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“दलित समुदाय का स्वरूप क्या है, उसकी सीमा क्या है? क्या है दलित साहित्य?” : रामकृपाल सिंह

क्या है दलित साहित्य?
रामकृपाल सिंह

कहीं पढ़ने को मिला कि अनेक विश्वविद्यालयों में दलित साहित्य पढ़ाया जा रहा है। जबकि अभी तक स्वयं दलित शब्द ही अपरिभाषित है। न इस शब्द का संविधान में कोई उल्लेख है, न यह समाज में प्रचलित है और न इस नाम के किसी समूह का कोई सुनिश्चित आकार है- तो आप पढ़ा किसके बारे में रहे हैं?
एक तरफ जहां कतिपय दलित चिंतकों का कहना है कि सरकारी आलेखों में उल्लिखित अनुसूचित जातियां ही दलित हैं तो दूसरी तरफ उसी समुदाय के शीर्ष चिंतक श्री मोहनदास नैमिषराय का कहना है कि धोबी, मल्लाह, खेतिहर मजदूर- ये सभी दलित हैं। यहां यह स्पष्ट कर दें कि मल्लाह अनुसूचित जाति में नहीं हैं और वर्तमान में खेतिहर मजदूरों में भी उस जाति के लोगों की संख्या अधिक है जो अनुसूचित जाति में नहीं आते हैं। इसके अलावा कुछ दलित चिंतकों के अनुसार कंहार, कुम्हार जैसी जातियां तथा निर्माण कार्य में लगे मजदूर भी दलित हैं।
तात्पर्य है कि जिस वर्ग या समूह का अभी तक स्वरूप ही सुनिश्चित नहीं है, उसके नाम पर आप पढ़ा क्या रहे हैं?
कतिपय दलित चिंतकों के अनुसार राजकीय सूची में अनुसूचित वर्ग में उल्लिखित जातियां ही दलित हैं। लेकिन तथ्य यह है कि यह सूची भी निर्दोष नहीं है। उदाहरण के लिए पासी और राजभर दोनों पहाड़ की छत्रिय जातियां हैं जो पहाड़ी राजाओं द्वारा आक्रमण के समय सैनिक रूप में मैदानी क्षेत्रों में आईं। राजा सुहेलदेव और बिजली पासी तथा उनके सैनिक ही इनके पूर्वज हैं। यह लोग सदियों तक यहां रहे और अपने मूल स्थान से कट गए। जीविका के लिए यह खेत मजदूर के रुप में कार्य करने लगे। अपनी गरीबी के कारण यह यहां तिरस्कृत और अछूत तक की श्रेणी में आ गए। पासी और राजभर- दोनों का मूल एक है, प्राय: व्यवसाय भी एक है और आर्थिक स्तर भी करीब-करीब बराबर है किन्तु सरकारी आलेखों में पासी अनुसूचित जाति में है जब कि राजभर अनुसूचित जाति में नहीं है। अब दलित चिंतक ही तय करेंगे कि राजभर दलित श्रेणी में आता है कि नहीं ।
यह मात्र एक बानगी है- इस तरह के तमाम उदाहरण हैं ।
कहने का तात्पर्य यह है कि दलित समुदाय का कोई आकार नहीं है, इसकी कोई रूपरेखा भी नहीं है और न इसकी कोई परिभाषा है लेकिन फिर भी उच्च कक्षाओं में यह एक पाठ्यक्रम है। और भी अनेक प्रश्न अनुत्तरित हैं। अगर कृषि मजदूर दलित है तो औद्योगिक मजदूर दलित क्यों नहीं? अगर अनुसूचित न होने के बावजूद मल्लाह दलित है तो कुम्हार और ईंट बनाने वाले
नोनियां दलित क्यों नहीं?
यह सही है कि आजादी के पूर्व और उसके बाद तक भी समाज के एक वर्ग विशेष को अछूत करार कर दिया गया था। उनके साथ अमानवीय व्यवहार भी होता था। निश्चय ही वह भारतीय सामाजिक इतिहास का काला पन्ना है लेकिन वह अतीत का इतिहास है। कानून भी बना, समाज में भी बदलाव आया। अब न कहीं कोई अछूत है, न कोई तिरस्कृत है। अब अगर कोई तिरस्कृत है भी तो वह जाति के कारण नहीं, गरीबी के कारण है। होटल के बेयरे से कोई यह नहीं पूछता कि तुम्हारी जाति क्या है?न हिंदुस्तान में कोई ऐसा मंदिर है जहां किसी का जाति के आधार पर प्रवेश वर्जित हो।
आज समाज में जब इस प्रकार की कोई व्यवस्था विद्यमान नहीं है तो दलित साहित्य के नाम पर पढ़ाएंगे क्या और जहां तक बीते हुए काल की अछूत समुदाय की कारुणिक अवस्था के चित्रण का प्रश्न है तो डॉक्टर अंबेडकर सहित अन्य विद्वानों ने उन पर इतना विस्तार से और मार्मिक लेखन किया है कि उसके आगे लिखने के लिए कुछ बचा नहीं है।

अब एक दृष्टि दलित लेखकों पर
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दलित उत्पीड़न पर केंद्रित अपनी अनेक रचनाओं -जैसे ‘ठाकुर का कुआं’, ‘ सद्गति’, ‘ दूध का दाम ‘-जैसी कहानियां तथा कर्मभूमि और गोदान में वर्णित दलित संघर्ष को लिखने वाले प्रेमचन्द को वर्तमान दलित साहित्य के मसीहा दलित लेखक मानने के लिए तैयार नहीं है क्योंकि प्रेमचंद खास जाति समूह में पैदा नहीं हुए थे। उनका कहना है कि दलित समुदाय में पैदा हुआ व्यक्ति ही दलित लेखक हो सकता है। लेकिन अगर दलित समुदाय का कोई लेखक “पेरिस की शाम” लिखे तो उसे दलित लेखन माना जाए या नहीं- इस पर वे मौन हो जाते हैं। यही सवाल दलित साहित्य के शीर्ष चिंतक मोहनदास नैमिशराय से किया गया तो उन्होंने कहा -“दलित लेखक है तो उसे दलित पर ही लिखना चाहिए” लेकिन ‘पेरिस की शाम’ का लेखक दलित लेखक है कि नहीं – इस पर वह भी मौन रहे।
लेकिन एक मत यहां भी नहीं है। शिमला निवासी हिंदी के जाने-माने शीर्ष दलित लेखक श्री हरनौट का कहना है कि “प्रेमचन्द के लेखन से ही प्रेरणा पाकर मैंने लिखना शुरू किया। वे आज भी मेरी प्रेरणा है।” उन्होंने कहा था कि “अभी तक दूसरा प्रेमचंद पैदा नहीं हुआ है।” वहीं लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष और स्वघोषित शीर्ष दलित चिंतक प्रोफेसर कालीचरण स्नेही का कहना है कि ” प्रेमचंद काले दिल वाला आदमी था। वह महात्मा गांधी से प्रभावित था और उसने डॉक्टर अंबेडकर की उपेक्षा की।” प्रेमचंद जैसे लेखक के लिए प्रयुक्त इन शब्दों को स्तरीय नहीं कहा जा सकता।
अज्ञानता कोई अपराध नहीं है लेकिन मैं यहां डॉक्टर स्नेही तथा उन जैसे अन्य स्वघोषित विद्वानों को बताना चाहूंगा कि मुंशी प्रेमचंद एवं डॉ आंबेडकर न केवल एक दूसरे को जानते थे बल्कि एक दूसरे के प्रशंसक भी थे। मुंशी प्रेमचंद यदि अंबेडकर के दलितों के हित में किए जा रहे अभियान से प्रभावित थे तो डॉक्टर अंबेडकर भी प्रेमचंद की रचनाओं के प्रशंसक थे। मुंशी प्रेमचंद ने 1933 में अपनी पत्रिका हंस के मुखपृष्ठ पर न केवल डॉक्टर अंबेडकर का चित्र छापा था बल्कि उन पर संपादकीय भी लिखा था।

शिक्षण संस्थाओं में किसी भी विषय को पढ़ाना गलत नहीं है लेकिन इतना तो आवश्यक है कि उस विषय का कोई स्वरूप हो, कोई आकार हो, कोई उद्देश्य हो या विद्यार्थियों के कैरियर के लिए वह किसी तरह लाभदायक हो।
लेकिन यहां तो यही पता नहीं कि दलित समुदाय का स्वरूप क्या है, उसकी सीमा क्या है? उसका आधार जातिगत है या व्यवसाय गत है और उस विषय के अंतर्गत पढ़ाया क्या जाएगा?
इस विषय को भी अवश्य पढ़ाया जाना चाहिए लेकिन उपरोक्त तमाम भ्रांतियां और अस्पष्टताओं को दूर करने के बाद।

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