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“कुदाल से कलम तक”: रामधनी द्विवेदी :4: “मेरा निर्माण”  

रामधनी द्विवेदी

आज जीवन के 71 वें वर्ष में जब कभी रुक कर थोड़ा पीछे की तरफ झांकता हूं तो सब कुछ सपना सा लगता है। सपना जो सोच कर नहीं देखा जाता। जिसमें आदमी कहां से शुरू हो कर कहां पहुंच जाता है? पता नहीं क्‍या-क्‍या घटित होता है? कभी उसमें कुछ दृश्‍य और लोग पहचाने से लगते हैं, तो कभी हम अनजाने लोक में भी विचरने लगते हैं। जगने पर असली दुनिया में आने पर जो देखें होते हैं,उसके सपना होने का बोध हेाता है। यदि सपना सुखद है तो मन को अच्‍छा लगता है, यदि दुखद है तो नींद में और जगने पर भी मन बोझिल जाता है। सुखद सपने बहुत दिनों तक याद रहते हैं, हम अपने अनुसार उनका विश्‍लेषण करते हैं और दुखद सपने कोई याद नहीं रखता, क्‍योंकि वह पीड़ा ही देते हैं। यही हमारी जिंदगी है। जब हम कभी रुक कर पीछे देखते हैं तो सुखद और दुखद दोनों बातें याद आती हैं। इनमें से किसी अपने को अलग भी नहीं किया जा सकता क्‍योंकि बिना ‘ दोनों ‘ के जिंदगी मुकम्‍मल भी तो नहीं होती। जिंदगी की धारा के ये दो किनारे हैं। बिना दोनों के साथ रहे जिंदगी अविरल नहीं होगी और उसमें थिराव आ जाएगा। तो मैं अपनी जिंदगी के दोनों पक्षों का सम्‍मान करते हुए उन्‍हें याद कर रहा हूं। जो अच्‍छा है, उसे भी और जो नहीं अच्‍छा है उसे भी, सुखद भी दुखद भी। 

तो क्‍यों न अच्‍छे से शुरुआत हो। यह स्‍मृति में भी अधिक है और इसमें कहने को भी बहुत कुछ है। जो दुखद या अप्रिय है, वह भी कालक्रम में सामने आएगा। लेकिन मैं सबसे अनुनय करूंगा कि इसे मेरे जीवन के सहज घटनाक्रम की तरह ही देखें।

मैं बहुत ही सामान्‍य परिवार से हूं, मूलत: किसान रहा है मेरा परिवार। आज भी गांव में मेरे इस किसानी के अवशेष हैं, अवशेष इसलिए कि अब पूरी तरह किसानी नहीं होती। पहले पिता जी अवकाश ग्रहण के बाद और अब छोटा भाई गांव पर इसे देखता है। खुद खेती न कर अधिया पर कराई जाती है लेकिन कागजात में हम काश्‍तकार हैं। उस गांव से उठकर जीवन के प्रवाह में बहते-बहते कहां से कहां आ गया, कभी सोचता हूं तो जैसा पहले लिखा सब सपना ही लगता है। कभी सोचा भी न था कि गांव के खुले माहौल में पैदा और बढ़ा-बड़ा हुआ मैं दिल्‍ली-एनसीआर में बंद दीवारों के बीच कैद हो जाऊंगा। लेकिन वह भी अच्‍छा था, यह भी अच्‍छा है। जीवन के ये दो बिल्‍कुल विपरीत ध्रुव हैं जो मुझे परिपूर्ण बनाते हैं। कुदाल के बीच शुरू हुई जिंदगी ने हाथों में कलम पकड़ा दी और अब वह भी छूट गई और लैपटॉप ने उसका स्‍थान ले लिया। कुदाल से शुरू और कलम तक पहुंची इस यात्रा के पड़ावों पर आप भी मेरे साथ रहें, जो मैने देखा, जिया, भोगा उसके सहभागी बनें।

रामधनी द्विवेदी

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और दैनिक जागरण समाचार पत्र की कोर टीम के सदस्य हैं

“मेरा निर्माण”  

गतांक से आगे…

दादा जी पढ़े लिखे न थे। अंगूठा लगाते थे। लेकिन कढ़े बहुंत थे। खेती-गिरस्‍ती का कोई ऐसा काम नहीं था जो वह न जान‍ते हों। बहुत से लोग काम फंसने पर उनसे सलाह लेने आते। मैने कभी बिना काम उन्‍हें किसी के यहां जाकर गप्‍प लगाते नहीं देखा। वह कुछ न कुछ करते रहते। यदि कोई काम न होता तो तकुए पर सूत कातते और उससे जनेऊ बनाते। जनेऊ के लिए सूत कम लोग ही कातते थे लेकिन दादा जी दूसरे के सूत से जनेऊ नहीं बनाते थे। यह जनेऊ घर के लोगों के पहनने के काम आता या फिर रामपुर के बाबू साहब लोग कभी-कभी मांगने आ जाते। कुछ बाबू साहब तो बस दादाजी के हाथ का ही जनेऊ पहनते थे। कभी किसी से मिलने दादा जी रामपुर के ठकुराने जाते तो दो एक जनेऊ लेते जाते, वहां देने के लिए।

रामपुर के ठाकुर साहब के हम लोग पुरोहित थे लेकिन घर में कोई पढ़ा-लिखा न होने से जजमानी नहीं की जाती। ठाकुरों का परिवार भी पुरोहिताई के लिए हमारे अन्‍य पट्टीदारों में बंटा था। कुछ परिवार हमसे तो कुछ दूसरे परिवार से जुड़े थे। हमारे ही कुल के दूसरे परिवार में विशुद्धानंद भैया के परिवार में लोग पढ़े-लिखे थे और लेकिन पुरोहिताई कम करते थे। हालांकि महानंद भैया बाद में इसे करने लगे जो रिटायरमेंट के बाद उनकी जीविका भी बना। जब बाबू साहब लोगों के लिए कोई पंडिताई का काम होता तो वे घर आते और दादा जी से कहते। दादा गांव के किसी पंडित को कथा कहने, पूजा कराने या शादी तिलक कराने के लिए भेज देते। वह पंडित तो दक्षिणा पाते ही, हमारे परिवार का भी कोई साथ जाता तो उसे भी दक्षिणा और विदाई मिलती। बताते हैं कि मेरे पिता जी के एक बड़े भाई ने संस्‍कृत पाठशाला में कुछ पढ़ा था और ज्‍योतिष सीख रहे थे। गांव के कुछ लोगों के साथ बंबई कमाने गए। वहां किसी चटकल (बोरा बनाने वाली कंपननी) में काम किया। रहने खाने की व्‍यवस्‍था ठीक न होने से उन्‍हें टीबी हो गई। बीमार होकर गांव लौटे। साल भर तक बैदकी दवा हुई, लेकिन नहीं बचे।

दादा जी बताते थे कि उनके पिता जिनका नाम दलथंभन दूबे था, एक हाथ से लूले थे। पता नहीं जन्मजात कि बाद में पोलियो आदि के कारण ऐसा हुआ? वह खेती के काम में कमजोर पड़ते थे। एक हाथ से पूरा काम नहीं हो पाता था। दादा उनके अकेले बेटे थे और 16-17 साल के हो रहे थे। पहलवानी करते तो खूब खाते भी थे। पट्टीदारों ने कहा कि दलथंभन खुद कुछ करते नहीं और बेटा दो लोगों के बराबर खाता है। और यही कह कर उन्‍हें अलग कर दिया। जगह-जमीन और खेती का थोड़ा-बहुत सामान मिला और कुछ नहीं। दादा बताते थे कि बंटवारे में कई गाएं मिलीं थीं। इससे लगता है कि पहले पशुधन खूब होता था। दादा बताते कि बंटवारे में थोड़ा अनाज भी मिला था, हिस्‍से के अनुसार वह थोड़ दिन चला। वह दिन भर गाय चराते, उनकी मां रोटी बना देतीं और एक टाइम दाल से तो दूसरी टाइम दूध से सभी लोग उसे खा लेते। आठ दस गांए हमेशा लगती रहतीं लेकिन कोई एक सेर से अधिक दूघ न देती। तो भी कुल मिलाकर पांच छह सेर दूध हो जाता जिसमें आधा से अधिक दादा खा-पी जाते बाकी में उनके माता पिता। जब बंटवारे में मिला अनाज खत्‍म हो गया, भदईं (खरीफ) की खेती का समय आया और लोगों से पूछताछ कर खेती शुरू की। गलती करते, सीखते-सीखते दादा खेती में पारंगत हो गए और एक समय गांव के सबसे अच्‍छे खेती के जानकार माने जाने लगे।

मेरे गांव का एक दृश्‍य

दादा के चार बेटे – रघुनाथ, यदुनाथ ,सूर्यनाथ और तिलकधारी तथा एक बेटी- रमराजी देई थीं। यही यदुनाथ बंबई गए थे जो बीमार होकर लौटै और युवावस्‍था के पहले ही संसार से चले गए। तबसे बंबई मेरे परिवार के लिए अभिशप्‍त हो गया। कहा जाता कि बंबई हमको सहती नहीं। गांव के अन्‍य परिवारों के लोग कमाने बंबई जाते लेकिन हमारे परिवार का कोई नहीं जाता। टाइम्‍स ऑफ इंडिया के प्रशिक्षु पत्रकार के लिए मेरे वहां जाने की कहने पर मां एकदम अलप हो गईं और मना कर दिया कि नौकरी मिले या नहीं, वहां नहीं जाना है। काफी बाद में दस साल पहले मेरा छोटा भाई सुरेंद्र वहां गया तो मां ने रो-रोकर घर एक कर दिया तो कुछ महीने बाद ही उसे वापस आना पड़ा। बाद में मां और पिता जी के न रहने पर दूसरे छोटे भाई चंद्रशेखर वहां गए और थोड़े दिन बाद ही वहां से दूसरी नौकरी करने चैन्‍नई चले गए। वह वहां जाने के पहले बहुत हिचक रहे थे लेकिन मेरे कहने पर ही वहां गए।

मैं दादा के सबसे छोटे बेटे तिलकधारी दुबे का सबसे बड़ा बेटा हूं। उनके घर 31 अगस्‍त 1949, शुक्‍ल पक्ष अष्टमी,बुधवार सुबह साढ़े आठ बजे के आस-पास मेरा जन्‍म हुआ। मां और बड़की माई के अनुसार जब मेरा जन्‍म हुआ तो घोरिया तक बेर आई थी। बिना घड़ी के समय जानने का यह तरीका था।

घोरिया लकड़ी की चिड़िया की तरह बड़ी आयताकार आकृति होती जिसे कच्‍चे मकानों पर सजाने और नरिया थपुआ लगाने के लिए सहारा देने हेतु लगाया जाता। वहां तक धूप पहुंचने को ही घोरिया तक बेर आना कहा जाता। जब मैं पत्रकार हो गया, थोड़ी ज्‍योतिष में रुचि हुई तो घोरिया तक बेर आना देखने के लिए मैं 30 अगस्‍त को गांव गया। संयोग था कि उस दिन बादल नहीं घेरे थे और साढ़े आज बजे के आस-पास घोरिया तक धूप आई थी जिसके सहारे मैने अपनी कुंडली बनाई।

मेरी मां किसमत्‍ती देवी थीं जिनकी एक बेटी पहले हो कर गुजर चुकी थी। मेरे तीन और भाई रामयश, चंद्रशेखर, सुरेंद्र और तीन बहनें- सुशीला, उर्मिला और उषा हैं। मेरे ठीक बाद के रामयश नहीं रहे। 28 साल की उम्र में हृदयजन्‍य बीमारी से उनका देहांत हो गया। उनके एक बेटे और एक बेटी का परिवार है। उनके बारे में आगे लिखूंगा।

बात दादा जी की चल रही थी। दादा जी को मैने 85 साल की उम्र तक खेतों में काम करते, फावड़ा-कुदाल चलाते देखा है। आलू की मेड़ चढ़ाने की कला मैने उनसे ही सीखी कि कुदाल को कैसे इशारे से थोड़ी टेढ़ी कर चलाएं की मेड़ पर मिट्टी चढ़ जाए और सींचने के लिए गुच्‍ची में पानी भी ठीक से आए। उन्‍होने मुझे घास छीलना भी सिखाया। दूब छीलते समय उसकी जड़ न कटने पाए नहीं तो दोबारा दूब नहीं उगेगी, यह मैने गर्मियों में उनके साथ घास छीलते समय सीखा। बाद में इंटर और बीएससी में पढ़ते समय पता चला कि घास की जड़ से नया पौधा कैसे पनपता है। इसे वेजिटेबल प्रोपेगेशन कहते हैं।

दादा जी से जुड़े कई संस्‍मरण हैं। पढ़ने वाले बोर भी हो सकते हैं लेकिन मेरे लिए यह सब लिखना बहुत जरूरी है क्‍योंकि बिना यह सब लिखे मेरी निर्मिति के बारे में पता नहीं चलेगा। मेरे निर्माण में इन्‍हीं सबका खाद-पानी है तो मैं कैसे इन्‍हें भूल जाऊं? आज यह सब लिखते समय मैं गर्व की अनुभूति कर रहा हूं। अपनी जड़ों को भूलने से तो किसी का भी अस्त्तित्‍व नहीं रह जाता, मैं तो एक किसान का पोता और बेटा हूं।

क्रमशः-5

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