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‘कैलाश-कथा-6’ : हरिओम IAS

‘कैलाश-कथा-6’ : हरिओम IAS

…..बाहर की सर्दी और उबड़-खाबड़ पहाड़ी धरातल की वजह से यह विकल्प अत्यंत दुस्साहस की मांग करता था और ‘नीला आसमां सो गया..’ वाली स्थिति यानि रात के अँधेरे में तो इस बारे में सोचना भी हांड कपाने वाला था…!!!

कैलाश-मानसरोवर यात्रा 

अगर आपको सनातन हिन्दू धर्म में आस्था है। अगर आपको पौराणिक मान्यताएँ आकर्षित और प्रेरित करती हैं। अगर आप प्रकृति के विराट विहंगम रूप का साक्षात्कार करने से रोमांचित होते हैं। अगर आप ज़िंदगी को रोज़मर्रा घटित होने वाले उपक्रम से कुछ अलग समझते हैं। अगर आप शारीरिक और मानसिक कष्ट झेलने की अपनी क्षमता का परीक्षण करना चाहते हैं। अगर आप आरामतलबी और अपने संकीर्ण जीवन से ऊब चुके हैं और धरती के सुदूर विस्तार में फैली ज़िंदगी को मापना, देखना और समझना चाहते हैं तो इनमें से कोई एक वजह आपको इस रोमांचकारी, कष्टकारी यात्रा पर ले जाने के लिए पर्याप्त है। मेरा विश्वास कीजिए कि जब आप वापस आएँगे तो जीवन-जगत और प्रकृति के प्रति आपका दृष्टिकोण काफ़ी समृद्ध हो चुका होगा।

 

डा0 हरिओम

विलक्षण और बहुमुखी प्रतिभा के धनी संवेदनशील कवि – लेखक डॉ हरि ओम विभिन्न क्षेत्रों में पारंगत हैं। आप अच्छे गजल गायक होने के साथ ही बेहतरीन किस्सागो भी हैं जो श्रोता व पाठक को बांधने की कला को बेहतर जानता है। आप यूपी कैडर में वरिष्ठ आईएएस अफसर हैं। पिछले दिनों आपने कैलाश-मानसरोवर की यात्रा की। प्रस्तुत है इस दुर्गम यात्रा का श्रृंखलाबद्ध वृतांत एक अनूठी शैली में।

होटल पहुंचकर हम आठों ने एक कमरे में तो खुद को व्यवस्थित किया ही लेकिन जो सबसे ज्यादा ज़रूरी बात थी वह थी, टॉयलेट की सुविधा और सहूलियत का पता लगाना. हममें से लगभग सभी ने अलग-अलग इसका जायज़ा लिया. इस ढाई तल्ला होटल में हर तल्ले पर एक-एक शौचालय था. होटल में नीचे मैदान के बगल में एक सेट लैट्रीन बाथरूम था. उसके बाहर एक वाश बेसिन भी बना था. हर तल्ले पर एक वाश बेसिन अलग से लगाया गया था. इस तरह कुल जमा चार टॉयलेट, तीन वाश बेसिन और एक नहान घर. इसमें से तीन वेस्टर्न स्टाइल के कमोड और एक भारतीय शैली का शौचालय.

होटल में कुल मिलाकर चौदह-पंद्रह कमरे रहे होंगे. हर कमरे में कम से कम छः और ज़्यादा से ज़्यादा आठ यात्री ठहरे हुए थे. अब तकरीबन सौ लोगों के बीच यही जन-सुविधा थी. इसमें से भी नीचे मैदान के बगल वाला टॉयलेट बाहर खुले में होने की वजह से कम इस्तेमाल होता था. बाकी तीन में दो कमोड स्टाइल होने की वजह से ज़्यादा डिमांड में थे. फलतः फ़ारिग होने के लिए काफ़ी इंतज़ार करना पड़ता था अन्यथा आप ‘नीले अम्बर में कहीं खुले में…’ जाने के लिए स्वतंत्र थे. हालाँकि बाहर की सर्दी और उबड़-खाबड़ पहाड़ी धरातल की वजह से यह विकल्प अत्यंत दुस्साहस की मांग करता था और ‘नीला आसमां सो गया..’ वाली स्थिति. यानि रात के अँधेरे में तो इस बारे में सोचना भी हांड कपाने वाला था.

रात में खाना-पीना और किचेन की साफ़-सफ़ाई हो चुकने के बाद होटल में जनरेटर बंद हो जाता था और फिर पूरा सिमीकोट पहाड़ों की गोद में सर्दी का लिहाफ़ ओढ़ अपने भीतर सिमट जाता था. इसलिए होटल में मौजूद जन-सुविधा का लुत्फ़ उठाने के लिए आपको अपनी दिनचर्या को लचीला बनाना ज़रूरी था. हमारे तल्ले पर भी सबने वैसे ही किया. ख़ासकर महिलाओं ने.

मैंने अपने कमरे के बगल से ऊपर जाने वाले ज़ीने की तरफ़ रुख किया. यह होटल का अढ़ाईवां तल्ला था. यहाँ दो ही छोटे कमरे थे जिनमें प्रत्येक में छः यात्री रहे होंगे. इस तल्ले पर भारतीय शैली का टॉयलेट था. तल्ले पर यात्री कम होने और टॉयलेट इंडियन स्टाइल का होने की वजह से इस पर दबाव काफी कम था. मैंने अपने लिए इसी का चयन किया. मुझे गाँव की ज़िन्दगी में नित्य-कर्म के क्षेत्र में मिली लम्बी ट्रेनिंग और अनुभव का फ़ायदा मिला. मेरे घुटने अभी भी मज़बूत हैं और इस मामले में मेरी पसंद आज भी भारतीय है. कड़क ठंड होने कि वजह से हममें से कोई नहाने का हिमायती नहीं था, सो वो मसला अपने आप ही सुलझ गया था. वैसे भी यह यात्रा तन का मैल धोने के बजाय मन का मैल धोने के उद्देश्य से की जा रही थी इसलिए उसमें नहाने या न नहाने से कोई फ़र्क पड़ने वाला नहीं था.


सिमीकोट में हमने पहला बचा हुआ आधा दिन होटल के साझा कमरे में बिताया। पहली बार दरअसल हम आठ लोग एक साथ बड़े ग्रुप से अलग एक कमरे में दाख़िल हुए और शाम तक हमें इस सहचार का अनुभव होना भी शुरू हुआ. आरडी सर ने ग्रुप को मेरे गायक होने की बात बता दी थी सो शाम को डिनर से पहले बातचीत करते-करते सबने कमरे में महफ़िली माहौल बना दिया था. शुरुआत आरडी सर ने अपनी शायरी से की,-

‘अभी सूरज नहीं डूबा अभी तो शाम होने दो.

मैं खुद ही लौट जाऊंगा मुझे नाकाम होने दो.

मुझे बदनाम करने का बहाना ढूँढने वालों.

मैं खुद बदनाम हो जाऊंगा पहले नाम होने दो…’

अपने खास अंदाज़ में यह अशआर पढ़ने के बाद आरडी सर ने मोहक हंसी बिखेरी और हम सबने ‘वाह..वाह’ कहते हुए दाद दी. कमरे के भीतर शम्म-ए-सुख़न अब मेरी तरफ थी. मैंने किशोर का गाया हुआ एक पुराना फ़िल्मी गीत- ‘खिलते हैं गुल यहाँ खिल के बिखरने को…मिलते हैं दिल यहाँ मिल के बिछड़ने को..’ जो मुझे हमेशा से ही बड़ा पसंद रहा है, गाया. फ़िल्मी गीतों के मामले में मैं अक्सर रफ़ी साहब के गीत ही गाता हूँ लेकिन उस शाम जाने कैसे यह नग्मा ज़हन में आ गया था. वैसे किशोर कुमार का जो गीत छात्र जीवन से ही मेरे दिल के सबसे क़रीब रहा है वह है,-‘ओ हंसिनी! कहां उड़ चली, मेरे अरमानों के पंख लगाके, कहाँ उड़ चली..’.उसके बाद नंबर आता है—‘चांदनी रात में इक बार तुझे देखा है..’ का.खिलते हैं गुल यहाँ…’यक़ीनन तीसरे नंबर पर आता है.

बहरहालगाना सबको बहुत अच्छा लगा था. लगे हाथ आरडी सर ने ‘सिकंदर हूँ…’ग़ज़ल का ज़िक्र भी छेड़ दिया. सबको यह बताया कि मेरी यह ग़ज़ल कितनी मशहूर है.और फिर मुझे यह ग़ज़ल गानी पड़ी. मैंने इतना कुछ लिखा-गाया है लेकिन ‘सिकंदर’ ने बाक़ी ग़ज़लों की तरफ श्रोताओं का ध्यान कम जाने दिया है. यह मुझे अच्छा भी लगता है लेकिन कई दफ़ा ख़राब भी. सबको कुछ न कुछ सुनाना था. मिसेज़ वाधवा ने एक पक्की पंजाबी कविता सुनाई थी जिसका उनवान था ‘नाड़ा’. मज़ेदार लहजे ने पंजाबी ज़ुबान के स्वाद को और बढ़ा दिया था. मि.वाधवा इस बीच अपनी मासूम मुस्कराहट से अपनी पत्नी का उत्साहवर्धन करते रहे.

नागपाल जी मुश्किल पंजाबी शब्दों के अर्थ बताते जा रहे थे. डॉ गुप्ता ऐसे अवसरों पर अपने मोबाइल का बखूबी इस्तेमाल करते थे. वह इस पूरी नसरियात की विडियो बना रहे थे. फिर नागपाल जी ने भी एक चुटकुला सुनाया था. बाकी मि.वाधवा और मिसेज गुप्ता ने अच्छे श्रोता की भूमिका निभाई. इस खूबसूरत अंदाज़ में सिमिकोट में हमारी वह पहली शाम गुज़री थी कि हमें पता ही न चल सका कि कमरे से बाहर ठंड कितनी बढ़ गई थी। यह हमें तब पता चला जब हम नीचे खाना खाने जाने के लिए अपने कमरे से बाहर निकले.

हमारा होटल शायद सिमीकोट के सबसे अच्छे होटलों में से एक था लेकिन वहां भी वाई-फाई काम नहीं कर रहा था। आरडी सर ने अपने पास फोन नहीं रखा था। मेरा फोन भी नेपाल सीमा में आते ही काम करना बंद कर चुका था। अब उसका उपयोग इंटरनेट की उपलब्धता पर ही निर्भर था। मैनें जो एक रोमिंग नम्बर वाला फ़ोन ले रखा था उसने सिमिकोट पहुँचते ही दगा दे दिया. मैंने होटल के हर कोने पर जाकर उसे इधर-उधर कनेक्ट करने की कोशिश की लेकिन हर बार वही ख़ाली आवाज़ें, वही सर-सर, खर-खर. मैंने फ़ोन सेटिंग के सारे बटन दबा के देख लिए मगर बात नहीं बनी. फ़ोन तो चालू न हो सका लेकिन इस बीच ख़याल में दो शेर आये. एक तो फैज़ का ‘राज़-ए-उल्फ़त छुपा के देख लिया. दिल बहुत कुछ जला के देख लिया.’ और दूसरा ग़ालिब का,-‘नुक्ताचीं है ग़म-ए-दिल उसको सुनाए न बने. क्या बने बात जहाँ बात बनाए न बने.’ उधार के इस रोमिंग फ़ोन के साथ अब मेरा यही रिश्ता बन चला. मैं उसे मनाने की कोशिशें जितनी दूर तक करता वह अपने रूठने की हदें वहां तक बढ़ा देता.

मैंने डॉ गुप्ता का फ़ोन मांग लखनऊ अपने मित्र को इसकी सूचना दी. उनके मुताबिक वोडाफ़ोन को ज़रूरी पैसे आदि दिए गए थे. उन्होंने कस्टमर केयर को सूचना दी. अब वोडाफ़ोन कस्टमर केयर से डॉ गुप्ता के फ़ोन पर बीच-बीच में मुझे हिदायतें मिलतीं रहीं. मैं उनका पालन भी करता रहा लेकिन परिणाम वही ढाक के तीन पात. मि.नागपाल का फोन लगातार सक्रिय रहता था। उन्हें कारोबार से सम्बंधित फोन आते रहते थे और जब फोन नहीं भी आ रहा होता तो भी वे फ़ोन पर ही आँखें गड़ाए होते. खेलों और राजनीति से जुड़े हुए तमाम किस्से उनके पास थे जिस पर उनका तजकिरा चलता रहता था।

डा. गुप्ता का फोन भी यदा-कदा बज उठता था। फोन तो मि.एंड मिसेज वाधवा के पास भी था लेकिन उसकी घंटी कभी-कभार ही बजती। सिमीकोट में हमारा पहला आधा दिन यात्रा के दौरान होने वाली संभावित मुश्किलों, मौसम की मेहरबानी, रूकने खाने की व्यवस्था और टायलेट की गंदगी आदि पर चर्चा करते हुए ठीक-ठाक गुजरा। ग्रुप के सदस्यों ने खाने-पीने की चीजों के साथ ही दवाइयों का पिटारा भी खोल लिया था। दवाइयों के मामले में जो सबसे ज़्यादा बार बोला और सुना गया शब्द था वह था—डाई मोक्स.

डाई म़ोक्स का नाम मैंने पहली दफा सुना। यह एक तरह से मेरी एहतियाती मासूमियत की इन्तेहा थी. सब लोग हाई-एल्टीट्यूड के एडवर्स इफेक्ट से बचने के लिए सुबह-शाम एक-एक डाई मोक्स की गोली खा रहे थे। हमारे बीच आरडी सर और गुप्ता जी बाक़ायदा दक्ष चिकित्सक थे इसलिए उनके मूल्यवान मशवरे भी हम सबको मिल रहे थे. मुझे भी सुझाव दिया गया कि इस यात्रा पर एहतियातन डाई मोक्स खाना जरूरी है। दिनभर की धूप, कठिन यात्रा और अब उससे भी कठिन सर्दी की वजह से मेरे सिर में भी हल्का दर्द हो रहा था लेकिन मैंने दवा नहीं ली। रात का खाना खाकर हमने कमरे पर थोड़ी चकल्लस और की और फिर होटल में जनरेटर बंद होने से रौशनी रुखसत हो ली.

चारों तरफ़ सुनसान अँधेरा था जो वाक़ई सोने में सहायक था. सब लोग लगभग अर्द्ध-निद्रा की हालत में थे कि अचानक डॉ गुप्ता का फ़ोन बजा. दूसरी तरफ़ वोडाफ़ोन कस्टमर केयर से वही पुराना बंदा था. मैंने बेमन से आख़िरी उम्मीद के साथ उससे बात की. उसने फ़ोन को एक्टिवेट करने के जो टिप्स दिए वह सब मैं पहले ही आज़मा चुका था. मैं उस पर थोड़ा झल्लाया भी था. उसने सवेरे फिर नई टिप्स देने का वादा करते हुए फ़ोन रख दिया. इस बीच कमरे में बाक़ी लोग वापस चैतन्य हो गए थे. कुछ ने शायद मन ही मन मुझे कोसा भी हो. खैर अब इसमें मेरा क्या कसूर. उन्हें मेरे बजाय वोडाफ़ोन या उस कस्टमर केयर वाले बन्दे को कोसना चाहिए था.

जो भी हो अब हम सबको नए सिरे से सोने की कोशिश करनी थी. ख़ुद सोने से पहले मैंने आख़िरकार उस तथाकथित रोमिंग फ़ोन को हमेशा के लिए गहरी नींद में सुला अर्थात बंद कर दिया था. अब न तो उसके जागने की उम्मीद बची थी और न ही उसे जगाने की मुझमें इच्छा.

मैं भी अब आरडी सर की तरह मोबाइल मोह से मुक्त था. बची हुई रात भारी जैकेट और कनटोप लगाए निकल गई।

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