“कुदाल से कलम तक”: 77
जब संगम ने बुलाया : 32

“और ट्रिब्यून में नहीं बन पाई बात…!”
वरिष्ठ पत्रकार रामधनी द्विवेदी
जब अमृत प्रभात शुरू ही हुआ था तो शायद 1978 में चंडीगढ़ से हिंदी में ट्रिब्यून निकलने की चर्चा हुई। मुझे भी इसकी जानकारी हुई। उसका विज्ञापन किसी अखबार में छपा था। अमृत प्रभात खुले कुछ महीने ही हुए थे। सब कुछ ठीक चल रहा था लेकिन मन में कहीं यह बात तो थी कि लखनऊ के कम अनुभवी लोग यहां तो बराबर हो गए हैं। इसी से सोचा चलो कहीं और भी देख लिया जाए। काम बन जाए तो ठीक नहीं तो यहां तो हैं ही। आवेदन कर दिया और वहां से बुलावा आ गया। मई-जून की कोई तारीख थी इंटरव्यू की।
मैं उस समय 28-29 साल का था और यूपी के बाहर नहीं गया था। यूपी में भी कानपुर, बनारस,इलाहाबाद और लखनऊ तक ही सीमित था आना-जाना। इसके आगे कभी जरूरत ही नहीं पड़ी आने-जाने की। इंटरव्यू की सूचना किसी से छिपाई नहीं और दफ्तर में भी बता दिया। कई लोगों से बात की किसी को चंडीगढ़ का रूट नहीं पता था। कुछ लोगों ने बताया कि दिल्ली चले जांए, वहां से बस से चंडीगढ़। यह उल्टा रास्ता लगा। रेलवे में पूछा तो पूछताछ में बैठे क्लर्क ने रास्ता बताया। उस समय इलाहाबाद से कोई ट्रेन सीधे चंडीगढ़ नहीं जाती थी।
मैं समय भी बर्बाद नहीं करना चाहता था। रेलवे क्लर्क के बताए अनुसार प्रतापगढ़ तक पैसेंजर से गया और वहां से ट्रेन पकड़ कर लखनऊ तक पहुंचा और वहां शाम को पांच बजे के आसपास डुप्लीकेट पंजाब मेल मिली जिससे अंबाला तक गया। चंडीगढ़ तक का साधारण दर्जे का टिकट इलाहाबाद में ही ले लिया था। लखनऊ में जगह भी मिल गई थी बोगी में। भीड़ अधिक नहीं थी और मैं ऊपर की बर्थ पर जाकर सो गया। इससे अंबाला पहुंचा सुबह छह सात बजे के आसपास।
अंबाला से बस से चंडीगढ़ जाना था। वहां स्टेशन के बाहर ही एक बस वाला चंडीगढ- चंडीगढ़ चिल्ला रहा था। वह भर गई थी लेकिन मैं उसमें घुस गया। मैने कंडक्टर को चंडीगढ़ के लिए टिकट के लिए पैसे दिए। उसने टिकट काटे और मुझसे दस्सी दे, दस्सी कहने लगा। मैं समझ नहीं पाया और पूछा क्या है। उसने कहा दस्सी दे। मैं फिर भी नहीं समझा तो मेरी परेशानी एक दूसरे यात्री ने समझी जो शायद यूपी का था । उसने कहा कि दस पैसे दीजिए। उस समय क्या किराया था, अब यह तो याद नहीं लेकिन दस पैसे उसे और चाहिए थे, टिकट के लिए। मैने उसे पैसे तो दिए लेकिन उसकी भाषा तमाचा मारने जैसी लग रही थी।
अंबाला से चंडीगढ़ की दूरी अधिक नहीं है लगभग 40 किमी के आसपास। पौन घंटे खड़े खड़े यात्रा की । बस भी बीच में कहीं नहीं रुकी। मैं नौ बजे के आसपास चंडीगढ़ बस अड्डे पहुंच गया था। मैं यह नहीं जानता था कि ट्रिब्यून का दफ्तर कहां है। जो आवेदन भेजा था, उस पर जरूर लिखा होगा लेकिन तब याद नहीं आया।
मैंने एक रिक्शे वाले को ट्रिब्यून चलने के लिए कहां तो उसने दो रुपये मांगे। उस समय यह किराया इलाहाबाद में चार पांच किलोमीटर के लिए लगता था। उसने थोड़ी ही देर में ट्रिब्यून दफ्तर के सामने उतार दिया। मैं गेट पर गया और वहां तैनात सुरक्षाकर्मियों से कहा कि आज यहां इंटरव्यू है मैं उसी के लिए आया हूं।
उनके इंचार्ज ने कहा कि वह 11 बजे से होगा, आप दो घंटे पहले आ गए हैं। मेरे साथ एक बैग और एक प्लास्टिक की बोतल थी जिसमें पानी भरा था रास्ते के लिए। तब देश में बोतल बंद पानी मिलना नहीं शुरू हुआ था। यात्रा करने के लिए अपने लिए पानी की व्यवस्था खुद करनी होती थी और रेलवे और बस स्टेशन पर पहले सुराही मिलती थी बाद में प्लास्टिक के बोतल भी मिलने लगे थे। उसी बोतल में स्टेशन के नल का पानी भर लिया जाता था। मैने लखनऊ में यह बोतल खरीदी थी और वहीं पानी भर लिया था जो बीच में पिया जो अब गर्म हो गया था। खैर मैने उससे कहा कि कहीं कोई जगह बताइए जहां मैं फ्रेश हो लूं और नहा धोकर कपड़े बदल लूं।
प्रेस के प्रवेश के पास ही उनका गेस्ट हाउस जैसा था। सुरक्षाकर्मी ने उसका ताला खोल कर मुझसे कहा वहां चले जाइए। मैं वहां निबटा-नहाया। टंकी का गर्म पानी नहाने के लिए मिला जिससे ताजगी तो नहीं आई, हां धूल पसीना साफ हो गया।
मैं 11 बजे के पहले ही रिसेप्शन पर पहुंच गया। रिसेप्शन बड़े हाल की तरह था। वहां मौजूद लड़की ने बताया कि ऊपर इंटरव्यू होगा। लिफ्ट लगी थी लेकिन तब तक मुझे लिफ्ट का अनुभव नहीं था। मैं सीढियों से ऊपर गया। वहां एक बड़े हाल में और लोग भी बैठे थे। वे सभी पंजाब के अन्य जिलों से आए थे। मैं भी वहीं एक सोफे पर बैठा।
ट्रिब्यून जैसा दफ्तर तब तक मैने किसी अखबार का नहीं देखा था। उसकी भव्यता सबसे अलग थी। जिस हाल में हम लोग बैठे थे, वही भव्य था। एसी से ठंडा हॉल, बड़े-बड़े पर्दे, गुदगुदे सोफे, बीच बीच में पानी और चाय बिस्कुट पूछते चपरासी। वहीं थोड़ी देर में दिलीप शुक्ल और विनोद श्रीवास्तव भी आ गए। दिलीप आज कानपुर में थे और विनोद मेरे ही साथ इलाहाबाद में लेकिन मुझे यह नहीं पता चला कि उन्होंने भी आवेदन किया है। बाद में पता चला कि कई लोगों ने आवेदन किया था लेकिन बुलाया सिर्फ मुझे और विनोद श्रीवास्तव को ही गया था। कुछ लोगों के इंटरव्यू के बाद मेरा नंबर आया।
इंटरव्यू बोर्ड में ट्रिब्यून हिंदी के संपादक पद्मकांत त्रिपाठी, समूह संपादक प्रेम भाटिया और दो लोग ट्रिब्यून ट्रस्ट के थे। पद्म कांत त्रिपाठी पहले जागरण दिल्ली में ब्यूरो चीफ थे। वहां से ही ट्रिब्यून में गए थे। मैने चीफ सब एडीटर के लिए आवेदन किया था। बातचीत ठीक हुई। कोई तनाव नहीं था। एक अच्छी जगह काम तो कर ही रहा था।
प्रेम भाटिया ने काम के बारे में पूछा। क्या करते हैं, क्यों आज छोड़ दिया आदि। पद्मकांत जी ने कहा कि आप आज से आए हैं, वहां तो बड़ी पंडिताऊ और कठिन हिंदी लिखी जाती है। मैने कहा ऐसी बात नहीं है। बस शुद्ध हिंदी लिखने पर जरूर जोर रहता है। प्रेम भाटिया ने कहा कि इलाहाबाद में इस समय तरबूज खूब मिलते हैं और बड़े मीठे होते हैं। पांच पांच किलो के होते हैं। मैंने कहा जी, सही है लेकिन यहां की लीची की मिठास भी कम नहीं है। खैर बात पैसों पर आ कर अटक गई। मुझसे पूछा गया कि आप कितना उम्मीद करते हैं। मैं अमृत प्रभात में सात सौ के अधिक वेतन पाता था। मैंने 15 सौ मांगे। लोगों ने एक दूसरे को देखा, आपस में राय की और कहा कि हम चीफ सब को साढ़े 12 सौ देते हैं, इससे अधिक नहीं हो पाएगा। मैने कहा कि ठीक है। आप इतना दे दें और अपनी कालोनी में आवास दे दें। मैं तब तक जान चुका था कि चंडीगढ़ में ट्रिब्यून की अपनी कालोनी है। इस पर प्रेम भाटिया जी ने कहा कि कॉलोनी में 240 फ्लैट ( मुझे यही संख्या याद आ रही है।) और लंबी वेटिंग लिस्ट है। वहां आवास तो नहीं मिल पाएगा। मैंने कहा कि मैं इलाहाबाद में 150 रुपये मकान का किराया देता हूं, उससे तो यहां महंगा ही कमरा मिलेगा। आप हाउस रेंट ही दे दीजिए। लेकिन बात नहीं बनी। दोनो ट्रस्टी तैयार नहीं हुए।
बाद में मुझसे कहा गया कि ठीक है, आपको फोन या पत्र से बता दिया जाएगा। मैं इसका अर्थ सकारात्मक समझा लेकिन वैसा नहीं था। जब इंटरव्यू में बाद में बताने के लिए कहा जाए तो समझ लेना चाहिए कि बात नहीं बनी। बाद में मैने पद्मकांत जी को पत्र लिखा तो उनका जवाब था कि आपको संकेत तो कर दिया गया था। वह संकेत बाद में मेरी समझ में आया। बाद में पता चला कि उन लोगों ने चीफ सब एडीटर को साढ़े 12 सौ ही दिए। जब मैं बरेली जागरण में आया तो वहां राकेश कोहरवाल जी से परिचय हुआ जिन्होंने इतने पर ही वहां ज्वाइन किया था। बाद में पता चला कि अधिकतर नियुक्तियां पंजाब केसरी के लोगों की हुई। पंजाब केसरी में वेतन बहुत कम ही था। पंजाब के हिंदी पत्रकारों के पास कोई अच्छा विकल्प न होने से प्रबंधन उनका शोषण करता था। ट्रिब्यून खुला तो सबको मन मांगी मुराद मिल गई। जो लोग पंजाब केसरी में तीन साढ़े तीन सौ रुपये पाते थे, वे सब पांच सौ साढ़े पांच सौ पर चले आए ट्रिब्यून में।

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