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“अमृत प्रभात –एनआइपी” को जिंदा रखने की कोशिशें …! “: कुदाल से कलम तक” : 71 : रामधनी द्विवेदी

“कुदाल से कलम तक”71
जब संगम ने बुलाया : 26

“अमृत प्रभात –एनआइपी” को जिंदा रखने की कोशिशें..!”  

वरिष्ठ पत्रकार रामधनी द्विवेदी

अमृत प्रभात –एनआइपी को जिंदा रखने के लिए तरह- तरह की कोशिश की गई। इलाहाबाद विवि के कुछ शिक्षकों को जोड़ा गया। कुछ लोगों की सलाह थी कि वे लोग ऐसी राय देंगे जो अखबार को जिला सकेगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। अंग्रेजी के विभागाध्‍यक्ष प्रो मानस मुकुल दास को सलाहकार संपादक बनाया गया। वह विद्वान और अकादमिक व्‍यक्ति थे। संपादकीय लेख और इसी तरह की गंभीर चीजें देखते। खबरों पर भी राय देते। डा अरुण कुमार श्रीवास्‍तव और प्रो एमसी चट्टोपाध्‍याय भी जुड़ गए, सलाहकार के रूप में। कभी कभी इनके साथ यूनिवर्सिटी के कुछ और लोग भी परिसर में दिखने लगे। ये लोग लगभग रोज शाम को आते और घंटा दो घंटा बैठते। क्‍या करते यह हम लोग आज तक समझ नहीं पाए। लेकिन आते रोज। हम लोगों को निरीह भाव से देखते और मन ही मन मुस्‍कराते हुए चले जाते। लेकिन इनकी उपयोगिता एक दिन काम आई।

हुआ यह कि स्नेह मधुर ने एक खबर लिखी, जो प्रमुखता से छपी। विश्‍वविद्यालय की महिला छात्रावास की लड़कियां खबर से नाराज हो गईं और एक दिन शाम को बस में भर कर आ गईं और गेट पर हल्‍ला मचाने लगीं और नारेबाजी करने लगीं। वह खबर का विरोध कर रहीं थी और स्‍नेह मधुर को सामने लाने की मांग कर रहीं थीं। उनका एक नारा यह भी था- वी वांट स्‍नेह मधुर।

उस समय माथुर साहब भी थे। उन्‍होंने समझाने की कोशिश की लेकिन वे नहीं मानीं। मधुर उस समय आफिस में ही थे। माहौल बिगड़ता देख पुलिस बुलाई गई। पुलिस ने भी उन्‍हें समझाने की कोशिश की लेकिन वह किसी की बात नहीं मान रहीं थीं। घंटों धरना दिया। गेट बंद कर दिया गया तो वे उसपर चढ़कर कैंपस में घुसने लगीं। कुछ कूद कर अंदर आ भी गईं।उस समय कुछ छात्र नेता भी उनके साथ थे। कुछ तोड़- फोड़ भी कीं, खासतौर से गमले आदि तोड़ दिए। अंत में प्रो मानस मुकुल दास को सामने आना पड़ा। उनकी बात भी वे नहीं मान रहीं थीं।

छंटनी की सलाह यूनिवर्सिटी के इन्‍हीं लोगों की थी। एक सलाह यह दी गई कि हिंदी और अंग्रेजी के प्रूफ रीडर हटा दिए जांए। अंग्रेजी में चार और हिंदी में सात प्रूफ रीडर थे। अंग्रेजी के प्रूफ रीडरों को हटा दिया गया लेकिन हिंदी के लिए मुझे बुलाकर इन लोगों ने कहा कि आप प्रूफ रीडरों को अगले महीने से आने के लिए मना कर दें। उस समय इस तरह के प्रशासनिक फैसले बिना समाचार संपादक की सहमति और हस्‍ताक्षर के नहीं हेाते थे। मुझसे छटनी लिस्‍ट पर दस्‍तखत करने के लिए कहा गया तो मैने यह कहते हुए कि प्रूफ रीडर नहीं रहे तो अखबार में बहुत गलतियां होंगी, दस्‍तखत करने से मना कर दिया।

उस समय तो वे लोग कुछ नहीं बोले लेकिन 31 दिसंबर को मुझे बुलाकर कहा गया कि अगले महीने से आप ही इन लोगों का वेतन देंगे। यह एक प्रकार से चेतावनी थी कि प्रूफ रीडरों को हटा दिया जाए। मुझसे यह नहीं हो रहा था कि कैसे यह बात मैं उन लोगों से कहूं।

एक दिन बाद नया साल शुरू होने वाला था और मुझसे लोगों की नौकरी लेने के लिए कहा जा रहा था। खैर बहुत सोचने के बाद मैंने रात 11 बजे के आसपास सबको बुलाया और संकेत से बताया कि प्रबंधन को आप लोगों की जरूरत नहीं है। यह बात पहले से फैल गई थी कि हिंदी के भी प्रूफ रीडर हटाए जाने वाले हैं। उन लोगों ने कहा कि हमें ऐसा संकेत मिल गया था। आप परेशान न हों, कल से हम लोग नहीं आएंगे। बहुत भारी मन से मैं उस दिन घर लौटा।

क्रमशः

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