काका : एक बाग़बान का यूँ
चले जाना
प्रमोद कुमार तिवारी

लेखक उत्तर प्रदेश के राज्य सूचना आयुक्त हैं
काका नहीं रहे! 21 सितम्बर को अचानक भोर में ख़बर आयी कि काका का स्वर्गवास हो गया । 9 सितंबर को न्यूरो समस्या के चलते काका अस्पताल में भर्ती हुए थे ।14 सितंबर को जब मैं, मीनू तथा मून की नानी उन्हें देखने बीएच यू गये तो काका बहुत आशान्वित लग रहे थे। मीनू का हाथ पकड़ कर देर तक बातें करते रहे। उनकी ऊर्जा एवं उत्साह को देख कर नहीं लगता था कि महज़ एक हफ़्ते में ही हमें छोड़ कर चले जायेंगे।

काका 90 बरस के थे। लगभग 30 बरस पहले वे भूमि संरक्षण अधिकारी के पद से रिटायर हुए थे । बनारस के पहाड़ियाँ में ग़ाज़ीपुर रोड पर कुछ सस्ती ज़मीन ख़रीद कर उस पर एक सामान्य सा मकान बना कर काका-काकी रहते थे।काका के दो बेटे थे । बड़े बेटे मुन्ना ग्रामीण बैंक जौनपुर में ब्रांच मैनेजर थे । छोटे बेटे वीर पढ़ लिख कर नौकरी तलाश रहे थे एवं काका काकी के साथ रहते थे । ज़िंदगी ख़ुशहाल थी। एक मध्यमवर्गीय परिवार की हसरतें भी कितनी होती हैं?
मुन्ना अपनी पत्नी राधा एवं तीन बच्चों के साथ जौनपुर में तथा वीर एवं उनकी पत्नी काका-काकी की स्नेहिल छाया में पहाड़ियाँ बनारस में रह रहे थे ।
सन 1995 में मुन्ना एक बीमारी के कारण अचानक चल बसे । मौत चुपके से आयी । जब तक परिवार के लोग कुछ कर पाते, मुन्ना हम सब को छोड़ करे चले गये। काका -काकी एवं राधा भाभी का तो मानो सब कुछ लुट गया। बूढ़े पिता के कंधे पर जवान बेटे की अर्थी देख कर किसका कलेजा नहीं फट गया !

अक्टूबर 1995 की उस रात को पहाड़ियाँ में काका का घर जो उजड़ा तो फिर कभी गुलज़ार ना हो सका।
लेकिन एक बाग़बान की तपस्या तो अब शुरू हुई थी ।
कुछ साल पहले अमिताभ -हेमा की फ़िल्म बाग़बान आयी थी । फ़िल्म में दिखाया गया था कि किस तरह अमिताभ के रिटायरमेंट के बाद उनके चार बेटे अपने माँ – बाप को अपने साथ रखने में टाल मटोल करते हैं , एक प्लान के तहत ज़िम्मेदारी निभाने के नाम पर ६ -६ माह के लिए माँ बाप को अलग -अलग बेटों के यहाँ रहने के लिए मजबूर करते हैं ताकि किसी एक पर आर्थिक बोझ ना पड़े।
बाग़बान फ़िल्म के कथानक का मर्म यही है कि जिन बच्चों को माता -पिता अपना पेट काट कर पालतें हैं , वे ही बच्चे अपनी प्राइवसी , सुविधा एवं बढ़ते ख़र्चो का हवाला देकर पति-पत्नी को एक दूसरे से अलग रहने को मज़बूर कर देते हैं। फ़िल्म कितनी मार्मिक बन पड़ी थी कि आज भी टीवी पर देख कर माँ – बाप अपने आँसू नहीं रोक पाते हैं।

काका भी बाग़बान थे लेकिन फ़र्क़ यही था की उन्हें काकी से उनके बच्चों ने अलग नहीं किया था।
विधवा बहू को ग्रामीण बैंक में मृतक आश्रित के रूप में क्लर्क की नौकरी मिल गयी थी । अपने छोटे -छोटे तीन बच्चों को लेकर राधा भाभी जौनपुर में रहने को मज़बूर थीं।
काका ने वह किया जो अकल्पनीय था । अगले 25 वर्ष काकी विधवा बहू एवं बच्चों की देखभाल के लिये जौनपुर चली गयीं। काका अपने बेरोज़गार छोटे पुत्र की गृहस्थी सवारने के लिए बनारस में ही रुक गये। इस बाग़बान ने उर्मिला – लक्ष्मण के त्याग की याद दिला दी।
इस त्याग को शायद बहुतों ने नोटिस भी नहीं किया । परिवार के बहुतेरे सदस्यों, यहाँ तक कि बच्चों को भी काका – काकी के इस ओढ़ें हुए वियोग का शायद ही कभी अहसास हुआ होगा। काका का कथानक सहज ही किसी महाकाव्य की विषय वस्तु हो सकती थी।
काका का अंत एक दधीचि का अंत है, जिन्होंने अपने बच्चों की ख़ुशहाली के लिए अपना सब कुछ दे दिया। अंतिम समय तक वे परिवार के पालन में लगे रहे । जीवन के अंतिम वर्षों में काका को मलाल रहा कि उनके बच्चों एवं नाती पोतों ने कदाचित उनके त्याग को उतना नहीं सराहा!

अस्पताल में पूरा परिवार काका की तीमारदारी में जुटा रहा । काका निश्चय ही संतुष्ट हुए होंगे। काकी के भविष्य को लेकर शायद उन्हें कुछ चिंता अवश्य रही होगी।
उम्मीद है कि उनके बच्चे-बहुएँ, नाती पोते बिना किसी मतभेद के उन्हें अविभाजित प्यार एवं सम्मान देंगे एवं सेवा करेंगे। काका को यही सच्ची श्रधांजलि होगी।
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