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‘कैलाश-कथा-12’ : हरिओम IAS

…..कुदरत, प्रकृति या ईश्वर—हम जो चाहे कह लें लेकिन यह सृष्टि एक अद्भुत रचना है. जहाँ सबकुछ मौलिक रचा गया है. यहाँ इंसान तो दूर, चर-अचर कुछ भी किसी दूसरे की नक़ल नहीं है. सब अलग है, मौलिक है. नया है और उसकी अपनी अद्वितीय सत्ता है. इंसान, पेड़-पालव, जीव-जंतु सबमें कितनी विविधता. आकार-रंग-गुण सब तरह की. कोई किसी दूसरे के जैसा नहीं. हमें सृष्टि से यह मौलिकता सीखनी चाहिए. दुनिया के किसी कोने में जाइए आपको अलग-अलग तरह के लोग दिखेंगे.

कैलाश मानसरोवर यात्रा

अगर आपको सनातन हिन्दू धर्म में आस्था है। अगर आपको पौराणिक मान्यताएँ आकर्षित और प्रेरित करती हैं। अगर आप प्रकृति के विराट विहंगम रूप का साक्षात्कार करने से रोमांचित होते हैं। अगर आप ज़िंदगी को रोज़मर्रा घटित होने वाले उपक्रम से कुछ अलग समझते हैं। अगर आप शारीरिक और मानसिक कष्ट झेलने की अपनी क्षमता का परीक्षण करना चाहते हैं। अगर आप आरामतलबी और अपने संकीर्ण जीवन से ऊब चुके हैं और धरती के सुदूर विस्तार में फैली ज़िंदगी को मापना, देखना और समझना चाहते हैं तो इनमें से कोई एक वजह आपको इस रोमांचकारी, कष्टकारी यात्रा पर ले जाने के लिए पर्याप्त है। मेरा विश्वास कीजिए कि जब आप वापस आएँगे तो जीवन-जगत और प्रकृति के प्रति आपका दृष्टिकोण काफ़ी समृद्ध हो चुका होगा।

डा0 हरिओम IAS

विलक्षण और बहुमुखी प्रतिभा के धनी संवेदनशील कवि – लेखक डॉ हरि ओम विभिन्न क्षेत्रों में पारंगत हैं। आप अच्छे गजल गायक होने के साथ ही बेहतरीन किस्सागो भी हैं जो श्रोता व पाठक को बांधने की कला को बेहतर जानता है। आप यूपी कैडर में वरिष्ठ आईएएस अफसर हैं। पिछले दिनों आपने कैलाश-मानसरोवर की यात्रा की। प्रस्तुत है इस दुर्गम यात्रा का श्रृंखलाबद्ध वृतांत एक अनूठी शैली में।

पिछले भाग से आगे……

वहां पर एक छोटा कमरा और एक वरामदा था जिसमें कुछ स्टाफ़ बैठता था और यात्रियों और उनके सामान का प्रवंधन करता था. हमारे साथ होटल में रुका हुआ साठ तीर्थ यात्रियों वाला बड़ा समूह हमसे थोडा पहले ही हवाई पट्टी पहुँच चुका था. जब तक हम वहां पहुंचे उनकी हिलसा रवानगी भी शुरू हो गई थी. दरसल सिमीकोट से हिलसा की यात्रा हमें हेलीकाप्टर से करनी थी जिसमें पायलट को लेकर कुल पांच लोग ही बैठ सकते थे इसलिए एक बार में चार यात्री ही आगे जा सकते थे. ओझा एंड कंपनी के पास कुल तीन हेलीकाप्टर थे. जिसमें से दो ही चालू थे. बाकी कंपनियों के पास बेहतर सुविधाएँ हमें दिख रही थीं.

हमसे पहले आया हुआ बड़ा समूह तेज़ी से हिलसा के लिए चार-चार की टोलियों में उड़ रहा था लेकिन हमें बताया गया कि हमारा हेली आने में अभी कुछ वक़्त था. इस बीच हमें मि.आर.ओझा के साथ एक और आदमी वहां मिला. उसने पिछले दो दिनों के इंतज़ार की व्यग्रता में मि.गुप्ता और आरडी सर से काफी बातें की थीं. ये लोग हेलिकॉप्टर को ‘हेली’ कह रहे थे. इस छोटे नाम से इस पर बात करना आसान हो गया था. हम समझ सकते थे कि इधर के लोग कैलाश यात्रा के व्यस्त महीनों में कितनी बार हेली का ज़िक्र करते होंगे और ऐसे में हेलिकॉप्टर का यह छोटा नाम ‘हेली’ उन्हें कितनी राहत देता होगा. ठीक वैसे जैसे हम अपने प्रिय बच्चों या दोस्तों—जिन्हें हमें बार-बार बुलाना होता है—को संबोधन के लिए एक आसान उपनाम दे देते हैं. यहाँ ‘हेली’ के साथ भी स्थानीय लोगों का रिश्ता हमें ऐसा ही लगा. सो मैंने भी यह नाम ‘हेली’ पकड़ लिया था.

हमें पता चला कि मि.आर.ओझा के साथ खड़ा हमारा वह शुभचिंतक नेपाल का ही था लेकिन दिल्ली में रहकर कैलाश यात्रियों के लिए अपनी एक ट्रेवल कंपनी चलाता था. हमने उसे भी समय पर अपने वीजा-पासपोर्ट आदि न मिल पाने की चिंता-गाथा सुनाई. उसने हमें आश्वस्त किया कि हमारे कागज़ात आज हिलसा पहुँच जाएंगे और अगर सब ठीक-ठाक रहा अर्थात ‘भोले बाबा की कृपा’ बनी रही तो हम लोग आज ही हिलसा से आगे टकलाकोट भी निकल जाएंगे. यह भोले बाबा की कृपा वास्तव में मौसम के बिगड़ते मिज़ाज से बचने के लिए ज़रूरी थी क्यूंकि तब हेली उड़ नहीं सकता था. उसी ने हमें यह भी बताया कि हम सभी पुरुष यात्रियों को बिज़नस मैन और महिलाओं को घरेलू स्त्रियाँ बनाकर क्यूँ भेजते हैं. क्यूंकि बाक़ी किसी परिचय में चीनी सीमा सुरक्षा के अधिकारी पूछताछ ज़्यादा करते हैं. उसने अपने अनुभव से यह भी बताया कि कई बार तो पूछताछ में संतुष्ट न होने के कारण कुछ यात्रियों को चीनी अधिकारिओं ने तिब्बत से वापस भेज दिया था.

अब यह सुनकर तो हमारी फ़िक्र और बढ़ गई. वह भरसक अपनी बातचीत में यह दिखाने की कोशिश कर रहा था कि उसे हमारी फ़िक्र है और वह हमें जल्दी से जल्दी आगे भेजना चाहता है लेकिन उसने यह जो नया भय हमारे दिमाग में डाला था इसके बारे में हमने पहले गंभीरता से नहीं सोचा था. अब आरडी सर से मैंने मज़ाकिया अंदाज़ में पूछा कि ‘सर आप अपना बिज़नेस तय कर लीजिए. मैं तो गवैया हूँ ही. इसमें बनने जैसा भी कुछ नहीं है. ज़रूरत पड़ी तो चीनियों को कुछ शास्त्रीय संगीत का ज्ञान दे दूंगा.’

इस पर आरडी सर ने वाक़ई बड़ी गंभीरता से कहा कि ‘भाई! मैं तो फ़िलहाल दवाइयों की होलसेल एजेंसी चलाता हूँ.’ हम ठहाका मार हँसे थे. आरडी सर ने भी अपना मज़बूत एरिया बिज़नस के लिए चुन लिया था.आरडी सर बाक़ायदा एक डॉक्टर थे और ऐसे में दवाइयों के कारोबार से ज़्यादा सहज और क्या पेशा हो सकता था. जिस तरह से वह आदमी हमसे हर तरह की बातें कर रहा था. जिस तरह वह हमें आगे के लिए हौसला दे रहा था और जिस तरह हवाई पट्टी पर मौजूद मि.आर.ओझा उसकी बातों पर सिर हिला रहा था, हमें लगा जैसे वह ओझा टीम का ही एक और सदस्य है लेकिन इस बीच मि.भटनागर का फ़ोन डॉक्टर गुप्ता के पास आया और उन्होंने हमें उससे ज़्यादा बात न करने को कहा. यह भी बताया कि वह उनकी टीम का सदस्य नहीं है, काफ़ी चलता पुरज़ा है, अपनी ख़ुद की एक कंपनी चलाता है. जब गुप्ता जी ने यह सब हमें बताया तो हमने सहज ही यह अनुमान लगा लिया कि मि. भटनागर की वास्तविक चिंता उस आदमी के हाथों अपने भावी कैलाश यात्री गवां देने की थी. वह जिस तरह हमसे बात कर रहा था.

हमारी चिंताओं में हमें हौसला दे रहा था, हमारा ख्याल रख रहा था, वैसे में बहुत मुमकिन था कि हममें से कई अपने मित्रों-परिचितों को कैलाश यात्रा की योजना बनाने की स्थिति में मि.भटनागर की जगह उस आदमी से जोड़ सकते थे. और ऐसा होने की दशा में साफ़ तौर पर मि.भटनागर का नुकसान हो सकता था. सुदूर दिल्ली में बैठे हुए मि.भटनागर को अपना बिज़नेस खोने की फ़िक्र खाए जा रही थी. मि.भटनागर ने भी ख़ास तौर पर हमें यह हिदायत दी थी कि हम किसी भी हालत में अपना सही परिचय किसी को न बताएं. हम सिर्फ़ यह बताएं कि हम सभी बिज़नस मैन हैं क्यूंकि हमारे वीसा फॉर्म पर यही लिखा गया है. यह शायद चीन की तरफ़ से कैलाश यात्रा पर आने वाले भारतीय यात्रियों को लेकर अतिरिक्त सजगता और मीन-मेख की वजह से रहा होगा. खैर हमारा परिचय वहां मि.भटनागर से मिलने वाली इस हिदायत के बावजूद खुल चुका था. उस आदमी ने मि.आर.ओझा के साथ ही हवाई पट्टी पर तैनात सुरक्षा अधिकारी को भी हमारा परिचय दे दिया था और इस पर उस अधिकारी ने हमें उचित सम्मान भी दिया था. सिमीकोट की हवाई पट्टी पर वक़्त काटने को कुछ ख़ास न था. हमारे बड़े बैग आ चुके थे. उनकी तौल भी हो चुकी थी. हमारे लिए कुछ बोर्डिंग पास जैसा भी जारी हो चुका था. अब हम आराम से वरामदे में पड़ी हुई बेंच पर बैठे थे. इस बीच लम्पट स्वामी ग्रुप भी वहां आ गया था और हमारे बड़े समूह के कई और सदस्य भी पहचाने जा सकते थे. हमारे साथ की महिलाएं लगातार वहां मौजूद कुछ नेपाली महिलाओं के साथ तस्वीरें खींचने में व्यस्त थीं. ऐसे में उनके लिए दो-चार घंटे इंतज़ार में गुज़ारना कोई मुश्किल काम नहीं था.

मि.वाधवा किसी भी हाल में मिसेज वाधवा से दूर नहीं होते थे. वह उनके साथ लगभग हर फ़ोटो फ्रेम का हिस्सा बनते थे. बाक़ी समय भी उठने से लेकर खाने-पीने, घूमने-घामने—सब में उनके साथ बने रहते थे. इन थोड़े दिनों में ही मैंने यह महसूस किया कि वह एक केयरिंग हस्बैंड थे. मिसेज बाधवा भी सरल मुस्कान और चमकती आँखों के साथ बीच-बीच में उनके इस ज़ाहिराना प्रेम और केयरिंग अंदाज़ की हामी भरती रहती थीं और कई बार तो थोडा शर्माती भी थीं. इस बीच आरडी सर का कैमरा उनके हाथ में फिर सक्रिय हो उठा था और उन्होंने उन स्थानीय महिलाओं की कई तस्वीरें खीचीं. मैंने भी अपने मोबाइल से कुछ फ़ोटो लिए. मुझे यह बात अक्सर हैरत में डालती है कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में कैसे लोगों के चेहरे-मोहरे और उनकी कद-काठी बदलती रहती है. प्रकृति ने कैसे इस दुनिया को बहुरंगी बनाया है. कुदरत, प्रकृति या ईश्वर—हम जो चाहे कह लें लेकिन यह सृष्टि एक अद्भुत रचना है. जहाँ सबकुछ मौलिक रचा गया है. यहाँ इंसान तो दूर, चर-अचर कुछ भी किसी दूसरे की नक़ल नहीं है. सब अलग है, मौलिक है. नया है और उसकी अपनी अद्वितीय सत्ता है. इंसान, पेड़-पालव, जीव-जंतु सबमें कितनी विविधता. आकार-रंग-गुण सब तरह की. कोई किसी दूसरे के जैसा नहीं. हमें सृष्टि से यह मौलिकता सीखनी चाहिए. दुनिया के किसी कोने में जाइए आपको अलग-अलग तरह के लोग दिखेंगे. वह एक समुदाय-समूह की शक्ल में भले नज़र आएं लेकिन एक-दूसरे की प्रतिलिपि कतई नहीं होते. कुदरत ने ऐसी ही सृष्टि बानई है जबकि आधुनिक दौर में इंसान प्रतिलिपियों में तब्दील होना चाहता है. एक-दूसरे के जैसा बनना-होना चाहता है. जैसे कारखानों में एक जैसे सामान बनते हैं उसी तरह आज इंसान भी बनना चाहता है.

वह अपनी ख़ासियत भूलकर कामयाब लोगों जैसा दिखना चाहता है. हुकूमतें भी हमें एक जैसा बनाना चाहती हैं—एक झंडे और एक डंडे के नीचे लाकर. बाज़ार हममें एक जैसी अभिरुचियाँ, एक जैसी ज़रूरतें पैदा करके अपनी सेवाओं और उत्पादों के लिए हमें एक उपभोक्ता समूह में बदलने में लगा है जिससे उसका काम आसान हो जाए. हमें यह समझना चाहिए कि यह ज़िद प्रकृति या कुदरत के बुनियादी नियम के ख़िलाफ़ है. जब भी हम भाषा, परिधान, व्यवहार और तहज़ीब के वैविध्य को मिटाने की कोशिश करेंगे यह सृष्टि के क़ानून के ख़िलाफ़ जाएगा.

सिमिकोट में पिछला दो दिन बिताने और वहां उस छोटी हवाई पट्टी पर उन अलग नैन-नक्श वाली नेपाली स्त्रियों को देखते हुए एक पल में ही मेरा दिमाग कहाँ-कहाँ होकर वापस लौट आया. सामने अपने विशिष्ट चेहरों, परिधानों और आभूषणों में बैठी हुई महिलाओं को भी शायद हमारी तरफ़ से मिल रहा यह अतिरिक्त तवज्जो रास आ रहा था. वे भी सबके साथ स्वाभाविक मुस्कान के साथ तस्वीरंष खिंचा रही थीं. वे सब के सब अपने हुलिए से गरीब और कामकाज़ी लग रही थीं. उन्हें शायद हम सैलानियों की तरफ़ से इस मनोरंजक व्यवहार की आदत रही होगी तभी वे मुस्कराकर सबके साथ तस्वीरें खिंचा रही थीं जबकि उन्हें खुद वे तस्वीरें देखने में कोई दिलचस्पी नहीं थी. उनके पास न तो मोबाइल थे और न ही उनमें हमसे दुबारा मिलने की कोई इच्छा थी.

 

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