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 “आख़िरी नवाब ”: हरिकांत त्रिपाठी IAS

 

…लखनऊ की नज़ाकत और नफ़ासत की संस्कृति पूरी दुनिया में मशहूर है । कहते हैं, लखनऊ वाले “पहले आप …पहले आप “ करते-करते ट्रेन छोड़ देते हैं । पूजन , भजन , कीर्तन , स्नान और मंदिरों के घंटा-ध्वनि के कारण बनारस की सुबह तो ठुमरी , ख़याल , कत्थक और ग़ज़लों की गमक से झंकृत अवध (लखनऊ) की शामें निहायत हसीन मानी जाती थीं  …

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संस्मरण:

 ‘कबिरा खड़ा बाज़ार में’-15 :

हरिकान्त त्रिपाठी IAS

लेखक: हरिकान्त त्रिपाठी सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं

 “आख़िरी नवाब”

मेरे नाना बद्री प्रसाद पाण्डेय अपने दोनों बड़े भाइयों तालुक़दार पाण्डेय और राम अचल पाण्डेय के विपरीत पढ़ाई-लिखाई से दूर रहे पर निकले पूरे निरक्षर भट्टाचार्य। उनके पिता यानी मेरे परनाना भागीरथी पाण्डेय भी निरक्षर थे। हालाँकि उनके पिता कुलवंत पाण्डेय साक्षर थे और उनको इतिहास का बहुत अच्छा ज्ञान था । यह किसी इतिहास की पुस्तक का ज्ञान नहीं था , यह पीढ़ी दर पीढ़ी श्रुत इतिहास था जो ‘आंखिन देखी’ पर आधारित था । मेरे नाना बद्री पाण्डेय ने अपने पितामह कुलवंत पाण्डेय से न केवल अपने पाण्डेय वंश का पूरा ख़ानदानी शजरा कंठस्थ कर लिया, अपितु फ़ैज़ाबाद के नवाबों का पूरा इतिहास भी जान लिया । मैं बहुत छोटा था तो लोग उनसे शजरा जानने और इतिहास पर चर्चा के लिए आते तो मैं बहुत ध्यान से सुनता । अवध के नवाब शुजाउद्दौला, उनकी प्रभावशाली पत्नी बहू बेगम और उनके मशहूर दानवीर पुत्र आसफ़ुद्दौला की कहानी मैंने उनके मुँह से सुनी । वे कहा करते थे कि जिसको न दे मौला उसको दे आसफ़ुद्दौला ।

मुग़लों का एक सरदार खोरासानी सआदत अली खान फ़ारस (ईरान) के निशाबुर के कोरागुयन्लु वंश का था जिसकी बहादुरी से खुश होकर मुग़ल बादशाह ने 1732 में अवध की जागीर सौंप दी और फ़ैज़ाबाद उसकी राजधानी बना । सआदत अली खान के नाम पर अब भी फ़ैज़ाबाद में सआदत गंज नाम का मुहल्ला है । वह गुलाबबाडी भी है जहाँ उसे दफ़नाया गया । इसी ख़ानदान में एक नवाब शुजाउद्दौला खान हुए जिनकी पत्नी उम्मत-उल-ज़ोहरा उर्फ़ बहू बेगम बहुत लोकप्रिय और इन्तज़ाम निपुण महिला थीं । शुजाउदौला की मृत्यु के बाद 1775 में उनका बेटा आसफ़ुद्दौला नवाब बना जो अपनी उदारता, धर्मनिरपेक्षता और प्रजापरायणता के लिए बहुत मशहूर हुआ । यह संयोग ही था कि आसफ़ुद्दौला की अपनी माँ बहू बेगम से नहीं बनी और माँ की सख़्ती से बचने के लिए आसफ़ुद्दौला ने लखनऊ को अपनी राजधानी बना ली ।

1784 के अकाल में प्रजा की मदद के लिए बड़ा इमामबाड़ा का निर्माण शुरू हुआ जिसे गरीब लोग बनाते थे और अमीर लोग, तीसरे दिन, जितना बना होता था उसे तोड़ देते थे ताकि रोज़गार सृजन बना रहे । इस निर्माण में प्रतिदिन 20 हज़ार लोगों को काम मिलता था। आसफ़ुद्दौला ने लखनऊ में फूलों की होली की शुरुआत कराई और मुहर्रम के दौरान भी होली में नवाब शरीक होता था ।
लखनऊ की नज़ाकत और नफ़ासत की संस्कृति पूरी दुनिया में मशहूर है । कहते हैं, लखनऊ वाले “पहले आप …पहले आप “ करते-करते ट्रेन छोड़ देते हैं । पूजन , भजन , कीर्तन , स्नान और मंदिरों के घंटा-ध्वनि के कारण बनारस की सुबह तो ठुमरी , ख़याल , कत्थक और ग़ज़लों की गमक से झंकृत अवध (लखनऊ) की शामें निहायत हसीन मानी जाती थीं । लखनऊ को इस सांस्कृतिक उत्थान का केन्द्र बनाने का श्रेय काफी कुछ लखनऊ के आख़िरी नवाब वाजिद अली शाह अख़्तर को जाता है । धर्मनिरपेक्ष नवाब वाजिद अली शाह भी दौरान मुहर्रम होली का त्योहार पड़ जाने पर होली खेलते थे। उनका एक होली गीत उनकी उदारता बयाँ करता है- मोरे कान्हा जो आये पलट के – अब के होली मैं खेलूँगा डट के।

नवाब वाजिद अली शाह को ख़ूबसूरत औरतों , तरह-तरह के ज़ायक़ेदार खाने और कला-संस्कृति में बेहद रुचि थी । वह खुद बढ़िया चिकनकारी अपने हाथों से करते थे। आज का भातखंडे संगीत विश्वविद्यालय नवाब वाजिद अली शाह का परीखाना होता था जहाँ ख़ूबसूरत बाँदियां रखी जाती थीं । इन बाँदियों को संगीत नृत्य की उत्कृष्ट शिक्षा दी जाती थी । लखनऊ का कत्थक नृत्य शास्त्रीय नृत्य की उत्कृष्ट विधा है । पंडित बिंद्रादीन से शुरू होकर बिरजू महराज तक उसी परम्परा की देन हैं । नवाब ख़ुद भी कत्थक में शामिल होते थे, बाँदियां गोपिकाओं और नवाब कृष्ण की भूमिका में हुआ करते थे। परीखाने की बाँदी पर दिल आ जाने पर वो नवाब की बेगम बन जाती थी ।

1857 में स्वतन्त्रता संग्राम का नेतृत्व करते हुए अंग्रेजों के दांत खट्टे कर देने वाली बेगम हज़रत महल इसी परीखाने से निकलीं थीं और भांडों मीरासियों की मदद से वे अंग्रेज़ी सेना से 1859 तक लड़ते हुए लखनऊ को बचाये रखा और कमज़ोर पड़ जाने पर नेपाल चली गईं और जीवन भर हार न मानने वाली बेगम की 1882 में वहीं मृत्यु हो गयी । नवाब ने निकाह और मुता सहित कुल 300 शादियाँ की थीं । नवाब स्वयं ग़ज़लें लिखता था और साहित्य, कला , संगीत का बहुत बड़ा संरक्षक था।

अंग्रेजों ने अवध राज्य को हड़पने के लिए राज्य में बदइंतज़ामी का बहाना बनाकर नवाब वाजिद अली शाह को 1856 में ही पकड़ कर कलकत्ता के मटियाबुर्ज में निर्वासित कर बाद में नज़रबंद कर दिया । लखनऊ से निर्वासन का नवाब को बड़ा मलाल था और छोड़ते वक़्त नवाब ने कालजयी ठुमरी “ बाबुल मोरा नैहर छूटा जाय” लिखा जो नीचे उद्धृत है । एक ग़ज़ल भी लिखा जिसे नीचे दिया जा रहा है । संगीत, साहित्य और कला के इस पुरोधा को बदनाम करने के लिए अंग्रेजों ने यह कहा कि जूतियाँ पहनाने के लिए बाँदियाँ न होने के कारण नवाब भाग न सका और गिरफ़्तार हो गया ।
बहरहाल मटियाबुर्ज में खाने पीने की सुखसुविधा के बीच नज़रबंद नवाब वाजिद अली शाह के दुखद जीवन का अन्त हुआ ।

नोटईरान के शीर्ष धार्मिक नेता अयातुल्ला खुमैनी के पूर्वज भी ईरान के नीशाबुर से अवध के पहले नवाब के ही साथ भारत आये थे । अयातुल्ला खुमैनी के दादा सैयद अहमद मुसावी हिंदी का जन्म बाराबंकी के किन्तूर में हुआ था । सैयद अहमद 1830 में ईराक़ के नजफ़ में धार्मिक यात्रा के लिए गए और फिर भारत वापस नहीं लौटे ।

ग़ज़ल

दर-ओ-दीवार पे हसरत से नज़र करते हैं
ख़ुश रहो अहल-ए-वतन हम तो सफ़र करते हैं

उल्फ़त ने तिरी हम को तो रक्खा न कहीं का
दरिया का न जंगल का समा का न ज़मीं का

यही तशवीश शब-ओ-रोज़ है बंगाले में
लखनऊ फिर कभी दिखलाए मुक़द्दर मेरा।।

ठुमरी

बाबुल मोरा, नैहर छूटो ही जाए
बाबुल मोरा, नैहर छूटो ही जाए
बाबुल मोरा, मोरा, नैहर छूटो ही जाए
बाबुल मोरा, नैहर छूटो जाए
बाबुल मोरा, नैहर छूटो ही जाए
चार कहार मिल, मोरी डोलिया सजावें रे
चार कहार मिल, मोरी डोलिया सजावें
चार कहार मिल, मोरी डोलिया सजावें रे
मोरा अपना बेगाना छूटो जाए
बाबुल मोरा, नैहर छूटो ही जाए
अँगना तो परबत भयो और देहरी भई बिदेश
अँगना तो परबत भयो और देहरी भई बिदेश
लै बाबुल घर आपनो, मैं चली पिया के देश
बाबुल मोरा, नैहर छूटो जाए
बाबुल मोरा, नैहर छूटो ही जाए।।

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