
“कुदाल से कलम तक”65
जब संगम ने बुलाया : 20
ज्योतिष, होम्योपैथी और पत्रकारिता ..?”
रामधनी द्विवेदी
….लेकिन लगता है कि प्रकृति को इसका पहले से आभास था और उसने कुछ वैकल्पिक व्यवस्था कर दी थी। इलाहाबाद के प्रवास के दौरान मैने पत्रकारिता के साथ ही अपना अलग विषयों का अध्ययन जारी रखा था। यह अध्ययन ज्येातिष और होम्योपैथी का था। पहले मैंने ज्योतिष पढ़ा। इसमें शीलवंत मिश्र जी और कुछ अन्य लोगों की मदद भी मिली। शीलवंत जी उस समय विश्वविद्यालय के रसायन शास्त्र में शोध कर रहे थे। उनकी ज्योतिष में अच्छी पकड़ थी। इन दिनों आगरा के आगरा कॉलेज में विभागाध्यक्ष हैं और रिटायरमेंट होने के नजदीक हैं।
उनके ही पास सुभाष राय भी रहते थे। वह भी ज्योतिष और तंत्र में रुचि रखते थे। हम लोगों की हफ्ते में एक दिन शीलवंत जी के घर बैठक हो ही जाती।स्वाध्याय ही ज्योतिष को जानने का जरिया था। कोई समस्या आती तो शीलवंत जी उसमें मदद करते। शीलवंत जी के साथ का एक अनुभव यहां शेयर करना चाहूंगा।
एक बार शीलवंत जी, मैं और सुभाष राय कटरा में किताबों की एक दूकान पर गए। शीलवंत जी ने ज्योतिष की एक किताब — शायद पाराशर होरा के बारे में पूछा कि वह है। मैं उस दूकान का नाम भूल रहा हूं, लेकिन वह बड़ी दूकान थी, कटरा की। दूकान के मालिक कोई अग्रवाल थे जो 40-45 साल के थे। लगता है उनकी भी ज्योतिष में रूचि थी।
उन्होंने कहा कि हां किताब है। आप लोग ज्योतिषी हैं क्या?
शीलवंत जी ने कहा कि हां ज्योतिष के छात्र हैं।
अग्रवाल जी ने कहा यदि आप मेरी राशि बता दें तो मैं आप को किताब गिफ्ट कर दूंगा।
हम लोग असमंजस में पड़ गए। शीलवंत जी ने थोडी देर सोचा फिर बोले कि आप कन्या राशि के हैं और लग्न में शनि का प्रभाव है। वह या तो उसमें बैठा है या फिर उसे पूर्ण दृष्टि से देख रहा है।
उनके इतना कहते ही अग्रवाल ने पूछा कि आपकी बात सही है। मैं कन्या राशि और लग्न का हूं और शनि की दृष्टि पड़ रही है। लेकिन आपने यह कैसे जाना?
शीलवंत हंसे और बोले, यह बताने की बात नहीं है। उसने किताब निकाल कर दी और चाय के लिए भी पूछा लेकिन हम लोग नहीं रुके, कहीं और का कार्यक्रम था।
दूकान से बाहर निकलने पर सुभाष राय ने उनसे पूछा कि आपने कैसे उसकी राशि और लग्न जानी।
शीलवंत हंसे, (उनकी हंसी बहुत भोली होती थी, आज भी जब फोन पर बात करते हैं तो उसी तरह हंसते और बोलते हैं) बोले कि कई बातें हैं। आज बुधवार है और इस समय चंद्रमा कन्या राशि में ही हैं। दूकानदार का चेहरा गोल, सौम्य,आंखें मुस्कराती हुईं और रंग सांवला था। उसका चेहरा कन्या लग्न के जातक के चेहरे से मिलता जुलता था और रंग शनि का प्रभाव बता रहा था। चंद्रमा कन्या में था ही और दिन भी कन्या का था। और अधिक क्या चाहिए, बताने के लिए। ज्योतिषी को गोचर और चंद्रमा की स्थिति को हमेशा ध्यान रखना चाहिए कोई फलादेश करते समय। कुंडली से अधिक कभी कभी प्रश्न कुंडली सटीक होती है और उससे कई प्रश्नों का उत्तर ढूंढ़ा जा सकता है।
मुझे अपना एक केस याद आता है। मेरे एक मित्र इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में लेक्चरर थे। उनका बड़ा बेटा एक बार घर से भाग गया था। सब लोग परेशान थे। मैंने सुना तो मैं भी औपचारिकता में गया। वहां यूनिवर्सिटी के कई लोग बैठे हुए थे। मुझे देखते ही उन्होने प्रश्न किया कि आप भी देखिए ग्रह नक्षत्र क्या संकेत देते हैं और पंचांग आगे बढ़ा दिया। इसके पहले कई ज्योतिषी अपनी तरह से कुछ न कुछ बता चुके थे।
मैं बड़े धर्मसंकट में पड़ा। तब तक ज्योतिष में थोड़ा बहुत जानकारी हो गई थी। मैंने प्रश्न कुंडली बनाई। लग्न मजबूत दिखी और आधा घंटा बाद शाम सवा चार बजे चंद्रमा राशि बदल रहा था। मुझे लगा कि चंद्रमा का राशि परिवर्तन कुछ बदलाव लाएगा। मैंने कह दिया कि सवा चार बजे के बाद कुछ अच्छी सूचना मिलनी चाहिए।
मैं यह कह कर घर चला आया और उनका लड़का ठीक सवा चार बजे अपने आप घर लौट आया। फिर तो चारो ओर हल्ला हो गया कि मेरी भविष्यवाणी सही हो गई। लेकिन मैं तो इसे तुक्का ही समझ रहा था जो सही निशाने पर लग गया।
इसी बीच फिर गिरिजा शंकर शास्त्री जी से परिचय हुआ। उस समय वह रामदेशिक संस्कृत पाठशाला में रहते थे और पीएचडी कर रहे थे। वह अच्छे ज्योतिषी हैं और इलाहाबाद के ईश्वर शरण डिग्री कालेज में संस्कृत के विभागाध्यक्ष का पद संभालने के बाद इस समय काशी हिंदू विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभाग में प्रोफेसर हैं और कुछ दिन पहले विभागाध्यक्ष का दायित्व संभाला है। मैं अपने लिए ज्योतिषीय सलाह उन्हीं से लेता हूं जो बहुत सही होती है।
पिछले दिनों प्रमोद शुक्ल से भी काफी दिनों बाद संपर्क हुआ और उनसे भी कुछ ज्योतिषीय सलाह ली। उनकी गणना और सलाह भी बहुत सटीक होती है। नरेंद्र मोदी को लेकर उनकी भविष्यवाणी बहुत सटीक हुई है। अभी जुलाई 2021 के मंत्रिमंडल विस्तार का भी संकेत उन्होंने दे दिया था। कुंडली बनाने और हस्तरेखा के अध्ययन के साथ इसकी अन्य विधाएं भी सीखीं। लोग राय लेने के लिए घर भी आने लगे जिससे घर में संकुलता बढ़ने लगी। लेकिन इससे इसमें रुचि भी बढ़ने लगी।
ज्योतिष के साथ ही मैने होम्योपैथी का अध्ययन शुरू किया था। इसमें भी स्वाध्याय ही साधन था। लेकिन ज्योतिष की तुलना में इस क्षेत्र में बहुत लोग थे जिनसे सत्संग होता था। डा एस एम सिंह से अपने इलाज के सिलसिले में मुलाकात हुई थी। बाद में यह गहरी मित्रता में बदली।यह आज भी उसी तरह है। इसके अलावा कई डाक्टर थे जिनसे परिचय था और हम लोग आपस में चर्चा करते थे। डा आरजे एक्विला,डा टी सहाय और उनकी मित्र मंडली भी थी जिनके साथ हम लोग केंट स्टडी सर्किल के रूप में गोष्ठी करते। यह ग्रुप नॉन क्वालीफाइड डाक्टर्स का था। लेकिन जहां तक जानकारी और अध्ययन की बात है, इनमें किसी के पास भी डिग्री या डिप्लोमाधारी डाक्टर से कम जानकारी नहीं थी। इन सबके साथ सत्संग से मेरी भी होम्योपैथी में भी ठीक ठाक जानकारी हो गई थी।
होम्योपैथी की लगभग सभी क्लासिकल बुक पढ़ी। केंट की मैटैरिया मेडिका,लेसर राइटिंग, हैनीमैन की लेसर राइटिंग, एमएल टाइलर की ड्रग पिक्चर गजब की किताबें हैं। नैश, बोरिक की जगह तो कोई ले ही नहीं सकता।डा एसके दुबे की मैटैरिया मेडिका अपनी तरह की अलग है। जार्ज विथूलकस की एसेंस का एसेंस ही अलग है।क्लार्क की डिक्शनरी के तो कहने ही क्या। मेरे एक मित्र डा लखन लाल थे। वह केपी कालेज में पढाते और होम्योपैथी की प्रैक्टिस भी करते। उन्होंने डीएचएमएस किया था, कालेज में अध्यापन करते समय। उनकी एक क्लीनिक अल्लापुर में थी, दूसरी उन्होंने सोहबतिया बाग पंजाबी कॉलोनी में खोली थी जो अलोपी देवी मंदिर के पास थी। लेकिन वह उसमें ठीक से समय नहीं दे पाते।
स्कूल की नौकरी के साथ दो क्लीनिक चलाना किसी के बस का नहीं था। एक दिन उन्होंने मुझसे कहा कि यदि आप चाहें तो सोहबतियाबाग वाली क्लीनिक में बैठ सकते हैं, नहीं तो मैं उसे बंद कर दूंगा। मैं तब तक घर पर ही लोगों को दवा आदि देना शुरू कर दिया था। लेकिन वह तब तक आय का जरिया नहीं थी। मैंने सोचा, प्रेस बंद है ही, क्यों न हाथ आजमाया जाए। मुझे होम्योपैथी और ज्योतिष में से किसी एक को चुनना था और मैने होम्योपैथी को चुना। क्यों कि इसे मैने अधिक वैज्ञानिक माना और चूंकि यह लोगों के कष्ट दूर करने में मदद करती है, इसलिए इसमें मुझे अधिक संतोष होता लगा।
और मैने डा लाल की क्लीनिक में बैठना शुरू कर दिया। सुबह सिर्फ दो घंटे बैठता क्यों कि शाम का समय मैं अमृत प्रभात के लिए सुरक्षित रखना चाहता था।पहले दिन सिर्फ एक मरीज आया। उसे पेचिस की शिकायत थी। मैंने उसे मर्क साल 30 की चार पुडि़या बना कर दी और दूसरे दिन बुलाया। वह दूसरे दिन आया ही नहीं। मैंने जब अपने मित्र डाक्टरों से चर्चा की कि मेरा पहला मरीज ही खिसक गया तो बोले, वह खिसक नहीं गया, ठीक हो गया। वह ठीक हो गया होगा तो क्यों आएगा? दवा काम कर गई तो चार खुराकें बहुत हैं।
क्रमशः

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