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‘कैलाश-कथा-3’ : हरिओम IAS

एक युवा यात्री हिलसा में फंसने और कैलाश परिक्रमा के दौरान होने वाली परेशानी का हाल कुछ इस अंदाज़ में बता रहा था, जैसे कि वह बहुत खुश-क़िस्मत था जो सकुशल वापस आ गया था! हम यात्रा पर जाने के उत्साह से लबरेज होने के कारण उसे सुनकर भी अनसुना कर रहे थे…

कैलाश-मानसरोवर यात्रा 

अगर आपको सनातन हिन्दू धर्म में आस्था है। अगर आपको पौराणिक मान्यताएँ आकर्षित और प्रेरित करती हैं। अगर आप प्रकृति के विराट विहंगम रूप का साक्षात्कार करने से रोमांचित होते हैं। अगर आप ज़िंदगी को रोज़मर्रा घटित होने वाले उपक्रम से कुछ अलग समझते हैं। अगर आप शारीरिक और मानसिक कष्ट झेलने की अपनी क्षमता का परीक्षण करना चाहते हैं। अगर आप आरामतलबी और अपने संकीर्ण जीवन से ऊब चुके हैं और धरती के सुदूर विस्तार में फैली ज़िंदगी को मापना, देखना और समझना चाहते हैं तो इनमें से कोई एक वजह आपको इस रोमांचकारी, कष्टकारी यात्रा पर ले जाने के लिए पर्याप्त है। मेरा विश्वास कीजिए कि जब आप वापस आएँगे तो जीवन-जगत और प्रकृति के प्रति आपका दृष्टिकोण काफ़ी समृद्ध हो चुका होगा।

कैलाश-कथा-3

डा0 हरिओम

विलक्षण और बहुमुखी प्रतिभा के धनी संवेदनशील कवि – लेखक डॉ हरि ओम विभिन्न क्षेत्रों में पारंगत हैं। आप अच्छे गजल गायक होने के साथ ही बेहतरीन किस्सागो भी हैं जो श्रोता व पाठक को बांधने की कला को बेहतर जानता है। आप यूपी कैडर में वरिष्ठ आईएएस अफसर हैं। पिछले दिनों आपने कैलाश-मानसरोवर की यात्रा की। प्रस्तुत है इस दुर्गम यात्रा का श्रृंखलाबद्ध वृतांत एक अनूठी शैली में।

यात्रा से वापस लौटकर आने वाले कुछ यात्री जलपान के दौरान अपना अनुभव सुना रहे थे जिसमें यात्रा में मिले कष्ट का भी ज़िक्र था। एक युवा यात्री हिलसा में फंसने और कैलाश परिक्रमा के दौरान होने वाली परेशानी का हाल कुछ इस अंदाज़ में बता रहा था जैसे कि वह बहुत खुश-क़िस्मत था जो सकुशल वापस आ गया। हम यात्रा पर जाने के उत्साह से लबरेज होने के कारण उसे सुनकर भी अनसुना कर रहे थे। वैसे भी हमें आगे के सफ़र और पड़ावों के बारे में कुछ मालूम नहीं था, इसलिए उसकी आपबीती का हमारे लिए कोई ख़ास महत्त्व नहीं था। फैज़ के शेर ‘आये कुछ अब्र कुछ शराब आए, उसके बाद आये जो अज़ाब आए’ वाले अंदाज़ में हमने होटल के बुफे में खाना खाया। जो कुछ भी सीमित मेनू होटल ने यात्रियों के लिए रखा था वह हमें ठीक ही लगा। वैसे भी हम मानसिक रूप से एक कठिन यात्रा पर जाने को तैयार होकर घर से निकले थे। रहने और खाने के लुत्फ़ का मोह मन पहले ही छोड़ चुका था।

होटल में दो लोगों के लिए एक कमरा मिला था। मैं और आरडी सर एक कमरे में हो लिए थे। कैलाश यात्रा के संभावित रोमांच को लेकर हमने कुछ बातें कीं। फिर भोजन के बाद आने वाले आलस्य ने हमें अपने आगोश में ले लिया। हमने थोड़ी देर विश्राम किया।

जब हम चेतना में लौटे तो लखनऊ से नेपालगंज की लम्बी यात्रा की हमारी काफी थकान उतर चुकी थी। हमें पहले ही पता चल गया था कि होटल परिसर में एक स्विमिंग पूल भी है। मुझे मालूम था कि आरडी सर तैराकी पसंद करते हैं।

शाम को कुछ और करने को था भी नहीं यहाँ। सो मैंने ही प्रस्ताव रखा कि ‘क्यूँ न हम थोड़ी जल-क्रीड़ा करें!‘ आरडी सर को प्रस्ताव पसंद आया। थोड़ी ही देर में हम तैयारी के साथ मुक्ताकाशी स्विंमिंग पूल की तरफ चल पड़े। होटल-परिसर में काफी निर्माण कार्य चल रहा था। हम अपने प्रदेश की सीमा से बमुश्किल कुछ ही किलोमीटर बाहर थे लेकिन पूरा परिवेश हमें अजनबी होने का अहसास करा रहा था। स्विमिंग पूल भी नाम मात्र को था जिसमें भारी भरकम शरीर वाले श्रद्धालु और कुछ बच्चे अपनी गर्मी और थकान उतार रहे थे। पूल साइड में बने चेंज रूम्स भी क्लासिक थे। उनके दरवाज़े बंद नहीं होते थे। सिर के ऊपर पानी गिराने (शावर लेने) का सिस्टम भी अजीब था।

एक पाइप से पानी निकल रहा था। नीचे सीमेंट टाइल की फर्श थी जिस पर ठीक-ठाक गन्दगी थी। हमें काफी सावधानी और कुशलता से पूल में जाने से पहले ज़रूरी शावर लेना था। इसके अलावा सुरक्षा कर्मियों का हुलिया और आस-पास के ऊबड़-खाबड़ नज़ारे सब हमें बता रहे थे कि यह मंज़र हमारे लिए अजनबी है।

होटल परिसर में ही एक विशालकाय डिब्बा बंद बिल्डिंग और बन रही थी जिसमें सामने की तरफ़ छोड़कर किसी भी तरफ़ कोई खिड़की-दरवाज़ा नहीं था। आरडी सर को यह जानने की उत्सुकता थी कि आखिर यह है किसलिए?

हमने एक सुरक्षा गार्ड से पूछ ही लिया। पता चला कि यहां कैसिनो (जुआ घर) बन रहा है।

नेपाल में मैं पहली बार ही था लेकिन नेपाल के बारे में जो सुना था वह यही था कि यहाँ पूर्वांचल, उत्तर प्रदेश के रईस लोग जुआ खेलने और मसाज आदि करवाने जाते हैं।

बहुत पहले नेपाल से सस्ते इलेक्ट्रॉनिक्स के सामान भी लोग उत्तर प्रदेश की सीमा में लाया करते थे लेकिन अब वह आकर्षण नहीं रह गया था। अब नेपाल का ज़िक्र आते ही हमें ज़ाली नोट्स, नशे और सेक्स-कारोबार, संगठित अपराधियों के सुरक्षित ठिकानों, मधेशी आंदोलनों, अस्थिर सरकारों और कम्युनिस्ट राजनीति के असर में जीते हुए एक छोटे बदहाल हिंदू देश का ख़याल आता है। कुछ साल पहले तक मुझे नेपाल के नाम पर सिर्फ हिंदी सिनेमा की खूबसूरत अभिनेत्री मनीषा कोइराला ही याद आती थी। अब इधर यही सब चीज़ें याद आती हैं।

आरडी सर को स्विमिंग पूल पर तैनात सुरक्षा कर्मी ने पूल में उतरने से पहले मानक के अनुरूप अधोवस्त्र (कॉस्टयूम) ख़रीदने के लिए भी बाध्य किया। उनके अधोवस्त्र को उसने मानक के अनुरूप नहीं पाया। जैसी भोले की इच्छा थी! आरडी सर ने उसे स्वीकार किया सुरक्षा कर्मी ने उन्हें चाय-कोल्ड ड्रिंक के स्टाल पर एक अलमारी में रखे हुए स्विमिंग कॉस्टयूम के बंडल से एक सस्ता कामचलाऊ पीस निकालकर दिया। खैर, उनका यह अल्प निवेश बाद में मानसरोवर में डुबकी लगाने के काम आया। मैं इत्तेफाक़ से अपने साथ प्रॉपर अधोवस्त्र ले गया था, इसलिए पूल रक्षक की पारखी नज़र में मैं पास हो गया था। हमने छोटे कामचलाऊ पूल में कुछ देर अपनी गर्मी और थकान उतारी फिर कमरे पर वापस आ गए। तब तक दिन ढलने लगा था।


शाम को खाने के दौरान हमारा परिचय मि. भटनागर के साथ दूसरी गाड़ी में आए हुए चार अन्य सहयात्रियों से हुआ। इसमें मि. वाधवा और उनकी पत्नी, मि. नागपाल और मूलतः केरल की रहने वाली एयर इंडिया की कर्मी राजलक्ष्मी थीं। राजलक्ष्मी के बारे में यह चर्चा थी कि वह पहले चौबीस बार कैलाश जा चुकी हैं और यह उनकी सिल्वर-जुबली यात्रा थी।

हम बड़ी हैरत से उन्हें देख रहे थे। देखने से वह एक सामान्य कद-काठी की छोटे बालों वाली आज़ाद-ख़याल महिला लग रही थीं। वह इस क़दर धार्मिक विचारों वाली होंगी, ऐसा उनके व्यक्तित्व से पहली नज़र में नहीं लगा। उनका हिंदी बोलने का अंदाज़ रोचक था। दिल्ली में काफी अरसे से रहने की वजह से वह हिंदी भी ठीक-ठाक बोल समझ लेतीं थीं। उनके सामने हम सब नौसिखिया यात्री थे, इसलिए उनसे आगे के सफ़र के बारे में जाने क्या-क्या जानना चाह रहे थे लेकिन लक्ष्मी जी बस मुस्कुराकर ‘बाबा भोले की कृपा’ कह देती थीं।

इस बीच मि. भटनागर ने हम सबको एक-एक कैरी बैग और एक पिट्ठू बैग दिया। साथ में एक विशेष जैकेट दी जो सर्दी, बरसात झेल सकती र्थी। यह बैग्स और जैकेट हमें एक समूह में बदल रहे थे। बैग नीले रंग के थे और उस पर नम्बर पड़े थे जिससे प्रत्येक यात्री को अपने बैग की पहचान याद रहे। जैकेट नीले और पीले रंग की थी। हमने होटल के रिसेप्शन पर ऐसे कुछ और रंगों के बैग और जैकेट भी देखे जिन पर अलग-अलग टूर ऑपरेटिंग कंपनियों का नाम लिखा था। हमारे बैग और जैकेट दोनों पर ‘‘ओझा हॉलीडेज (प्रा0) लि0 नेपाल’’ लिखा था। पता चला कि अब पूरी यात्रा के लिए हम ‘ओझा’ के हवाले थे। हमारी तरफ ओझा झाड़-फूँक, टोना-टोटका, तंत्र-मंत्र करके प्रेत छाया आदि उतारने वाले अवधूत-विशेषज्ञों को कहा जाता है लेकिन वहां नेपाल में ओझा परिवार कैलाश-मानसरोवर यात्रा का प्रवंधन करने वाला एक बड़ा ऑपरेटर परिवार था। इस परिवार के सदस्य और रिश्तेदार ही नेपाल से लेकर तिब्बत तक, अन्य स्थानीय सहयोगियों के सहारे, कैलाश-यात्रियों की पूरी व्यवस्था देखते थे।

बाद में हमने निष्कर्ष निकाला कि मि0 भटनागर दरअसल इन्हीं ओझा के दिल्ली में बैठे हुए एजेंट थे जो शायद कमीशन पर काम करते रहे होंगे। उनके जैसे तमाम दूसरे एजेंट भी दिल्ली और देश के दूसरे बड़े शहरों में रहे होंगे जिनके ज़रिये ओझा को कैलाश-यात्री मिलते रहे होंगे। जैसे ही हम मि0 भटनागर से आगे की यात्रा और अपने पासपोर्ट-वीसा के बारे में पूछते, वह कहते ‘‘सर! बाबा भोले अच्छा ही करेंगे’’ और बकाया पैसों की माँग करते।

डिनर पर भटनागर ने कहा कि हम लोगों को कल सवेरे छह बजे तक तैयार रहना है। सात बजे तक नाश्ता वगैरह कर लेना है। उसके बाद कभी भी एयर पोर्ट से हमारा बुलावा आ सकता है। पता चला कि नेपालगंज से छोटे (15-18 सीटर) विमानों द्वारा यात्रियों को सिमीकोट ले जाया जाता है जो लगभग 11000 फीट की ऊँचाई पर बसा एक पहाड़ी कस्बा है। रात में ही भटनागर ने हमसे बची हुई सकल राशि ले ली और प्रसन्नमुख अंतर्ध्यान हो गए।

सवेरे हम समय से नहा-धोकर तैयार थे। होटल में काफी रौनक थी। हमने कहे मुताबिक अपने साथ लाये बैग से सामान वगैरह निकालकर ‘ओझा हालीडेज’ वाले नीले एयरबैग और पिट्ठू बैग में जमा लिये थे। अपना बैग हमें होटल के ही लॉक रूम में छोड़ना था जो हमें अब वापसी में ही मिलने वाला था। मोटी जैकेट मैंने ऊपर रख ली थी। धूप चश्मा और कंटोप भी ऊपर निकाल कर रख लिया था। चेहरे पर सन-क्रीम लफोंद ली थी। सूखी आलू के साथ पूरी, रूखा पोहा और ब्रेड-जैम का नाश्ता लगा हुआ था। कॉफ़ी-चाय की बाल्टियाँ भी रखी थीं। अपनी पसंद और स्वाद के मुताबिक छानबीन करके कुछ-कुछ खाया हम सबने।

अब हम सब रोमांचक कैलाश मानसरोवर यात्रा पर आगे सिमीकोट कूच करने के लिए शरीर और मन से पूरी तरह तैयार हो चले थे।

पिट्ठू बैग के दोनों किनारों पर मैंने पानी की बोतलें ठूंस दी थीं। एक तरफ नार्मल वाटर दूसरी तरफ थर्मस बोतल में गरम पानी जिसे मैंने होटल के कमरे में रखी विद्युत-चलित चाय की केतली में ही गर्म किया था।

लगभग 8 बजे मि0 भटनागर प्रकट हुए। उन्होंने कहा कि रास्ते में मौसम खराब होने के कारण अभी एयरक्राफ्ट नहीं आया है लेकिन हमें कभी भी बुलावे के लिए तैयार रहना है। हम अपने कमरे पर जाकर प्रतीक्षा कर सकते हैं। आरडी सर ने कहा कि हम तब तक पास ही स्थित बागेश्वरी मन्दिर का दर्शन कर आते हैं। भटनागर इस प्रस्ताव पर थोड़ा असमंजस में दिखे लेकिन जहाज का समय तय न होने के कारण वह आरडी सर के इस आग्रह को टाल नहीं सके और खुद ही हमें लेकर देवी मन्दिर की तरफ ई-रिक्शा से चल पड़े थे। आरडी सर, मैं और डा0 गुप्ता साथ थे। हमारे आठ वाले समूह के बाक़ी सदस्यों ने बीती शाम ही इस मंदिर का दर्शन तब कर लिया था जब हम स्विमिंग पूल में जल-क्रीडा कर रहे थे। डॉ गुप्ता भी हो आये थे लेकिन वह हमारे भी सहचर बने।

हमने पहली बार नेपालगंज को मुख्य सड़क से थोड़ा भीतर जाकर देखा। रिक्शे वाले को किराये के पैसे भटनागर ने दिए। नेपाली टका उन्हीं के पास था। एक पुरानी टूटी-फूटी गली, जिसके दोनों किनारों पर पूजा-अर्चना सामग्री बेचने वाली दुकानें थीं, से गुजरकर हम एक विशाल परिसर में दाखिल हुए। सामने बेहद मलिन जल से भरा हुआ एक जलाशय था जिसके किनारे शायद पीपल का एक पुराना पेड़ भी था। गंदगी और अव्यवस्था के मामले में यह हमारे यहाँ के सामान्य पूज्य परिसरों जैसा ही था। जाने हम अपने धर्म-स्थलों की स्वच्छता को लेकर कब गंभीर होगें?

आस-पास कुछ चबूतरे और एक अत्यंत पुराना मन्दिर था। एक बड़ा मंडप भी था। शायद उसमें यज्ञ-हवन हुआ करता रहा होगा। मंदिर के मुख्य द्वार पर ही ‘ऊॅ ऐं हीं क्लीं चामुंडाय विच्चे’ लिखा हुआ था। आरडी सर ने देवी के इस मंत्र के महात्म्य पर थोड़ी देर चर्चा की। दरअसल यह मंत्र आदि शक्ति दुर्गा की स्तुति हेतु सर्व प्रचलित है। इसे नवार्ण मंत्र भी कहते हैं क्यूंकि मूल मंत्र नौ अक्षरों का है जो दुर्गा पूजा के दौरान एकत्रित नौ ग्रहों के मनुष्यों पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को शांत करने के लिए जपा जाता है। विजय दशमी पर्व को ध्यान में रखते हुए इसके पहले कहीं-कहीं ‘ॐ’ भी जोड़ दिया जाता है जैसा कि इस मंदिर में लिखा गया था। यह मंत्र बता रहा था कि मुख्यतः यह देवी मंदिर था लेकिन भीतर गर्भ गृह में अन्य देवताओं की प्रतिमाएं भी स्थापित थीं।

हिंदू धर्म की एक और खासियत यह है कि हर कोई अपनी पसंद और ज़रूरत के मुताबिक यथावसर उपयुक्त देवी देवता ढूंढ-पा लेता है। यहाँ शौर्य, साहस, करुणा, सौन्दर्य, बुद्धि, ज्ञान, कला,ऐश्वर्य  आदि के लिए अलग-अलग दैवीय शक्तियों की कल्पना की गई है।

इस धर्म के अनुयायियों में मर्ज़ी-मुताबिक़ देवी-देवता ढूँढने-पाने का यह सिलसिला इतना लम्बा चला कि यह संख्या तैतीस कोटि तक जा पहुंची है।

खैर, इस मन्दिर का स्थापत्य हिन्दू मन्दिरों से अलग था। इस पर बौद्ध स्थापत्य का असर था। इसके गुम्बद और कंगूरे अलग तरह के थे। परिसर में ही काले पत्थर से बनी खड़े हुए गणेश की एक सुन्दर विशाल प्रतिमा थी, जिस पर स्वर्णाभूषण और मुकुट सुशोभित था। सुबह-सुबह भी यहाँ श्रद्धालुओं की ठीक-ठाक भीड़ थी। हमने जरूरी दर्शन-पूजा की। कुछ तस्वीरें खींचीं और जल्दी ही होटल वापस आ गये।

घंटा भर बाद हमें बताया गया कि सबको एयरपोर्ट रवाना होना है। कुछ मिनी बसें होटल के सामने थीं। हमने पिट्ठू बैग सम्हाला हुआ था। बड़े एयर बैग पर प्रिंट नम्बर मैंने याद कर लिया था और एहतियातन उसकी एक तस्वीर भी मोबाइल में उतार ली थी। मेरे मोबाइल ने नेपालगंज पहुँचते ही काम करना बन्द कर दिया था। होटल से निकलते ही वाईफाई का भी सहारा छूटा। मैंने अपने एक मित्र से एक छोटा फोन ले रखा था जो नेपाल और चीनी प्रवास के दौरान काम आने वाला था। मैंने उसे रात में फुल चार्ज भी कर लिया था। आरडी सर ने लखनऊ में ही अपने मोबाइल का त्याग कर दिया था और वे मोह-माया से मुक्त लग रहे थे।

आज के समय में जहाँ हम वास्तविक परिवेश और जीवन से पूरी तरह कटकर मोबाइल की छद्म-दुनिया में ही सुख-सांत्वना खोज रहे हैं, ऐसे में मोबाइल का पूर्णतः त्याग शास्त्रों में बताए गए अन्य बड़े त्यागों (तामसिक, राजसिक या सात्विक) से कमतर नहीं!

हम मोबाइल पर जितने ही सोशल होतें जा रहे हैं असल ज़िन्दगी में उतने अकेले और दिखावा पसंद हो रहे हैं। आभासी को ही यथार्थ मान बैठे हैं। ऐसे में आरडी सर का मोबाइल त्याग वरेण्य था। उनके मोबाइल त्याग से मैं काफी प्रभावित था। हालाँकि वे यह त्याग इसलिए कर सके कि उन्होंने सोनी ब्रांड का एक नया डिजिटल कैमरा अपने पास रखा था जो अच्छी तस्वीरें खींच रहा था और हमारे सहचर डॉ गुप्ता के पास अंतर्राष्ट्रीय रोमिंग सुविधा से युक्त एक स्मार्ट फ़ोन था जिससे आरडी सर का ज़रूरी संवाद हो जा रहा था। किन्तु मुझे लगा था कि इतने रोज़ अपनी जगह और परिवार से बाहर दूर होने पर बातचीत के लिए फोन की ज़रूरत पड़ेगी। और उससे भी ज़्यादा ज़रूरत पड़ेगी तस्वीरें खींचने के लिए। आजकल के फ़ोन बातचीत के लिए कम फोटो खींचने और गूगल-यूट्यूब पर मनोरंजन करने के ज़्यादा काम आते हैं। सो मुझसे यह त्याग नहीं बन पड़ा था।

खैर थोड़ी देर में हम सभी आठ सहयात्री अपने ग्रुप के बाकी कुछ अन्य यात्रियों के साथ बस में थे। लोग उत्साह में थे। रह रह कर ‘जय भोले’, ‘बम भोले’, का उद्घोष हो रहा था। सुबह-सवेरे सबमें बड़ा जोश था। थोड़ी ही देर में हम नेपालगंज एयरपोर्ट पर थे। यही वह जगह थी जहाँ पहुँचकर हमें पहली बार लगा कि यह यात्रा अलग होने वाली है और हमें आगे कई और आश्चर्यजनक दृश्यों, अनुभवों के लिए तैयार रहना होगा।

क्रमशः

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