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‘कबिरा खड़ा बाज़ार में’-6 : हरिकान्त त्रिपाठी

संस्मरण: अनुभव का संसार!

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लेखक: हरिकान्त त्रिपाठी सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं

* 1992-93 की बात है। मैंने सिद्धार्थनगर जिले में बतौर उप संचालक चकबंदी नया पद भार सम्भाला । तब मेरा बेटा मात्र 2-3 साल का था । सिद्धार्थनगर जिले का सृजन पुराने बस्ती जिले के उत्तरी भाग की तीन तहसीलों डुमरियागंज , बाँसी और नौगढ को काटकर किया गया । 1988-89 में कांग्रेस का राज चल रहा था और काफी राजनैतिक उथल पुथल चल रहा था । प्रदेश के मुख्यमंत्री नारायणदत्त तिवारी जी राजनीति के चाणक्य थे । कांग्रेस के गिरते ग्राफ को गिरने से बचाने के लिए तिवारी जी नये नये फ़ार्मूले निकाल रहे थे ।

मार्च 1988 से अक्टूबर 1989 तक तिवारी जी सोनभद्र, मऊ, महराजगंज और सिद्धार्थनगर का निर्माण कर डाले । वे बड़े नाटकीय अन्दाज़ में डी एम और एस पी को अपने हेलीकॉप्टर पर बैठा कर ले जाते और मंच से ही नये जिले की घोषणा करते और डी एम व एस पी को पब्लिक को दिखा कर समर्पित कर देते । सिद्धार्थनगर का सृजन 23 दिसम्बर की अधिसूचना से 29 दिसम्बर 1988 को हुआ । प्रथम ज़िलाधिकारी हौसला प्रसाद वर्मा साहब ने अथक परिश्रम से नौगढ टाउन एरिया को जिले का स्वरूप दिया ।

मैं इस जिले का डी डी सी नहीं बनना चाहता था क्योंकि यह मेरे गृह जिले बस्ती से टूट कर बना था और मैं चकबंदी के मुक़दमों में अपने रिश्तेदारों और पिताजी की सिफ़ारिशें नहीं सुनना चाहता था । लगभग चार साल की बेटी के लिए अच्छे स्कूल की चिन्ता तो थी ही । मैं इस नवसृजित जिले का पहला उपसंचालक चकबंदी बन रहा था जहाँ कार्यालय के लिए न भवन , न काम करने वाले कर्मचारी और न वाहन , न टेलीफ़ोन और सैकड़ों कर्मचारियों पर नियन्त्रण व बिगड़ी कार्य संस्कृति को सुधारने की ज़िम्मेदारी अलग से । ज़िलाधिकारी अविनाश कुमार श्रीवास्तव ने शासन में इतना दबाव बना दिया कि मुझे ज्वाइन ही करना पडा ।

जैसे तैसे तमाम आशंकायें मन में लिए सिद्धार्थनगर पहुँचा और पी डब्ल्यू डी के अतिथिगृह पर डेरा डाल दिया । सिद्धार्थनगर में कोई ढंग का रेस्तराँ तक नहीं था जिससे खाना मँगाकर खा सकता । एक रेस्तराँ से खाना मँगाया गया जो किसी तरह पेट भरने लायक था । दही मँगाया तो पता लगा दुकानदार ने पहले से ही उसमें चीनी मिला रखी है । मैंने कहा कि ये चीनी डालकर क्यों लाये हो तो बताया गया कि यहाँ जमाते वक़्त ही चीनी डाल दी जाती है और सादी दही पूरे बाज़ार में नहीं मिलेगी । मैंने सिर पीट लिया ।

अगले दिन डी एम अविनाश कुमार श्रीवास्तव जी से मिला तो वे बडे खुश हुए। उन्होंने मेरे लिए नौगढ थाने के सामने लगभग बनकर तैयार बी टाइप मकानों में से सबसे अच्छा मकान एलाट कर रखा था । मुझे एक आशंका से मुक्ति मिली कि अब बाज़ार में रहने लायक मकान तो न ढूँढना पड़ेगा जो नौगढ जैसी जगह पर पाना आसान नहीं था । मैं सीतापुर से अपना परिवार और सामान लेकर नौगढ शिफ़्ट कर गया ।

कार्यालय देखने निकला तो जो मुझे दिखाया गया उसे देख कर मेरा दिल रो पडा। डी एम रेज़ीडेंस के सामने एक लम्बा बरामदा था जिसके दोनों छोर पर एक-एक छोटे कमरे बने हुए थे । कमरों में अभिलेख रखे जाते थे और बरामदे में मेज़ कुर्सी लगाकर अधिकारी मुक़दमे सुना करते थे । बरामदा अत्यन्त जर्जर था , लगता था कि अब गिरा कि तब गिरा । दीवारों पर चूना लगे भी बीसों साल हो चुके रहे होंगे । मैंने उस बरामदे में कोर्ट करने से इन्कार कर दिया । मैंने कहा कि यहाँ बैठकर न्यायालय शब्द की गरिमा गिराने के बजाय मैं चाहूँगा कि सरकार मेरे विरुद्ध कार्रवाई करके मुझे यहाँ से हटा दे ।

शाम तक यह ख़बर वकीलों में चर्चा का बिन्दु बन गयी । वकील अनिरुद्ध पाण्डेय “दैनिक स्वतन्त्र भारत “के पत्रकार थे । उन्होंने बड़ी सी न्यूज़ मेरे विरुद्ध निकाल दी । न्यूज़ में मेरी भूरि भूरि आलोचना की गई थी कि बहुत बडे बडे अधिकारी उसी बरामदे में कोर्ट कर चुके और मैं एस डी एम से नया नया प्रोन्नत जूनियर अधिकारी वहाँ कोर्ट करने से मना कर रहा हूँ ।

न्यूज़ डी एम साहब ने देखी तो उन्होंने मुझे तहसील मे एक नायब तहसीलदार के लिए बने छोटे से कोर्ट में बैठ कर मुकदमे करने की अनुमति दे दी । मेरे लिए वह भी अपमानजनक ही था । पर तब तक तहसील के भवन में ही कलेक्ट्रेट चल रही थी और केवल एक कोर्ट नया बना था जिसमें डी एम और ए डी एम बारी-बारी दिन बाँट कर बैठा करते थे । बरामदे के मुक़ाबले तो यह छोटा सा कोर्ट स्वर्ग जैसा लगा क्योंकि यहाँ डायस कोर्ट जैसा बना तो था जहाँ बैठकर इजलास में बैठे होने का कुछ अहसास तो होता था । जब कोर्ट में बैठने लगा तो बस्ती से कलेक्टर साहब और वकीलों ने मुकदमें की फ़ाइलें मंगवानी शुरू कर दीं । जिले में एक सहायक बन्दोबस्त अधिकारी चकबंदी राम सनेही मिश्र जी तैनात थे , उनसे स्टाफ़, चपरासीगण , पेशकार , अहलमद , टाइपिस्ट माँग कर काम शुरू कर दिया ।

चकबंदी के मुक़दमों में चक के मुकदमे बहुत होते हैं और उसके लिए मौक़ा मुआयना बहुत ज़रूरी होता है । मैं एक साथ एक ही दिन कई गाँवों का मौक़ा मुआयना लगा देता था और ए एस ओ सी की गाड़ी मंगवाकर मौक़ा मुआयना कर लिया करता था । काग़ज़ , गाड़ी वग़ैरह के लिए अपने अधीनस्थ ए एस ओ सी पर आश्रित था । धीरे धीरे काम तो शुरू कर पाया पर आगे अभी बहुत लड़ाई बाक़ी थी ।

सिद्धार्थनगर पूरी तरह उद्योग-शून्य ज़िला है । अधिकांश लोगों की जीविका कृषि पर आधारित है । उस दौरान चकबन्दी पूरे ज़िले की राजनीति के केन्द्र में हुआ करती थी । मेरे सिद्धार्थनगर के उप संचालक चकबन्दी के पद पर ज्वाइन करने के पहले यह ज़िला बस्ती के उप संचालक चकबन्दी के अधीन था । सिद्धार्थनगर में उप संचालक चकबन्दी का पद न होने और ज़िले की जनता में चकबन्दी में व्याप्त भ्रष्टाचार, उत्पीड़न और विलम्ब के प्रति गहरा असन्तोष देख कर ही ज़िलाधिकारी अविनाश कुमार श्रीवास्तव ने उप संचालक चकबन्दी सिद्धार्थनगर का पद सृजित कराया और मुझे ज्वाइन कराने के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगा दिया ।

मेरे ज्वाइन करने से बस्ती के चकबन्दी वालों को बहुत तकलीफ़ हुई । वे इस ज़िले को कमाई के लिहाज़ से सऊदी कहा करते थे । इटवा , डुमरियागंज की बहुतायत आबादी मुम्बई से जुड़ी थी । मुम्बई में रह कर यहाँ के लोगों ने बड़े बड़े धन्धे जमा लिए थे । इन लोगों ने मुम्बई में बहुत पैसा कमाया पर हमेशा अपनी जड़ों से जुड़े रहे । वे यहाँ ज़मीनें ख़रीदते थे और विशाल कोठियाँ बनवाया करते थे । यहाँ तक कि इस ज़िले के नेतागण उन्हीं के पैसों से चुनाव लड़ा करते थे । मुम्बई के इन लोगों को ज़िले में सेठ कहा जाता था । इनकी वजह से ही इटवा, डुमरियागंज में सड़क के किनारे की ज़मीनें सड़क पर लम्बाई नाप कर सोने के भाव पर प्रति फुट की दर से बिका करती थीं । ऐसे में चकबन्दी वालों के लिए कमाने का इससे बेहतर और कौन सा ज़िला हो सकता था ?

इस ज़िले में कोई उद्योग-धन्धा भले न हो पर मुम्बई के सेठों के साथ साथ नेताओं के लिए भी इसकी भूमि बहुत उर्वरा है । इस ज़िले ने बाबू माधव प्रसाद त्रिपाठी, केशव देव मालवीय, क़ाज़ी जलील अब्बासी , मलिक कमाल यूसुफ़, माता प्रसाद पाण्डेय जैसे बड़े बड़े नेता देश को दिया । ज़िले के बड़े हिस्से में चकबन्दी चलने के कारण नेताओं का मुख्य काम चकबन्दी के मुक़द्दमों में सिफ़ारिश करना था । वे मुक़दमे से सम्बन्धित एप्लिकेशन्स लोगों से ले लेकर मेरे घर पर वक़्त बेवक़्त धावा बोलते और दबाव बनाते कि कोर्ट में दोनों पक्षों के वकीलों को सुनकर पारित होने वाले आदेशों को वहीं घर पर ही उसी एप्लिकेशन पर पारित कर दूँ ।

मैं बतौर एस डी एम क़ायदे से कोर्ट की मर्यादा बनाये रखकर न्यायिक काम करने का आदी था, सो मुझे यह बहुत विचित्र लगता । मैं उन्हें क़ानून समझाने की कोशिश करता तो उल्टे वे मुझे ही समझाने लगते कि यह चकबन्दी का मुक़द्दमा है यहाँ ऐसे ही चलता है । मलिक कमाल यूसुफ़, माता प्रसाद पाण्डेय, स्वयम्बर चौधरी, जिप्पी तिवारी जैसे नेताओं का दबाव झेलना आसान नहीं था ।

मैं अब मजिस्ट्रेट भी नहीं था कि पुलिस मेरे अधीन होती । फिर भी मैंने नैतिक साहस के बल पर विनम्रतापूर्वक पर दृढ़ता से न्यायिक आदेश घर पर करने से मना कर दिया । नाराज़ तो सभी हुए और बड़बड़ाते हुए घर से विदा हो गये पर जिप्पी तिवारी फ़ौजदारी को आमादा हो गये । जब मैं तब भी नहीं दबा तो मुझे देख लेने की धमकी देते हुए चले गये । यह वही जिप्पी तिवारी विधायक डुमरियागंज थे जिन्होंने कुछ ही दिनों पहले ए डी एम वित्त एम ए खान साहब की कलेक्ट्रट के उनके कार्यालय में ही पिटाई कर दी थी । अगले दिन मेंने जिप्पी तिवारी के व्यवहार के बारे में ए डी एम विष्णु स्वरूप मिश्रा को बताया तो उन्होंने ने मुझसे कहा कि आप आराम से काम करिए मैं जिप्पी तिवारी से बात कर लूँगा और आप को अब आगे कोई दिक़्क़त न आयेगी । वे डुमरियागंज के तब एस डी एम हुआ करते थे जब जिप्पी तिवारी अपनी राजनीतिक पारी शुरू कर रहे थे ।

एक दिन कलेक्टर का जनता दरबार लगा हुआ था । अविनाश कुमार श्रीवास्तव साहब की अध्यक्षता में जनता की समस्याओं पर सुनवाई और निराकरण की कार्रवाई चल रही थी । एक कांग्रेसी नेता अख़्तर मेरे सामने आकर बैठ गये। अख़्तर ने मुझसे कहना शुरू किया कि एक गाँव की चकबन्दी में बहुत गड़बड़ियाँ हैं और मैं उस गाँव की चकबन्दी निरस्त कर दूँ । मैंने अख़्तर को समझाने का प्रयास किया कि किसी गाँव की चकबन्दी निरस्त कर देने से तमाम जटिलताएँ पैदा हो जाती हैं, कुछ लोग नये पुराने दोनों चकों पर क़ब्ज़ा किये रहते हैं तो कुछ किसानों का कहीं भी क़ब्ज़ा नहीं रहता । चकबन्दी निरस्त करने का आदेश न्यायालय में पक्षों के सुनवाई के पश्चात कोई अन्य विकल्प न रहने पर असाधारण परिस्थितियों में ही पारित किया जाता है , यहाँ जनता दरबार में ऐसे प्रकरण पर निर्णय नहीं लिया जा सकता । अख़्तर अकड़ते जा रहा थे और बोले कि चकबन्दी में सब चलता है। आप उस गाँव की चकबन्दी निरस्त कर दीजिए ।

कलेक्टर अविनाश कुमार श्रीवास्तव का कान हमारे वार्तालाप पर ही लगा हुआ था । अख़्तर के इतना कहते ही वे ज़ोर से चिल्ला कर बोले कि अख़्तर तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे डी डी सी से इस तरह बात करने की ? अगर दुबारा तूने न्यायिक कार्य में हस्तक्षेप किया तो सरकारी कार्य में व्यवधान पैदा करने के इल्ज़ाम में तुझे अन्दर करवा दूँगा । मुझसे बोले कि आप इसके दबाव में क़तई न आइयेगा, अगर दोबारा ये आपके पास आता है तो मुझे बताइएगा, मैं इसका ठीक से इलाज करवा दूँगा । अख़्तर उठ कर ऐसे भागे जैसे उनके पीछे कोई शेर लग गया हो ।

सिद्धार्थनगर के नेतागण भी बहुत बीहड़ हुआ करते थे । किसी जमाने मे डुमरियागंज में एक ऐसे एस डी एम तैनात थे जो अंग्रेजों के पीरियड वाली मानसिकता के अधिकारी थे। वे मेज के पीछे एक कुर्सी पर बैठते थे और वहाँ कोई दूसरी कुर्सी नहीं होती थी। जो भी उनसे मिलने आता वह मजबूरन खड़े-खड़े ही उनसे बात करता । लोगों की इस बेइज़्ज़ती से नाराज़ माता प्रसाद पाण्डेय और कमाल यूसुफ़ मलिक ने एक दिन अपने सैकड़ों समर्थकों के साथ उस इकलौती कुर्सी पर कब्ज़ा जमा लिया और एस डी एम के विरूद्ध भाषणबाजी शुरू कर दी। बड़ी मुश्किल से लाठीचार्ज के बाद एस डी एम साहब की कुर्सी मुक्त कराई जा सकी ।

बप्पा बहुत बड़े मुक़दमेबाज थे । दरअसल उन्हीं के डर से मैं सिद्धार्थनगर में डी डी सी के पद पर आना ही नहीं चाहता था । वे उर्दू के पढ़े पुराने मिडिलची थे और अक्सर डींग मारते रहते थे कि वे मिडिल के ज़िले के टॉपर थे । राजस्व क़ानूनों का उनका ज्ञान पूरे इलाक़े में सन्दर्भ ग्रंथ की तरह ही माना जाता था । उनकी हाथी के दांत की गुनिया हमें बहुत आकृष्ट करती थी । जब वे गुनिया से नक़्शे पर नाप कर खेतों की लम्बाई चौड़ाई बताते थे तो हमें दुनिया में उनसे बड़ा कोई विद्वान नज़र न आता था । उन्होंने पूरी ज़िन्दगी मुक़दमेबाजी को समर्पित कर दिया । सत्यनारायण तिवारी अक्सर उनसे कहा करते थे कि आप तो गाय के पेट को फाड़ कर भी ज़मीन मिले तो भी ज़मीन न छोड़ेंगे । बप्पा हँस कर कह देते थे कि तुम कौन सा छोड़ देनेवाले हो । अब ऐसे में बप्पा बग़ल के ज़िले में तैनात डी डी सी बेटे से किसी के मुक़दमे में सिफ़ारिश न करें , ये कैसे सम्भव था ।

जिसका डर था वही हुआ । एक दिन बस से बप्पा बोरी में घर की कौड़ कर बनाई अपने खेतों की अरहर की दाल और घी लेकर सिद्धार्थनगर पहुँच गए । मेरी पत्नी को बेहद मानते थे । मुझसे तो बोलचाल बहुत ही कम होती थी तो बेटे के हिस्से का प्यार भी बहू को देकर सन्तुष्ट हो लेते थे । उनके पहुँचते ही प्रणाम वग़ैरह करके मैं चिन्तित सा घर के अन्दर चला गया और पत्नी से बोला- तुम समझ लो , अगर मुक़दमे की सिफ़ारिश बप्पा ने किया तो झगड़ा हो जायेगा, मैं बर्दाश्त नहीं कर पाऊँगा । पत्नी बोली- कैसी बात कर रहे हैं आप ! अरे बग़ल के ज़िले में पोस्टिंग है बेटे की तो बप्पा प्यार से अपने पोते-पोती से मिलने आये हैं , वे कोई सिफ़ारिश न करेंगे, ख़ामख़ाह तनाव मत पाले रहिए ! सामान्य रहिए ताकि बप्पा को ख़राब महसूस न हो ।

तीन दिन बप्पा घर पर रहे और घर में पकवानों की महक हरदम फैली रहती थी । वे मेरी तरह ही थे, पर मुझसे भी दुबले और रंग मुझसे साफ , लम्बाई भी मुझसे बीस ही रही होगी । ७३ साल की उम्र में भी बीसों मील पैदल चलते थे और खाना भी मुझसे दो गुना और बहुत गरिष्ठ खाकर भी डकार न लेते थे । पत्नी के बनाये व्यंजनों की तारीफ़ कर कर के और माँग माँग कर खाते और बच्चों के साथ खेलते रहते थे । तीसरे दिन उनकी बस्ती कोर्ट में किसी मुक़दमे की पेशी थी सो बस पकड़ कर बिना सिफ़ारिश किए ही चले गये तो मुझे साँस आई ।

मैंने पत्नी से कहा- यार बहुत पछतावा हो रहा है! मैंने बप्पा को ग़लत समझा, वे तो वाक़ई बच्चों से ही मिलने आये थे । पत्नी मुस्कराती रही और दुष्टता से बोली कि मैं तो पहले ही आप को समझा रही थी पर आप ही चेहरे पर १२ बजाये घूम रहे थे ।

इस घटना को पन्द्रह बीस दिन ही बीते थे कि पत्नी बहुत डरी सहमी सी मेरे पास आई और बोली- आप नाराज़ न हों तो मुझे आप से एक बात कहनी है । मैंने कहा – हाँ बताओ इतनी परेशान क्यों दिख रही हो ? वो बोली-मेरे कज़िन लल्लू भैया किसी की सिफ़ारिश करने आने वाले हैं , मेरी इज़्ज़त की बात है आप प्लीज़ धैर्य से उनकी बात बस सुन लीजियेगा , करियेगा वही जो सही हो ।

मेरा चेहरा लटक गया । अभी कुछ ही दिन पहले बप्पा की अच्छी ख़ातिरदारी कर पत्नी ने बिना सिफ़ारिश के उन्हें विदा किया था , अब उसके भाई आ रहे हैं तो मैं बहुत बेमुरव्वत तो नहीं ही हो सकता था । मैंने धीरे से सिर हिला दिया और बोला सुन तो लूँगा पर हामी न भरूँगा ।

लल्लू भैया आये और खाये पिये व जाते वक़्त मुझे एक काग़ज़ का टुकड़ा थमा कर ताकीद कर गये कि इसकी मदद करनी है! मैं चुपचाप खून के घूँट पीता रहा और उन्हें प्रणाम कर विदा कर दिया । जब वे चले गये तो पत्नी ने आकर मुझसे कृतज्ञता व्यक्त किया । मैंने कहा चिन्ता न करो, जो सही होगा वही होगा। हो सकता है उसके पक्ष में ही फ़ैसला हो जाये ।

जब उस मुक़दमे का फ़ैसला करने बैठा तो देखा कि सिफ़ारिशी बंदे ने गाँव समाज की भूमि दे ले कर अपने नाम चढ़वा ली थी और तुर्रा यह कि सी ओ और एस ओ सी कोर्ट में सिफ़ारिश या पैसे खिला कर मुक़दमे को अपने पक्ष में फ़ैसला भी करा लिया था ।

मेरे तन बदन में आग लग गई कि लल्लू भैया भी किस बेईमान की सिफ़ारिश करने चले आये । जब उसके पूरे खाते का मिलान कराया तो पाया कि मुक़दमा तो केवल एक ही गाटे का था पर उस बेईमान ने कुल तीन गाटे गांव समाज के अपने खाते में डलवा लिया था । डी डी सी को चकबन्दी में असीमित अधिकार दिए गए हैं । वह जहाँ भी अनियमितता पाये तो बिना किसी से मुक़दमा होने का इंतज़ार किए स्वयं रिकॉर्ड तलब कर स्वयं मुक़दमा दर्ज कर नोटिस देकर अनियमितता दूर कर सकता है । डी डी सी चकबन्दी का सबसे बड़ा न्यायालय होता है । उसके फ़ैसले के विरुद्ध कोई अपील या रिवीज़न की व्यवस्था नहीं है , यदि कोई चाहे तो डी डी सी के फ़ैसले के विरुद्ध हाई कोर्ट में रिट कर सकता है । मैंने उस बेईमान के केवल मुक़दमे वाले गाटे को ही नहीं बल्कि तीनों गाटों को उसके खाते से ख़ारिज कर गाँव सभा में दर्ज करने का विस्तृत फ़ैसला सुना दिया ।

बाद में नीता ने बताया कि लल्लू भैया बहुत नाराज़ हुए कि चलो मेरी सिफ़ारिश न मान कर उसकी मदद नहीं करते तो भी ठीक था पर जब मुक़दमे में केवल एक गाटा ही था तो तीनों गाटा उसके खाते से निकाल कर मुझे अपमानित क्यों कर दिए ? मैं और पत्नी बहुत हँसे । तब पत्नी ने हँसते हुए बताया – सिफ़ारिशी रुक्का तो बप्पा भी आप को देना चाहते थे। पर मैंने उन्हें समझाया कि बप्पा आप तो उन्हें अच्छी तरह जानते ही हैं, यदि आप ने सिफ़ारिश किया तो वे हल्ला गुल्ला करने लगेंगे ! आप रुक्का मुझे दे दीजिए और मैं जब वे अच्छे मूड में रहेंगे तो आपकी सिफ़ारिश बता कर मदद के लिए मना लूँगी। जब वे चले गए तो मैंने उनका रुक्का फाड़कर फेंक दिया क्योंकि मुझे पता था कि यदि आपको रुक्का दूँगी तो मैं भी डाँट खा जाऊँगी ।

मैं अपना सिर पकड़ कर बैठ गया ।

सिद्धार्थनगर में कुछ अधिकारियों , पत्रकारों और नेताओं का जमावड़ा ए डी एम विष्णु स्वरूप मिश्रा जी के चैम्बर में ही लगता रहता था । मेरे सहित ज़्यादातर अधिकारियों के पास ख़ुद के ही बैठने के लिए ढंग की व्यवस्था नहीं थी तो ख़ाली समय मिलने पर हम भी ए डी एम चैम्बर में गपशप करने पहुँच जाते थे । वहाँ सारे विधायक, पूर्व विधायक के अतिरिक्त सत्यप्रकाश गुप्ता , रवीन्द्र त्रिपाठी, अनिरुद्ध पाण्डेय, संकठा शुक्ला आदि पत्रकार तो आते ही थे, कभी-कभी कुछ वकील साहबान और न्यायिक अधिकारी भी आ जाते थे । उन्हीं में सिद्धार्थनगर के सी जे एम ( मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी) आर पी मिश्रा भी हुआ करते थे । सी जे एम साहब लम्बे सुदर्शन व्यक्तित्व के कपड़ों के शौक़ीन और विलासिता पूर्ण जीवन शैली के अधिकारी थे । उनकी बातें अक्सर पदीय रुआब-दाब और उच्च जीवन शैली के इर्द-गिर्द घूमती रहती थी । मैं सादगी से रहने वाला था और मुझे उसमें कोई रुचि नहीं थी सो मैं उनसे दिल न मिला पाता और कुछ कटा-कटा रहता । दरअसल मुझे वे कुछ बनतू भी लगते थे । ए डी एम विष्णु स्वरूप उनका बहुत सम्मान करते थे , वैसे न्यायिक अधिकारियों का अतिरिक्त सम्मान करने की प्रशासन और पुलिस में परम्परा भी है और न्यायिक अधिकारी अपने सम्मान के प्रति कुछ अधिक सम्वेदनशील होते भी हैं ।

सी जे एम मिश्रा जी की बहुत सी कहानियाँ ज़िले में प्रचलित थीं । एक बार सी जे एम साहब एक प्राइवेट कार से बस्ती रोड पर कहीं जा रहे थे तो देखा कि सड़क के किनारे पी डब्ल्यू डी वाले कुछ पुलिस कर्मियों को लेकर अतिक्रमण कर बनाई गईं झोपड़ियों को हटा रहे हैं । जिनकी झोपड़ियाँ थीं वे अपना आशियाना टूटते देख रो पीट रहे थे । सी जे एम साहब को यह क्रूरता बर्दाश्त न हुई और वे गाड़ी से उतर कर पूछने लगे कि यह तोड़फोड़ किसके आदेश से की जा रही है? मौक़े पर मौजूद जे ई जो सी जे एम साहब को पहचानता नहीं था, बोला कि आपसे क्या मतलब है ? यह सरकारी काम है आप इसमें दख़लंदाज़ी न करिए ।

यह सुनते ही सी जे एम साहब सिरे से उखड़ गये और बोले- मैं इस ज़िले का सी जे एम हूँ और तुम पूछ रहे हो कि मुझसे क्या मतलब? अरे बिना किसी न्यायिक आदेश के किसी का घर उजाड़ने के इस अपराध का मैं यहीं पर तत्काल संज्ञान लेता हूँ और पुलिस वालों को तुम्हें हिरासत में लेने का आदेश देता हूँ । जे ई और पुलिस वाले घबरा गये और पूरी टीम वहाँ से चुपचाप सरक ली । जे ई ने पूरा वाक़या अपने उच्चाधिकारियों से बताया । पी डब्ल्यू डी के अधिकारियों ने सी जे एम की शिकायत डी एम से की । डी एम ने घटना के बारे में ज़िला न्यायाधीश खेमकरन साहब को बताया तो उन्होंने सी जे एम के विरुद्ध कार्रवाई का आश्वासन देकर मामला शांत कराया ।

सी जे एम साहब व्यवहारिक भी बहुत थे । जब तब इलाहाबाद जाते तो प्रशासनिक न्यायाधीश से ज़रूर मिलते और उनके लिए बढ़नी नेपाल से महँगे विदेशी सामान उपहार में ले जाते । उस समय विदेशी सामान जैसे कैमरे, वीडियोगेम्स , विदेशी शराब , विदेशी क्राकरीज , विदेशी कपड़े आदि भारत में नहीं मिलते थे तो अक्सर लोग बड़े शौक़ से नेपाल ख़रीदारी करने ज़ाया करते थे ।

जब प्रशासनिक न्यायाधीश ज़िले में आते थे तो उनके निरीक्षण के साथ ही उन्हें बढ़नी के तमाम क़ीमती विदेशी सामान सी जे एम साहब गिफ़्ट देते थे। अब यह सब महँगे सामान और खुद का क़ीमती रहन सहन मुफ़्त तो हो नहीं सकता था, सो सी जे एम साहब की शिकायतें उच्च न्यायालय तक पहुँचने लगीं । उन शिकायतों की जाँच उन्हीं प्रशासनिक न्यायाधीश महोदय को मिली जिनको सी जे एम साहब हमेशा ख़ुश रखा करते थे । सी जे एम साहब पर बहुत सारे मज़बूत साक्ष्य के साथ आरोप लगाये गये थे, सो प्रशासनिक न्यायाधीश भी उनकी मदद करने की स्थिति में नहीं रह गये । जब सी जे एम साहब महराजगंज में तैनात थे तो उनके आवास से वन विभाग की अवैध साल और टीक की क़ीमती लकड़ियाँ भी बरामद हुई थीं और मामला अख़बारों की सुर्ख़ियों में रहा ।

सी जे एम साहब ने जब देखा कि प्रशासनिक न्यायाधीश का भी रुख़ उनके अनुकूल नहीं है तो वे the strategic offensive principle of war पर अमल करना शुरू कर दिये। वे पुराने सिद्धहस्त खिलाड़ी थे । उन्होंने प्रशासनिक न्यायाधीश को जो जो सामान गिफ़्ट किया था , सभी सामानों की रसीदें बहुत सँभाल कर रख छोड़ा था । मुझे तब हैरत हुई जब यही काम ग़ाज़ियाबाद ज़िला न्यायालय के नाज़िर को करते देखा । ग़ाज़ियाबाद जी पी एफ घोटाले के आरोपी नाज़िर ने न्यायाधीशों को जो जो क़ीमती सामान भेंट के लिए ख़रीदा था, सबकी तरतीबवार रसीदें उसने सँभाल रखी थी और अपनी प्रतिरक्षा में सी बी आई को उसने उपलब्ध कराई थी । ख़ैर वह नाज़िर छूटता या न छूटता पर एक दिन विवेचना के दौरान ही जेल में निरुद्ध रहते ही उसकी रहस्यमय मौत हो गयी ।

सी जे एम साहब ने भी तमाम रसीदें लगाते हुए प्रशासनिक न्यायाधीश पर ही यह आरोप लगाया कि वे उनसे नेपाल के विदेशी सामान मंगाया करते थे और उनकी बढ़ती माँग पूरी न कर पाने के कारण उनके विरुद्ध प्रशासनिक न्यायाधीश बदले की कार्रवाई पर उतर आये हैं ।

इसके बाद सी जे एम आर पी मिश्र जी के बारे में ज़्यादा पता न चला। उड़ती उड़ती खबरें मिलती रहीं कि उनकी पदोन्नति हो गयी और वे अपर ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश बन गये हैं । जब मैं बहराइच में तैनात हुआ तो मुझे पता चला कि वे बहराइच के ही रहने वाले थे और उस समय निलम्बित चल रहे थे । इतने खर्चवाह थे कि उनकी ख़स्ताहाली की चर्चा भी बहराइच में आम थी ।

कई साल बाद एक विचित्र सी घटना ने मुझे अपनी पुरानी यादों में पहुँचा दिया । तब तक मेरी सी जे एम आर पी मिश्रा से मुलाक़ात हुए दसों साल गुजर चुके थे । मेरा विनीत खण्ड गोमतीनगर में आवास बन चुका था और मैं भी उस दौरान सचिवालय में तैनात था ।एक दिन सवेरे के अख़बार में देखा तो एक न्यूज़ पर नज़र जमी रह गयी ।

एक बर्खास्त जज के बग़ल के विराम खण्ड में स्थित आवास पर पुलिस ने छापा मारा तो जज साहब और कई कॉल गर्ल्स उनके मकान पर पकड़े गए । न्यूज़ में कहा गया था कि वे ग़ाज़ीपुर में अपर ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश के पद पर अपनी तैनाती के दौरान ही माननीय उच्च न्यायालय द्वारा बर्खास्त कर दिये गये थे और अर्थाभाव में अब देह व्यापार संचालन के चक्कर में पड़ गए थे । अख़बार में उनका फ़ोटो भी लगा था ।

एक न्यायाधीश को इतने गर्हित अपराध का आरोपी देखकर मन ग्लानि से भर गया। अब भी जब उनकी याद आती है तो मन में पूरी दुनिया को लेकर एक विचित्र सा अवसाद सिर उठाने लगता है ।

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