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 “बर्फियालाल जुआँठा ”: हरिकांत त्रिपाठी IAS

मंत्री जी एकाएक मेरी ओर मुख़ातिब हुए और बोले – एस डी एम साहब आपने मेरे साथ प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया ! आपने मेरे साथ बैठने के पूर्व बैठने के लिए मेरी अनुमति नहीं ली ? मैं भौंचक सा उठकर खड़ा हो गया!

फिर क्या हुआ, आगे पढें…..!

संस्मरण:

 कबिरा खड़ा बाज़ार में’-11 :

हरिकान्त त्रिपाठी IAS

लेखक: हरिकान्त त्रिपाठी सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं

 “बर्फियालाल जुआँठा
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नब्बे के दशक में बोफ़ोर्स का शिगूफ़ा ख़ूब चला और मांडा के राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह को दिल्ली की सल्तनत की गद्दी पर बैठा दिया । राजा ने उसके बाद भारत का इतिहास तो नहीं पर भविष्य ज़रूर बदल दिया। राजा ने जनता दल का गठन किया जिसके फलस्वरूप उत्तर प्रदेश के राजनीतिक क्षितिज पर एक नये यादव क्षत्रप मुलायाम सिंह का धूमकेतु की भाँति उदय हुआ जिनका अभी वर्तमान भाजपा सरकार के पूर्व तक बहन जी के साथ सत्ता का see saw का खेल चलता रहा। माननीय मुलायम सिंह जी 5 दिसम्बर 1989 को लखनऊ में गद्दीनशीन हुए और 1 वर्ष 201 दिन तक यानि 24 जून 1991 तक सरकार को अपनी पहलवानी से चलाते रहे ।

यह तब की बात है जब उत्तराखंड वृहद् उत्तर प्रदेश का भाग हुआ करता था । उसी दौरान माननीय मुलायम सिंह जी ने बर्फियालाल जुआँठा नामक एक अध्यापक को पर्वतीय विकास विभाग का कैबिनेट मंत्री नियुक्त कर दिया । जुआँठा जी पहली बार विधायक बने थे, पर किसी सोशल इन्जीनियरिंग के तहत उन्हें पूरे कुमाऊँ मण्डल और गढ़वाल मण्डल का भाग्यनियन्ता बना दिया गया । यह विभाग उस समय बहुत महत्वपूर्ण होता था और इसी विभाग के माध्यम से ही दोनों मण्डलों के सभी विभागों के बजट जारी होते थे ।

पर्वतीय विकास मंत्री पहाड़ी क्षेत्रों का मिनी मुख्यमंत्री जैसा होता था । बाद में इस विभाग का नाम उत्तरांचल विकास विभाग कर दिया गया था । यह सारा कुछ काशी सिंह ऐरी की उत्तराखंड क्रांति दल की अलग उत्तराखंड की माँग की बढ़ती लोकप्रियता के कारण किया जा रहा था । जुआँठा जी सीधे सादे मास्टर और लगभग अराजनैतिक व्यक्ति थे । वे सिगरेट का सुट्टा उसी तरह लगाया करते थे जैसे गाँव में बीड़ी पीने वाले बीड़ी के पीने वाले साइड को मुट्ठी में करके और मुट्ठी से धुआँ खींच कर ज़ोरदारी से मुँह खोल कर ढेर सारा धुँआ बाहर फेंक देते हैं । हो सकता है मंत्री बनने से पहले बीड़ी के ही शौक़ीन रहे हों । छोटे क़द के दुबले पतले टोपी लगाने वाले मास्टर की तरह दिखते भी थे ।

मंत्रालय सँभालने के बाद सबसे पहले बर्फियालाल जुआँठा जी सितारगंज पधारे। वे बरास्ते खटीमा पिथौरागढ जाना चाहते थे । मैं उस समय खटीमा का एस डी एम हुआ करता था । खटीमा सब डिविज़न में दो तहसीलें होती थीं , खटीमा और सितारगंज । यानि कि एस डी एम खटीमा के अधीन दो तहसीलदार होते थे । जब मुझे मंत्री जी के आगमन की सूचना मिली तो मैं क्षेत्राधिकारी पुलिस के साथ मंत्री जी का स्वागत को पी डब्ल्यू डी गेस्ट हाउस सितारगंज पहुँच गया । मंत्री जी का क़ाफ़िला पहुँचा तो हमने मंत्री जी को अभिवादन किया और उन्हें सादर गेस्टहाउस के अन्दर ले गये और मंत्री जी की चाय आदि से अभ्यर्थना के लिए उनके समक्ष बैठ गए।

मंत्री जी एकाएक मेरी ओर मुख़ातिब हुए और बोले – एस डी एम साहब आपने मेरे साथ प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया ! आपने मेरे साथ बैठने के पूर्व बैठने के लिए मेरी अनुमति नहीं ली ?

मैं भौंचक सा उठकर खड़ा हो गया! मैंने कहा- माननीय मैं तो आपका स्वागत कर आपकी अभ्यर्थना के लिए अन्दर आया और मैंने तो आजतक कभी भी अभ्यर्थना के दौरान किसी भी वी आई पी से बैठने की अनुमति नहीं माँगी । वे बोले- आप लोगों को अपनी कांग्रेसी मानसिकता बदलनी पड़ेगी । हमारी सरकार ग़रीबों की सरकार है । अब कोई अतिक्रमण हटाओ अभियान नहीं चलेगा । हम लोगों को बसाने में यक़ीन करते हैं उजाड़ने में नहीं । आपके द्वारा हमारी पार्टी के कार्यकर्ताओं के उत्पीड़न की शिकायत भी मिली है ।

मैंने कहा- जब तक यह स्पष्ट न हो कि किसका उत्पीड़न मैंने किया है, मैं क्या कह सकता हूँ, बहरहाल मैं खटीमा जा रहा हूँ अब आप हमें अनुमति दें । और मैं खिन्न मन खटीमा वापस लौट कर सरकारी काम में व्यस्त हो गया ।

मेरे गेस्टहाउस से निकलते ही माहौल तनावपूर्ण हो गया । राजस्व विभाग का स्टाफ़ भी गेस्टहाउस से तहसील चला गया । सितारगंज के निवासियों ने माननीय मंत्री जी की लानत मलामत शुरू कर दी । मंत्री जी ने कहा कि कुछ कार्यकर्ताओं ने एस डी एम साहब की शिकायत की है कि वे कांग्रेस समर्थक हैं और वे एन डी तिवारी जी के द्वारा ज़िले में लाये गये हैं । सितारगंज वालों ने शिकायत को निराधार बताया और कहा कि एस डी एम साहब की कार्यप्रणाली साफ़ सुथरी और निष्पक्ष है । मंत्री जी ने अफ़सोस जताया और कहा कि उनसे भूल हो गई ।

सितारगंज के बाद मंत्री जी खटीमा पहुँचे तो गेस्टहाउस में फिर मुझे बुलवाया । मैं मन से खिन्न था और जाना नहीं चाहता था, पर नौकरी की थी , मजबूरी थी मुझे मन मार कर जाना ही पड़ा । मंत्री जी ने बड़ी गर्मजोशी से मेरा स्वागत किया और बोले –एस डी एम साहब मुझसे आपकी ग़लत शिकायत की गई थी, मुझे अफ़सोस है और अब मुझे पता चल गया है कि आप बहुत अच्छे अधिकारी हैं , जो हुआ उसे भूल जाइए ।

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