
“…..जीभ को खुश करने का जैसा और जितना इंतज़ाम हम हिन्दुस्तानियों ने कर रख है, वैसा और उतना इंतज़ाम शायद ही दुनिया के किसी और देश ने किया होगा. इस मामले में भी हमारा कोई मुक़ाबला नहीं. खैर अब थी दिमाग़ी ख़ुराक ढूँढने की बारी. नागपाल जी बीच-बीच में मोबाइल पर कोई न कोई विडियो हमें दिखाने लगते थे. यह ज़्यादातर हिंदू-धर्म के महात्म्य, इस्लाम धर्म की कमतरी या देश-प्रेम का बखान करने वाले होते थे“
कैलाश मानसरोवर यात्रा
अगर आपको सनातन हिन्दू धर्म में आस्था है। अगर आपको पौराणिक मान्यताएँ आकर्षित और प्रेरित करती हैं। अगर आप प्रकृति के विराट विहंगम रूप का साक्षात्कार करने से रोमांचित होते हैं। अगर आप ज़िंदगी को रोज़मर्रा घटित होने वाले उपक्रम से कुछ अलग समझते हैं। अगर आप शारीरिक और मानसिक कष्ट झेलने की अपनी क्षमता का परीक्षण करना चाहते हैं। अगर आप आरामतलबी और अपने संकीर्ण जीवन से ऊब चुके हैं और धरती के सुदूर विस्तार में फैली ज़िंदगी को मापना, देखना और समझना चाहते हैं तो इनमें से कोई एक वजह आपको इस रोमांचकारी, कष्टकारी यात्रा पर ले जाने के लिए पर्याप्त है। मेरा विश्वास कीजिए कि जब आप वापस आएँगे तो जीवन-जगत और प्रकृति के प्रति आपका दृष्टिकोण काफ़ी समृद्ध हो चुका होगा।

डा0 हरिओम IAS
विलक्षण और बहुमुखी प्रतिभा के धनी संवेदनशील कवि – लेखक डॉ हरि ओम विभिन्न क्षेत्रों में पारंगत हैं। आप अच्छे गजल गायक होने के साथ ही बेहतरीन किस्सागो भी हैं जो श्रोता व पाठक को बांधने की कला को बेहतर जानता है। आप यूपी कैडर में वरिष्ठ आईएएस अफसर हैं। पिछले दिनों आपने कैलाश-मानसरोवर की यात्रा की। प्रस्तुत है इस दुर्गम यात्रा का श्रृंखलाबद्ध वृतांत एक अनूठी शैली में।
पिछले भाग से आगे……
रात के खाने में भी हमें कोई नया व्यंजन या नया स्वाद नहीं मिला. इन दो दिनों में हमें समझ में आ गया था कि यहाँ पर कुछ भी आसानी से नहीं पहुँचता, इसलिए खाने-पीने की वही चीज़ें मिल सकती हैं जो या तो यहाँ पैदा होती हों या फिर जिन्हें लम्बे समय के लिए स्टोर किया जा सकता हो. फल तो वहां बिलकुल ही नदारद थे. दूध का भी कोई स्रोत हमें समझ नहीं आया. मतलब जो चाय दिन में दो बार तीर्थ-यात्रियों को परोसी जा रही थी, वह ज़रूर पाउडर दूध से तैयार होती रही होगी. इसी तरह कुछ सब्जियां जो हमारे मेनू में शामिल थीं, वह संभवतः स्थानीय स्तर पर ही पैदा होती थीं. आटा-चावल-दाल वगैरह एक बार में ही जहाज़ों से आ जाता रहा होगा और उसे किफ़ायत से खर्च किया जाता रहा होगा. इसलिए खाने में ताज़गी और स्वाद की तलाश बेमानी थी. हमने जैसे-तैसे खाना खाया और अपने कमरे पर वापस आ गए.
हम सबके पास अपने-अपने झोलों में स्वाद और सेहत सम्हालने वाली ढेरों खाद्य सामग्रियां मौजूद थीं. कभी कोई टॉफी निकालता तो कभी कोई चूरन. हमारे पास भारतीय सीमा से लाये गए सेब भी थे. फल की कमी उससे पूरी हो जा रही थी. बाक़ी सूखे मेवे और चॉकलेट्स भी सबके पास काफी थे. वाधवा दंपत्ति के पास स्वादिष्ट मिठाइयाँ भी थीं. खाने से हम पेट भरते थे लेकिन जीभ को खुश करने के लिए फिर हम एक-दूसरे की तरफ़ उम्मीद से देखते थे.
उस रात भी वही हुआ. अपने अनुभव से मैं कह सकता हूँ कि जीभ को खुश करने का जैसा और जितना इंतज़ाम हम हिन्दुस्तानियों ने कर रख है, वैसा और उतना इंतज़ाम शायद ही दुनिया के किसी और देश ने किया होगा. इस मामले में भी हमारा कोई मुक़ाबला नहीं. खैर अब थी दिमाग़ी ख़ुराक ढूँढने की बारी. नागपाल जी बीच-बीच में मोबाइल पर कोई न कोई विडियो हमें दिखाने लगते थे. यह ज़्यादातर हिंदू-धर्म के महात्म्य, इस्लाम धर्म की कमतरी या देश-प्रेम का बखान करने वाले होते थे. हिंदू सभ्यता और संस्कृति के औदात्य को रेखांकित करने वाले व्याख्यानों और प्रवचनों पर भी उनका काफी जोर होता था. उनके पास इन मुद्दों से जुड़े हुए काफी क़िस्से भी थे.
हमारे समूह की तीनों देवियों की इसमें दिलचस्पी कम ही थी. मुझे और मि.वाधवा, जो मि.नागपाल के पुराने दोस्त थे, को भी इसमें ख़ास रस नहीं मिलता था, इसलिए जल्दी ही ये मुद्दे कमरे में अपनी प्रासंगिकता खो देते थे. आरडी सर ने दिन भर के हमारे सिमिकोट भ्रमण पर बाकी साथियों से कुछ प्रसंग साझा किये, कुछ शेर पढ़े और मैंने एक गीत गाया. फिर हम सोने की जुगत भिड़ाने लगे. नीचे से अभी भी काफ़ी आवाजें आ रहीं थीं. मैंने बाहर बालकनी पर जाकर देखा.
दूसरे ग्रुप के कुछ साथियों ने खुले में बोन-फायर का इंतज़ाम किया था. उसके चारों तरफ़ कुर्सियां डालीं थीं. उनमें से किसी के पास एक लाउड हेलर भी था. अब रात के साथ अग्नि के गिर्द जमी महफ़िल भी शबाब पर आ रही थी. मुझे अच्छा लगा यह देखकर कि संगीत कैसे अकेले या समूह में हमारा सच्चा साथी होता है. हम जितना भी वक़्त चाहें इसकी मदद से बिता सकते हैं. उस रात वह सब लोग सर्द रात का मुक़ाबला करने के लिए यही कर रहे थे.

हमारे कमरे में भले उस रात ख़ामोशी थी लेकिन बाहर से एक-एक कर फ़िल्मी गानों की आवाजें आ रही थीं. जगजीत सिंह, लता, किशोर, रफ़ी के गाने सर्द रात में लाउड हेलर के ज़रिये फ़िज़ा में घुल रहे थे. मुझे लगा कि वहां बैठे कई साथियों ने उस रात गाने की कोशिश की थी लेकिन आख़िर में माइक एक लड़की के हाथ में ही ठहर गया लगता था जो उन सबमें बेहतर गा रही थी. उसने एक-एक कर कई गीत गाये. मेरा हमेशा से ही यह मानना रहा है कि हममें से हर कोई गाता है या गा सकता है लेकिन हर कोई गायक नहीं होता. उसके लिए अलग योग्यता और साधना की ज़रूरत होती है.

संगीत के वर्तमान और भविष्य के वाबत सोचने वाले मुझ जैसों को इस बात पर हमेशा हैरत होती है कि आज भी जब हम गाने की ऐसी महफ़िलें जमाते हैं तो हमेशा पुरानी फिल्मों के सदाबहार सुरीले गीत ही क्यूँ गाते हैं? आज के दौर में जो गीत फिल्मों में आ रहे हैं, उन्हें भला कोई क्यूँ नहीं गाता? यहाँ तक की नई पीढ़ी भी ऐसे मौकों पर अमूमन लता, रफ़ी तक सिमटी रहती है. और ग़ज़लों के मामले में दस में से नौ नगमें जगजीत सिंह के होते हैं. यह खुद में मौजूदा संगीत की दशा-दिशा पर एक मौन टिप्पणी है. संगीत के मामले में सादगी, सरलता, सुरीलापन और गाने वाले की आवाज़ का सोज़ ही उसे सुनने वालों के दिलों में उतारता है और इन सब चीज़ों का संगम संगीत को अमर कर देता है.

बहरहाल उस रात देर तक हवा में संगीतमय स्वर लहरियां गूंजती रहीं. अपने-अपने कमरों में सोये हुए यात्रियों को यह बदलाव यक़ीनन भाया भी होगा. फिर शायद आग की ऊष्मा छीजने के साथ ही ये स्वर लहरियां भी थमने लगीं थी. जाने कब वह बैठकी ख़त्म हुई होगी. हम नींद के आगोश में जा चुके थे. पूरा सिमिकोट भी सर्द रात की मोटी रजाई ओढ़ दुबक गया था.

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