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“सेंगोल” क्या है और इसका इतिहास कितना पुराना है जिसे नए संसद भवन में रखा जाएगा?

‘सेंगोल-राजदंड’ की स्थापना के लिए संसद से पवित्र जगह और कोई नहीं हो सकती, यह “राजदंड” चांदी से बनाया गया है, इसमें सोने की परत चढ़ाई गई है…!!

सेंगोल जो इलाहाबाद के संग्रहालय में रखा हुआ था, उसे नौ महीने पहले ही दिल्ली ले जाया गया था। जब सेंगोल की जानकारी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी को मिली तो, गहन जांच करवाई गई, और फिर यह निर्णय लिया गया कि उसे राष्ट्र के सामने रखना चाहिए !! इसके लिए नए संसद भवन के लोकार्पण के दिन को चुना गया।

“28 मई को जब नए संसद भवन में इसे प्रतिष्ठित किया जाएगा तो इस अवसर पर एक ऐतिहासिक परंपरा पुनर्जीवित होगी। इसके पीछे युगों से जुड़ी हुई एक परंपरा है। इसे तमिल में सेंगोल कहा जाता है और इसका अर्थ संपदा से संपन्न और ऐतिहासिक है। 14 अगस्त 1947 को एक अनोखी घटना हुई थी। इसके 75 साल बाद आज देश के अधिकांश नागरिकों को इसकी जानकारी नहीं है। सेंगोल ने हमारे इतिहास में एक अहम भूमिका निभाई थी। यह सेंगोल सत्ता के हस्तांतरण का प्रतीक बना था। इसकी जानकारी पीएम मोदी को मिली तो गहन जांच करवाई गई। फिर निर्णय लिया गया कि इसे देश के सामने रखना चाहिए। इसके लिए नए संसद भवन के लोकार्पण के दिन को चुना गया।”

अमित शाह ने कहा, “सेंगोल की स्थापना के लिए संसद भवन से उपयुक्त और पवित्र स्थान कोई नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तमिलनाडु से आए हुए अधीनम से सेंगोल को स्वीकार करेंगे और लोकसभा अध्यक्ष के आसन के पास इसे स्थापित करेंगे।”

अमित शाह ने बताया: देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने सेंगोल को स्वीकार किया था। इलाहाबाद के संग्रहालय में इसे नेहरू जी की सुनहरी छड़ी के रूप में रखा गया था। इसका हमारे इतिहास में बड़ा योगदान है। इसे नई संसद भवन में स्पीकर की कुर्सी के बगल में रखा जाएगा।

अमित शाह ने कहा, “सेंगोल को संग्रहालय में रखना ठीक नहीं है। अंग्रेजों से सत्ता ट्रांसफर का प्रतीक है। यह अमृतकाल का प्रतिबिंब होगा। “

सेंगोल का अर्थ कर्तव्यपरायणता होता है। यह एक राजदंड है।

शिवभक्त महाशक्ति चोल राजा अपने 500 वर्ष के लंबे शासनकाल में सत्ता हस्तांतरित करते थे।

यह पवित्र राजदंड वैदिक पुजारियों द्वारा पहले गंगाजल से पवित्र किया जाता है। फिर क्रमशः शासक को सौंपते हैं।

उत्तरापथ में राजमुकुट से सत्ता हस्तांतरित होती है।

1947 में राजगोपालाचारी के अनुरोध पर कि भारतीय संस्कृति में सत्ता हस्तांतरण एक प्रक्रिया से होती है, नेहरू जी तैयार हो गये। चेन्नई के सोनारों ने एक पवित्र सेंगोल बनाया। जिसे पहले लाकर माउंटबेटन को दिया गया। फिर पुजारियों ने मंत्रोच्चार से इसे गंगाजल से पवित्र किया और नेहरू को सौंप दिया। यह कार्य तमिलनाडु के शैव मठ थिवरुदुथुराई के महायाजकों ने संपन्न कराया गया था।

तमिलनाडु की कलाकार पद्मा सुब्रमण्यम ने जब प्रधानमंत्री को यह अवगत कराया तो उस सेंगोल की बहुत खोज हुई।

प्रयागराज के संग्रहालय में यह सेंगोल मिला। जो लिखा गया था वह कहने योग्य नहीं है। इसे संग्रहालय में नेहरू की छड़ी कहके रखा गया था।

सेंगोल पर गोल पृथ्वी बनी है। उस पर भगवान शिव के वाहन नंदी हैं। यह सनातन धर्म के राज्यधर्म का एक प्रतीक अब नई संसद में लोकसभा अध्यक्ष की पीठ के पास होगा।

प्रधानमंत्री ने अपनी सांस्कृतिक परंपरा में यह अमूल्य योगदान किया है।

सेंगोल क्या है..?

और इसका इतिहास कितना पुराना है ?

जिसे नए संसद भवन में रखा जाएगा..

सेंगोल का ‘इतिहास’ काफ़ी पुराना है, यह चोल साम्राज्य से जुड़ा हुआ है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जिसे यह प्राप्त होता है, उससे “राज्य की प्रजा” निष्पक्ष और न्यायपूर्ण शासन की आशा करती है। “सेंगोल राजदंड” औपचारिक अवसरों पर चोल सम्राटों द्वारा ग्रहण किया जाता था, और इसका प्रयोग उनके “अधिकार” को दर्शाने के लिए किया जाता था !

सेंगोल शब्द की “उत्पत्ति” संस्कृत से “संकु” शब्द से हुई है, जिसका अर्थ “शंख” होता है !

सनातन धर्म में शंख को बहुत ही पवित्र माना जाता है।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी 28 मई को नए संसद भवन को देश को समर्पित करेंगे, हालांकि 19 विपक्षी दलों ने इसका विरोध किया है, और महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जी से नए संसद भवन का उद्घाटन कराने की मांग किया है।

श्री नरेंद्र मोदी जी 28 तारीख रविवार वीर सावरकर जी की जन्म जयंती पर नए संसद भवन का उद्घाटन करेंगे। इसके साथ ही इस अवसर पर एक ऐतिहासिक परंपरा “पुनर्जीवित” होगी। नए संसद भवन में, सेंगोल को प्रधानमंत्री द्वारा स्थापित किया जाएगा, जिसका इतिहास भी भारत के पहले प्रधानमंत्री नेहरू जी से जुड़ा है।

भारतवर्ष की आजादी के समय जब नेहरू जी से सत्ता हस्तांतरण को लेकर प्रश्न किया गया कि, इसके लिए क्या ‘आयोजन’ होना चाहिए !? इसके बाद नेहरू जी ने अपने सहयोगियों से बात की, और सी राज गोपालाचारी जी से पूँछा गया.. इसके बाद सेंगोल को “चिन्हित” किया गया। फिर सेंगोल को “तमिलनाडु” से मंगवाया गया, इसके बाद नेहरू जी सत्ता हस्तांतरण के प्रमाण स्वरूप, अंग्रेजों से “सेंगोल-राजदंड” को ग्रहण किया।

14 अगस्त 1947 को यह अनोखी घटना हुई थी !! इसके 75 साल बाद “अंग्रेजों” के बनाए गए संसद भवन से आजादी के मौके पर उस परंपरा को पुनर्जीवित किया जाएगा !!

भारत के अधिकतर लोगों को इसके इतिहास के बारे में जानकारी नहीं थी। “सेंगोल-राजदंड” ने हमारे इतिहास में एक अहम किरदार निभाई थी, ये सेंगोल अंग्रेजों से सत्ता के हस्तांतरण का प्रतीक बना था। आज “76 सालों” के बाद अंग्रेजों के बनाए गए संसद भवन से “आजादी” का प्रतीक बनेगा !!

जब सेंगोल की जानकारी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी को मिली तो, गहन जांच करवाई गई, और फिर यह निर्णय लिया गया कि उसे राष्ट्र के सामने रखना चाहिए !! इसके लिए नए संसद भवन के लोकार्पण के दिन को चुना गया।

76 वर्षों से सेंगोल को इलाहाबाद के संग्रहालय में रखा गया था, इसका “इतिहास” काफी पुराना है। इसे संग्रहालय में रखना ठीक नहीं है, यह अंग्रेजों से सत्ता हस्तांतरण का प्रतीक है, और अब यह “आजादी के अमृतकाल” का प्रतिबिंब होगा। नए संसद भवन के उद्घाटन के दिन ‘तमिलनाडु’ से आए विद्वान, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सेंगोल देंगे। इसके बाद इसे संसद में “लोकसभा अध्यक्ष” के आसन के पास, स्थापित किया जाएगा.

‘सेंगोल-राजदंड’ की स्थापना के लिए संसद से पवित्र जगह और कोई नहीं हो सकती, यह “राजदंड” चांदी से बनाया गया है, इसमें सोने की परत चढ़ाई गई है…!!

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