
…..आरडी सर पायलट के साथ आगे बैठे थे और उनका कैमरा पहाड़ों और घाटियों के दामन पर बिखरे आसमानी रंगों को अपने भीतर समेट रहा था. लक्ष्मी जी बीच-बीच में मेरी तरफ़ देखकर कुछ बताने की कोशिश करती थीं. नागपाल जी दूसरे किनारे बैठे थे, इसलिए खिड़की के बाहर के नज़ारों में खोये हुए थे. पायलट तटस्थ भाव से अपनी सीट पर जमा हुआ था. कानों में हैडफ़ोन और हाथों में हैंडल. उसके लिए इस उड़ान और हेली के बाहर के नज़ारों में कुछ भी नया नहीं था. उसके चेहरे पर कोई भी भाव नहीं था. वह बस अपना काम कर रहा था. वह यहाँ परदेस में क्यूँ-कैसे था यह जानने की उत्सुकता तो मन में बहुत थी लेकिन इसका अवसर हमारे पास नहीं था.
कैलाश मानसरोवर यात्रा
अगर आपको सनातन हिन्दू धर्म में आस्था है। अगर आपको पौराणिक मान्यताएँ आकर्षित और प्रेरित करती हैं। अगर आप प्रकृति के विराट विहंगम रूप का साक्षात्कार करने से रोमांचित होते हैं। अगर आप ज़िंदगी को रोज़मर्रा घटित होने वाले उपक्रम से कुछ अलग समझते हैं। अगर आप शारीरिक और मानसिक कष्ट झेलने की अपनी क्षमता का परीक्षण करना चाहते हैं। अगर आप आरामतलबी और अपने संकीर्ण जीवन से ऊब चुके हैं और धरती के सुदूर विस्तार में फैली ज़िंदगी को मापना, देखना और समझना चाहते हैं तो इनमें से कोई एक वजह आपको इस रोमांचकारी, कष्टकारी यात्रा पर ले जाने के लिए पर्याप्त है। मेरा विश्वास कीजिए कि जब आप वापस आएँगे तो जीवन-जगत और प्रकृति के प्रति आपका दृष्टिकोण काफ़ी समृद्ध हो चुका होगा।
डा0 हरिओम IAS
विलक्षण और बहुमुखी प्रतिभा के धनी संवेदनशील कवि – लेखक डॉ हरि ओम विभिन्न क्षेत्रों में पारंगत हैं। आप अच्छे गजल गायक होने के साथ ही बेहतरीन किस्सागो भी हैं जो श्रोता व पाठक को बांधने की कला को बेहतर जानता है। आप यूपी कैडर में वरिष्ठ आईएएस अफसर हैं। पिछले दिनों आपने कैलाश-मानसरोवर की यात्रा की। प्रस्तुत है इस दुर्गम यात्रा का श्रृंखलाबद्ध वृतांत एक अनूठी शैली में।
पिछले भाग से आगे……
जहाँ हम बैठे थे वहां सामने ही एक बोर्ड टंगा हुआ था जो नेपाल के भारतीय दूतावास की तरफ़ से था. जिसमें कैलाश यात्रियों को यात्रा की औपचारिक शुभकामना देने के साथ यह भी लिखा गया था कि किसी भी कठिनाई के वक़्त यात्री नीचे दिए गए फ़ोन नंबरों पर मदद के लिए संपर्क कर सकते हैं. मैंने झट से उस बोर्ड की फोटो खींची. उस बोर्ड से यह स्पष्ट था कि इस यात्रा पर कुछ कठिनाइयाँ सामान्य रूप से आती हैं और वैसे में काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास ने अपने कुछ अधिकारियों को उन्हें सुलझाने और कैलाश यात्रियों का ख़याल रखने के काम में लगा रखा था. इस बीच हवाई पट्टी लगातार बिजी थी.
नेपालगंज से आने वाले जहाज़ नए यात्रियों को सिमिकोट में उतार रहे थे और यहाँ से भरकर वापसी वाले यात्रियों को नेपालगंज के लिए लेकर उड़ रहे थे. हिलसा की तरफ़ जाने वाले यात्री भी अपनी कंपनियों के हेली पर चार-चार की टोलियों में निकल रहे थे. अजीब नज़ारा था. कुछ वैसा ही जैसा व्यस्त बस अड्डों और टैक्सी स्टैंड पर होता है. नेपालगंज की तुलना में यहाँ हवाई यात्रा में कुछ ज़्यादा सहूलियत दिख रही थी. या शायद यहाँ मौसम ठंडा होने की वजह से हमें इंतज़ार भी खल नहीं रहा था. बहरहाल थोड़ी ही देर में ओझा एंड कंपनी का हेली हवा में दिखाई दिया. आरडी सर, मैं, लक्ष्मी जी और मि.नागपाल—की टोली तैयार थी. हमारे बैग भी किनारे रख दिए गए थे. हेली जैसे ही पट्टी पर उतरा और उसमें से वापसी वाले यात्री बाहर निकले, हम लपककर उस पर सवार हो लिए. कंपनी के आदमियों ने हमारे बैग हेली की डिग्गी में ठूंस दिए थे. देखते-देखते हम फिर हवा में थे. हम सबके मुख से एक बार फिर ‘जय भोले’ का उद्घोष निकला.
हमारे हेली का पायलट विदेशी था. जो निकर और टी शर्ट में ही था. शायद लगातार ड्यूटी की वजह से यही उसका ड्रेस कोड बन गया था. धूप चटख थी. हमने अपनी जैकेट भी लादी हुई थी और सिर पर टोपी भी कसी थी लेकिन उसे देखकर मैंने अपनी टोपी उतारकर हाथ में रख ली. हमने अनुमान लगाया कि हमारा पायलट यहाँ सीजनल नौकरी करता होगा और यह यूरोप के किसी मुल्क का रहने वाला होगा और जितनी ठंड इनके यहाँ होती है, उसे देखते हुए तो यह मौसम काफी सुहाना कहा जायेगा. हम बड़ी उत्सुकता से अपनी खिड़कियों से बाहर प्रकृति के बदलते रूप को देख रहे थे. ऊपर पहुँचते ही हमें कर्णाली नदी फिर से दिखाई देने लगी वह जैसे हमारे साथ ही साथ चल रही थी. सिमीकोट की घनी हरियाली धीरे-धीरे विरल हो रही थी. हमारा हेली पहाड़ों के बीच बनी बड़ी घाटियों के ऊपर नियत हवाई मार्ग पर उड़ रहा था. हमने दूसरी तरफ़ से वापसी के हेली भी आते हुए देखे. मौसम साफ़ था इसलिए सबकुछ स्पष्ट दिख रहा था लेकिन हम इस ऊंचाई पर आकर ‘भोले बाबा की कृपा’ का असली अभिप्राय समझ चुके थे. यहाँ अगर मौसम थोड़ा भी बिगड़ता है तो उड़ान भरना काफी संकटप्रद हो सकता है क्यूंकि तब यह घाटियाँ बादलों से भर जाती होंगी और आगे साफ़ देख पाना बेहद मुश्किल होता होगा. दोनों तरफ़ पहाड़ होने के नाते खुला हवाई मार्ग मुमकिन नहीं था और हेली एक निश्चित ऊँचाई से ज़्यादा ऊपर उड़ नहीं सकता था सो उड़ान के समय मौसम का साफ़ होना ज़रूरी था और इसके लिए ‘भोले बाबा की कृपा’ ज़रूरी थी. संयोग से इस समय भोले बाबा की कृपा हमारे साथ थी. तभी हम सिमीकोट से हिलसा की तरफ़ उड़े जा रहे थे.

आरडी सर पायलट के साथ आगे बैठे थे और उनका कैमरा पहाड़ों और घाटियों के दामन पर बिखरे आसमानी रंगों को अपने भीतर समेट रहा था. लक्ष्मी जी बीच-बीच में मेरी तरफ़ देखकर कुछ बताने की कोशिश करती थीं. नागपाल जी दूसरे किनारे बैठे थे, इसलिए खिड़की के बाहर के नज़ारों में खोये हुए थे. पायलट तटस्थ भाव से अपनी सीट पर जमा हुआ था. कानों में हैडफ़ोन और हाथों में हैंडल. उसके लिए इस उड़ान और हेली के बाहर के नज़ारों में कुछ भी नया नहीं था. उसके चेहरे पर कोई भी भाव नहीं था. वह बस अपना काम कर रहा था. वह यहाँ परदेस में क्यूँ-कैसे था यह जानने की उत्सुकता तो मन में बहुत थी लेकिन इसका अवसर हमारे पास नहीं था.
आख़िर बीस मिनट की छोटी यात्रा में आप पायलट से क्या बात कर सकते हैं और मंज़िल पर पहुँचने पर आपको झट उतरना होता है. पायलट पट नए यात्रियों के साथ वापस हो लेता है. उसे हेली के साथ हवा में अपने दिन के चक्कर पूरे करने होते हैं. ऐसे में वह आराम की नहीं सोचता. बस जल्दी से जल्दी अपने फेरे पूरे करने के बारे में सोचता है. मेरी नज़रें धीरे-धीरे हरियाली की चादर उतारते पहाड़ों पर टिकी हुई थीं.
सिमिकोट से दस मिनट की उड़ान के अन्दर ही चारों तरफ़ उजाड़, बंजर, वीरान पहाड़ों की श्रृंखलाएं दिखनी शुरू हो गईं थीं जो हमें दोनों तरफ़ से घेरे हुईं थीं. जहाँ-तहां विरल वनस्पतियों या झाड़ियों के टुकड़े दिख जाते थे लेकिन उनका रंग हरा न होकर भूरा, मटमैला या कत्थई होता था. बस हमारे सिर के ऊपर फैले नीले आकाश का खुलापन और नीचे ज़मीन पर इठलाकर बहती कर्णाली नदी का प्रवाह हमें अपने आगोश में समेटे हुए था. सिमिकोट से हिलसा तक बीस-बाईस मिनट की यह यात्रा यूँ तो छोटी थी लेकिन हम कैलाश पर्वत और मानसरोवर के और क़रीब हो रहे थे, यह अहसास हमें रोमांचित किए हुए था. हमें जल्दी ही कर्णाली नदी के किनारे बेरंग पर्वंत श्रृंखलाओं के बीच बसी एक छोटी सी आबादी दिखाई दी. सिमिकोट से अलग यह बस्ती पत्थरों और टिन के पत्तरों से बसाई गई थी. लकड़ियों का इस्तेमाल इसमें कम हुआ था. यहाँ पर पेड़ क्या, छोटी वनस्पतियाँ भी दूर-दूर तक नदारद थीं.
हमारा हेली धीरे-धीरे नीचे घाटी में बने हेलीपैड की तरफ़ जा रहा था. हेलिपैड पर कुछ लोग दिख रहे थे. चौकोर कंक्रीट से बने हेलीपैड पर भी वही सिमीकोट की हवाई पट्टी जैसा नज़ारा था. एक किनारे बड़े बैग रखे हुए थे. कई यात्री भीड़ लगाकर हेली पर चढ़ने के चक्कर में थे. कुछ सुरक्षाकर्मी और ट्रेवल कंपनी की तरफ़ से यात्रियों की मदद के लिए मुस्तैद कुछ सहयोगी. बाक़ी चारों तरफ़ वीराना मंज़र. जैसे हम किसी कमांडो दस्ता के सदस्य हों और हमें किसी दूसरे मुल्क की बेजान पथरीली धरती पर उतर किसी अत्यंत दुस्साहसिक सैन्य अभियान को अंजाम देना हो. हिलसा ने हमें पहली बार इस एहसास की वजह से थोड़ा विशिष्ट होने का अहसास ज़रूर कराया लेकिन बेडौल पत्थरों से बनी दीवारों और नीले टीन की छतों वाली उस बस्ती की तरफ़ बढ़ते हुए यह एहसास ज़्यादा देर टिक नहीं सका.

हिलसा उर्फ़ पेमा की जागीर
हम हेली से बाहर आ चुके थे. हमारा बैग तेज़ी से हेली से बाहर निकाला गया. हम हेलिपैड के दूसरे किनारे पहुंचे ही थे कि हमारा हेली वापसी के चार यात्रियों को ले उड़ चला था. हम चारों ने ‘बम भोले’ कहा और एक नज़र इधर उधर दौड़ाई. सामने रेतीले बंजर पहाड़ थे जिन्हें देखकर आसानी से अनुमान लगाया जा सकता था कि वे अक्सर टुकड़ों में फिसल-फिसलकर ज़मीन पर आ जाते रहे होंगे. एक भुरभुरापन उनके शिख से नख तक लुढ़का हुआ-सा था. हमें हेलीपैड पर मि.राम मिले. ये ओझा एंड कंपनी के स्थानीय प्रवन्धक या समन्वयक थे. मि.राम की उम्र तीस के क़रीब रही होगी और नीले बैग वाले यात्री इन्हीं के इर्द-गिर्द मंडरा रहे थे. हम भी इनके पीछे हो लिए. लगभग सौ-डेढ़ सौ मीटर की दूरी पैदल तय कर हम चारो ने एक बड़े धर्मशाला नुमा परिसर में प्रवेश किया जहाँ दो किनारों पर यात्रियों के लिए खाने का भंडारा जैसा चल रहा था. एक काउंटर तो खुले बरामदे में ही था जबकि दूसरा एक छोटे से कमरे में. बाहर तमाम कुर्सियां पड़ी हुई थीं जो छः-आठ के समूह में एक साथ लोहे की पाइप से जुड़ी हुई थीं.उन्हें अलगाना मुश्किल था. अलग-अलग रंग की जर्सी और बैग वाले यात्री इन दोनों किनारों पर रखे गए बर्तनों में से अपनी थाली में भोजन ले रहे थे. उस बरामदे के ऊपरी माले पर चारों तरफ़ कमरे बने थे. जिनमें कैलाश यात्री रुकते थे. हमें बताया गया कि यह भोजन का समय है इसलिए हमें तुरंत खाना खा लेना चाहिए. हमारे समूह के भोजन का इंतज़ाम अन्दर कमरे में था. कुछ डोंगों में खाना लगाया गया था. गीला मोटा चावल, झाल्फ्रेज़ी सब्ज़ी, पापड़, एसिड अचार, सलादनुमा कुछ कच्ची सब्जियां. रोटियां भी थीं वे शायद पैकट बंद रोटियां थीं जिन्हें बस बड़े तवे पर गर्म करके यात्रियों को परोसा जा रहा था. दाल शायद नहीं थी. उसकी जगह कोई शोरबा था. जिसमें कुछ सब्ज़ियों के टुकड़े दिख रहे थे. खैर हमें भूख लगी थी और हम देख रहे थे कि लोग बड़े चाव से खाना खा रहे थे.

खाने को लेकर सिमीकोट में हमारी थोड़ी ट्रेनिंग हो चुकी थी इसलिए हमने भी अपनी प्लेट में कुछ डाल लिया. कमरे के बाहर ही एक पाइप जलस्रोत था जो अनवरत बह रहा था. दोनों तरफ़ के ख़ाली प्लेट चम्मच यहीं जमा हो रहे थे जहाँ कुछ स्त्रियाँ उन्हें जल्दी से दुबारा धोकर वापस खाने के काउंटर तक पहुंचा रही थीं. यहाँ खाने के मामले में कुल मिलकर स्वाद-सेहत और सफ़ाई का सवाल श्रद्धा और आस्था के हवाले था. इस पर बात करना तो दूर, सोचने तक की भी ज़रूरत या फ़ुर्सत किसी को नहीं थी. मैंने देखा कि बरामदे में ही एक तरफ़ चाय के दो कंटेनर भी रखे थे और उनके किनारे स्टील के कई ग्लास भी. सर्दी तो थी ही लेकिन चाय के शौकीनों को चाय का स्वाद अपनी तरफ़ खींचता ही खींचता है. इसके लिए मौसम सर्द हो तो ठीक, न हो तो भी ठीक.
आरडी सर ने पहले चाय पी, फिर खाना खाया. थोड़ी देर बाद दुबारा चाय पी. इस बीच हमारे बाकी के चार साथी भी आ पहुंचे. आते ही वे भी खाने की तरफ़ मुड़ गए. हमारे बड़े बैग भी आ चुके थे और एक बड़े ढेर में वहीँ बरामदे में एक किनारे पड़े हुए थे. सबने मन मुताबिक़ खाना खाया, चाय पी और फिर हमें हमारा कमरा दिखाया गया. हिलसा में हम आठों को दो कमरों में टिकाया गया. एक में मैं, आरडी सर, मि.गुप्ता और नागपाल जी और दूसरे में तीनों देवियाँ और उनकी सेवा-हिफाज़त के लिए मि.वाधवा. अब चूँकि मि.वाधवा मिसेज वाधवा को छोड़ नहीं सकते थे इसलिए हम आठों का यही विभाजन सुविधाजनक और श्रेयस्कर था. हमने अपने बैग कमरे में टिकाए, अपने बिस्तर तय किये और टॉयलेट का जायज़ा लिया. हमारे वाले कमरे में अन्दर लगा हुआ टॉयलेट था जबकि दूसरे कमरे के बाहर कॉमन लैट्रीन थी. उस पूरे माले पर शायद कुछ ही कमरों में अटैच्ड टॉयलेट वाली सुविधा थी. इत्तेफाक़ से उनमें से एक कमरा हम चारों को मिला था जिसे व्यवहार में हम आठों ही इस्तेमाल करने लगे थे.
लक्ष्मी जी की तरह वहां मौजूद शायद ही कोई और यात्री धरती के इस टुकड़े पर पहले कभी उतरा रहा हो, इसलिए हम सभी में उस जगह को देखने जानने की बड़ी उत्सुकता थी. यह हमारी विशाल धरती का एक अनूठा भूखंड था जो सिर्फ़ हवाई मार्ग से ही जुड़ा हुआ था इसलिए यहाँ पहुंचना और यहाँ से कहीं और निकल जाना आसान नहीं था. हम जल्दी ही अपने कमरे से बाहर निकल आए. उस पूरे परिसर में अंदाज़न सौ के क़रीब यात्री दिख रहे थे. उस परिसर के ऊपरी माले पर बने हुए कमरों के अलावा बाहर उसी तरह छोटे-छोटे कमरों की आयताकार लम्बी कतारें थीं जिन्हें हमने थोड़ा बाद में अपने हिलसा भ्रमण के दौरान देखा. पता चला कि यह सब पेमा की ही संपत्ति थी. इस तरह यह आसानी से तय हो जाता है कि हिलसा की सबसे धनी-मानी शख्सियत पेमा अंग्मो ही थी. तभी कैलाश यात्रियों का लगभग नब्बे प्रतिशत हिस्सा उसी के प्रवंधन में आता-जाता, ठहरता-खाता है.
बाकी पूरी बस्ती में कुल मिलाकर दस-बारह घर या ठिकाने और थे. उसमें चार-छः जगहें ही ऐसी थीं जिनमें कैलाश यात्री ठहर भी सकते थे. बाक़ी बेहद मामूली से घर उन लोगों के थे जो किसी न किसी रूप में कैलाश यात्रा के प्रबंधन से जुड़े थे. यहाँ चौतरफ़ा वंचना और विपन्नता का दृश्य था. पीले-पथरीले वीरान पहाड़ों की श्रृंखला उस सर्द परिवेश को और भी नीरस बनाती थी. खैर हम कहीं न कहीं इस बात से आश्वस्त थे कि हिलसा हमारे लिए एक अत्यंत अल्पकालिक पड़ाव भर है.
लक्ष्मी जी ने थोड़ी देर में ही पेमा को ढूँढ निकाला जो वहीँ कहीं तीर्थ-यात्रियों के इंतज़ाम में लगी हुई थी. लक्ष्मी जी पहले इधर से कैलाश यात्रा पर जा चुकी थीं और पेमा से मिल चुकी थीं. बड़े प्रेम से वे पेमा से गले मिलीं और हम सबके बारे में भी उन्हें थोड़े शब्दों में बताया. वह क़रीब पचपन-साठ साला कर्मठ महिला जान पड़ रही थी जिसके इशारे पर वहां हर कोई इधर-उधर डोल रहा था. हम अपने यहाँ भी देखते हैं कि पहाड़ी समाजों में अक्सर महिलाएं ही सब कुछ संभालती हुई दिखती हैं—घर-परिवार, काम-धंधा. पुरुष नेपथ्य में रहकर नियंत्रक महिला के निर्देश में अपने काम को अंजाम देते हैं. यह इस समाजों की अर्थ-व्यवस्था में महिला की केन्द्रीय भूमिका और पुरुष समाज की महिलाओं पर निर्भरता को दर्शाता है. जबकि हमारे मैदानी समाज में इसका ठीक उलट है. यहाँ महिलायें लगभग हर चीज़ में पुरुषों पर निर्भर हैं. घर में पुरुष के होते स्वतंत्र रूप में आर्थिक गतिविधियों को संचालित करने की बात तो बहुत दूर की है.

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