उदास घूरने वाले बंगलो का सिविललाइंस न हो कर मल्‍टी स्‍टोरी और नई इमारतों वाला हो गया है। रात के समय तो उसकी जगमग देखते ही बनती है। हां, मीना बाजार और उसके आसपास का इलााका जरूर पहले जैसा है। एल्‍चिको की इमाारत भी बड़ी सी हो गई है। सूनी सड़कों पर जाम लगने लगा है। नाजरेथ अस्‍पताल के आसपास का इलाका तो पहचान में ही नहीं आ रहा था। कंपनी बाग में बच्‍चों की भीड़ लगी थी। जब मैं कैब से जार्ज टाउन जा रहा था तो बस हिंदू हॉस्‍टल ही अपनी पहले जैसी हालत में मिला। पता नहीं उसके अंतेवासी अब भी पहले की तरह होते हैं कि उनमें कुछ बदलाव आया है। आजाद पार्क में इतनी चहल-पहल थी जैसे मेला लगा हो। मधुर ने बताया कि अब आजाद के शहादत स्‍थल जाने के लिए दस रूपये का टिकट लेना पड़ता है। पर्यटकों की भीड़ लगी थी, वहां। कभी हम जब गंगा नाथा झा संस्‍कृत संस्‍थान की ओर से टूटी सी सड़क से होते हुए आफिस जाते थे तो बायीं ओर चंद्रशेखर आजाद की प्रतिमा अकेले उस पेड़ के सानिध्‍य में उदास खड़ी मिलती थी जो कभी उनकी शहादत का गवाह था और उसकी जड़े तक खोद दिए जाने के बाद उन्‍हीं जड़ों से यह नया वृक्ष निकला था। आज सचमुच शहीदों की चिताओं पर मेले लगने जैसे स्थिति थी। लोग उस स्‍थल को देख कर रोमांचित हो रहे थे जिसने आखिरी गोली तक अंग्रेजों को सामना किया और जब आखिरी गोली अपनी कनपटी पर मारी तो भी अंग्रेजों की हिम्‍मत उनके पास जाने की नहीं हो रही थी। इतमीनान होने के बाद ही वे उनके शव के पास गए। लोग जरूर यह सोच रहे होगें कि वह मां कैसी रही होंगी जिसने इस नरशार्दूल की पैदा किया। आजाद की मां को यह विश्‍वास था कि अंग्रेज उनके बेटे को कभी मार नहीं स‍कते। उन्‍होंने उनकी शहादत का खबर पर कभी यकीन ही नहीं किया।

भारद्वाज पार्क के आसपास भी मेले जैसा था। रविवार होने के कारण भी ऐसा हो सकता था। बच्‍चे,जवान,बूढ़े सबकी भीड़ थी। खाने पीने के स्‍टॉल पर लगी भीड़ देख मधुर ने कहा देखिए लोग कहते हैं कि गरीबी बढ़ी है,बेरोजगारी है।यहां कहीं वे दिखती है क्‍या। कर्नलगंज, कटरा कचहरी होते हुए जब मैं सिविल लाइंस और हाईकोर्ट की ओर निकला तो बहुत बदलाव दिया। सड़कें काफी चौड़ी हो गई थीं। पहले अधिकतर सड़कें सिगल लेन थी अब सब डबल लेन की हो गई हैं। सबसे अधिक बदलाव तो रेलवे स्‍टेशन का हुआ है। वहां नित्‍य कुछ न कुछ नया बनता रहता है। सिविल लाइंस की तरफ का स्‍टेशन काफी खुला और फैला सा हो गया है। एस्‍कलेटर लग गए हैं लेकिन वे थोड़े कोने में होने के कारण लोग उसका इस्‍तेमाल नहीं कर पा रहे थे। मैने कुंभ में शहर में हुए बदलाव और साज-सज्‍जा के बारे में सुना और पढ़ा था,इसबार उसका एक अंश देखा। क्‍या यही बदलाव शहर के अन्‍य हिस्‍सों में भी हुआ है।

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