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” कलकत्‍ता से भी अमृत प्रभात निकलने की योजना बनी थी …! “: कुदाल से कलम तक” : 72 : रामधनी द्विवेदी

“कुदाल से कलम तक”72
जब संगम ने बुलाया : 27

“कलकत्‍ता से भी अमृत प्रभात निकलने की योजना बनी थी …!”  

वरिष्ठ पत्रकार रामधनी द्विवेदी

बीच- बीच की बंदी के बाद अमृत प्रभात जब भी निकलता, उसकी पकड़ पाठकों पर ऐसी थी कि वह अपना सामान्‍य प्रसार पा जाता। अखबार रोज कलकत्‍ता भी जाता। वहां भी अमृत बाजार पत्रिका और युगांतर दोबारा शुरू हुए थे। कहा जाता है कि अमृत बाजार पत्रिका के संपादक के रूप में हांगकांग टाइम्‍स के संपादक को लाया गया था जो शायद बंगाली ही थे। उस समय उन्‍हें संभवत: भारत में सबसे अधिक वेतन पाने वाला संपादक कहा जाता था। वह हांगकांग टाइम्‍स की तर्ज पर अमृत बाजार पत्रिका निकाल रहे थे। यह मेकअप लेआउट और प्रजेंटेंशन में एकदम बदल गया था। वह पहले की तुलना में बोल्ड हो गया था। बंगाल के जिन लोगों ने पहले के अखबार पढ़े थे, उनके टेस्‍ट पर नया अमृत बाजार पत्रिका चढ़ नहीं रहा था। हालांकि उसी की तर्ज पर बाद में एशियन एज निकला और चल गया।

खैर, अमृत प्रभात वहां जाता और लोग देखते कि यदि ऐसा अखबार कलकत्‍ता से निकले तो बाजार पकड़ लेगा। अमृत प्रभात भी तब मॉडुलर मेकअप करने की कोशिश करने लगा था। जब कलकत्‍ता से मॉडुलर मेकअप का निर्देश मिला तो मैंने उसे अपनाने की कोशिश की लेकिन पूरी तरह मॉडुलर नहीं हो पाया था। मैंने पायनियर में इस तरह का मेकअप देखा था जिसके बारे में मेरे गुरु प्रदीप जी ने बताया था कि जॉन वाकर नाम के संपादक ने यह मेकअप शुरू किया है इसलिए इसे वॉकरियन मेकअप कहा जाता था। इसमें खबरें बैलेंस कर के आयताकार लगती और दो खबरों के बीच की जगह‍ को सिंगल कॉलम खबरों से भरा जाता जिनकी हेडिंग भी 30 से 40 प्‍वाइंट के बीच की होती थी और आपस में सटी रहती थीं। जिन लोगों ने पुराना पायनियर देखा है,वे इसे समझ सकते हैं। आजकल तो सभी अखबार मॉड़लर मेकअप ही करने लगे हैं क्‍योंकि यह पाठकों के लिए सुविधा जनक होता है। उन दिनों हिंदी और अंग्रेजी के अखबारों में खबरें एक दूसरे में फंसा कर लगाई जातीं जिससे पेज बहुत गिच-पिच हो जाता था। सिंगल कॉलम खबरों की हेडिंग 20 प्‍वाइंट के ऊपर नहीं होती थी। देखा जाता कि हेडिंग आपस में टकराये नहीं। कुछ अखबार बहुत अधिक क्रासर लगा देते जिससे पेज और उलझाऊ हो जाता। मैने अपने साथियों को बैलेंस्ड मॉडुलर मेकअप समझाने की कोशिश की। कुछ तो समझे लेकिन कुछ परंपरागत तरीके से ही पेज बनाते। मेकअपमैन को भी नया स्‍वरूप समझ में नहीं आता। उस समय तक ब्रोमाइड चिपकाकर पेज बनने लगे थे। अब तो अखबारी दुनिया में बहुत बदलाव आ गया है और चीजें आमूल-चूल बदल गई हैं।

खैर जब कलकत्‍ता के लोगों ने अमृत प्रभात देखा तो वहां से भी अमृत प्रभात निकालने का फैसला हुआ। एक दिन, रात आठ बजे के आसपास तुहिन कांति घोष अमृत प्रभात हाथ में लिए हुए संपादकीय हाल में आए और बीच में खड़े हो गए। वह संपादकीय में आते तो पहले भी थे लेकिन उस दिन उनका हाव-भाव अलग था। कहने लगे कि हिंदी के लोग बहुत अच्‍छा अखबार निकाल रहे हैं। इस अखबार की चर्चा कलकत्‍ता में भी होती है। वहां तय किया गया है कि कलकत्‍ता से भी यह निकलेगा। मैं रामधनी जी को इसकी जिम्‍मेदारी देता हूं। उन्‍हें कलकत्‍ता जाना होगा और ऐसा ही अखबार निकालना होगा। फिर मेरी तरफ मुखातिब होते हुए बोले- वहां भी अमृत प्रभात निकालेंगे न!

मैं अचानक इस प्रस्‍ताव पर थोड़ा असहज हुआ- होम सिकनेस के स्‍वभाव के कारण । मैं थोड़ा रुका तो बोले कि कोई तकलीफ तो नहीं होगी आपको। तब तक मैंने सोच लिया कि क्‍या कहना है। मैंने कहा अमृत प्रभात निकाल कर मैं चला आऊंगा, वहां रुकूंगा नहीं।

वह बोले- बस एक महीने। सब कुछ व्‍यवस्थित कर आप चले आइएगा।

मैने कहा ठीक है।

वहां लगभग पूरा संपादकीय विभाग था। कुछ को यह अच्‍छा लगा तो कुछ को बुरा कि मेरी इतने लोगों के बीच प्रशंसा हो रही है। इसके बाद वह चले गए, लेकिन दुरभिसंघि शुरू हो गई। लगभग रात 10 बजे ताता बाबू का फोन आया- क्‍या आपको कोई परेशानी है, आप क्‍यों नहीं जाना चाहते कलकत्‍ता। वहां आपको कोई दिक्‍कत नहीं आने दी जाएगी। आप अपने मन का स्‍टॉफ भी चुन लीजिएगा जिसे यहां से ले जाना चाहें और जो जाना चाहे जा सकते हैं।

मैंने कहा- नहीं मुझे कोई दिक्‍क्‍त नहीं है। मैंने जाने से मना कहां किया, हां रुकूंगा नहीं।

वह बोले कुछ लोग कह रहे थे कि आप प्रस्‍ताव सुनकर उदास हो गए थे।

मैंने कहा नहीं ऐसी कोई बात नहीं है।

बाद में पता चला कि मेरी ही एक मित्र ने ताता बाबू से कह दिया था कि वह (मैं) कलकत्‍ता नहीं जाएंगे, देखा नहीं आपकी बात सुनकर उनका चेहरा उतर गया था। मैं असहज तो हुआ था क्‍योंकि बच्‍चे पढ़ रहे थे और ऐसे समय में नए शहर में जाने से सब कुछ अव्‍यवस्थित हो जाता, लेकिन जब लौट आने की बात तय हुई तो मन संयत हो गया। बाद में जब मैं गांव गया तो पिता जी से पूछा कि कलकत्‍ता कैसा शहर है तो वह बोले कि मैं तो बहुत पहले गया था लेकिन वह अच्‍छा और पढ़े लिखे लोगों का शहर है। मैं और आश्‍वस्‍त हो गया। मैंने खादी का एक कुर्ता पायजामा भी सिलवाया, कलकत्‍ता को सोच कर लेकिन वह प्रोजेक्‍ट पूरा नहीं हुआ, अन्‍य बाधाएं आ गईं। हालांकि माथुर साहब ने वहां की तैयारी शुरू कर ली थी। कुछ इंटरव्‍यू भी हो गए थे। असम में पूर्वाचल प्रहरी से लक्ष्‍मी कांत पांडे को भी लाने की बात हो गई थी।वह गौहाटी से कलकत्‍ता जा कर माथुर साहब से मिल भी चुके थे।

क्रमशः

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