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डॉ तेजकर झा लिखित नई पुस्तक The Crisis of Succession का लोकार्पण

“राजशाही से लोकशाही तक गिद्धौर और दरभंगा का रिश्ता मज़बूत रहा है” : श्रयसी सिंह

पटना।

“राजशाही से लोकशाही तक गिद्धौर और दरभंगा का रिश्ता आत्मीय और पारिवारिक रहा है। दरभंगा के महाराज जनता की भलाई के लिए बहुत उदार थे। हमारी सीमाएं एक दूसरे से मिलती थी और हमारी नीतियों और सोच भी। इन्होंने मुंगेर में भी सिंचाई तथा पेय जल की समस्या के हल के लिए डैम बनवाये थे और नहरें खुदबाई थी।”

ये बातें गिद्धौर राजपरिवार की बेटी तथा जमुई विधान सभा सदस्य श्रेयसी सिंह ने गाँधी मैदान के रीजेंट सभागार में इसमाद प्रकाशन की ओर से प्रकाशित व तेजकर झा लिखित नई पुस्तक The Crisis of Succession के लोकार्पण के अवसर कही, जिसमें डुमराँव इस्टेट के राजपरिवार के सदस्य शिवान विजय सिंह और दरभंगा राज परिवार की सदस्य कुमुद सिंह भी उपस्थित थी।

इस लोकार्पण के अवसर पर पुस्तक की समीक्षा करते हुए अलीगढ़ मुश्लिम विश्वविद्यालय के प्रो. सज्जाद ने कहा कि दरभंगा के महाराज कामेश्वर सिंह की मृत्यु केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं थी, वह उस क्षेत्र के विकास की मौत थी, जिसे लेखक ने नहीं कह कर भी बहुत हद तक कह दिया है। उन्होंने यह स्वीकार किया कि यूरोपीय शासन काल में उन्ही की यह साजिश होती थी कि अपने द्वारा की गयी सारी बुराई की जिम्मेदारी स्थानीय राजे-रजवाड़े पर थोप दिया जाये। अंगरेजों की इस साजिश का शिकार राज दरभंगा भी रहा और उनके बारे आधुनिक विदेशी इतिहासकारों ने भी यह ‘बाइपास’ कर देने की प्रवृत्ति दिखाई है। अतः आवश्यकता है कि हम दस्तावेजों के आधार पर प्रामाणिक इतिहास लिखें और यह काम कर तेजकर झाजी बधाई के पात्र है।

इस अवसर पर शिवान विजय सिंह ने डुमराँव और दरभंगा के राजघराने के बीच के सम्बन्धों पर बहुत भावुक स्वर में अपने दादाजी के मुह से सुनी बातों को दुहराया। उन्होंने रजवारों के वंशजों से अपने इतिहास को संजोने की अपील की। सरकार से पुराने महलों की मरम्मत कराने की गुहार की।

लेखक डा. तेजकर झा ने कहा कि आज महाराज कामेश्वर सिंह की पुण्यतिथि है। इस अवसर पर इस पुस्तक को लोकार्पित करना उनके प्रति और प्रो. हेतुकर झा के प्रति मेरी श्रद्धांजलि है।

इस अवसर पर प्रो. शंकर दत्त ने कहा कि दरभंगा के राजा जहाँ कहीं भी जाते थे और वहाँ आर्थिक सहायता की आवश्यकता जनता के हित में देखते थे तो वहाँ अवश्य सहायता करते थे। 1912ई. में मुश्लिम समुदायों ने अपने विवाद के निपटारे केलिए रमेश्वरसिंह को चुना था। मन्दार पर्वत पर जब जैनियों के दो गुटों में अधिकार के लिए संघर्ष चला तो वहाँ भी मध्यस्थता के लिए वे ही गये थे। इस परिवार का इस प्रकार नष्ट जाना बहुत कुछ खालीपन छोड़ जाता है।

हेतुकर झा मेमोरियल ट्रस्ट की ओर से आयोजित इस लोकार्पण समारोह का आरम्भ अभिषेक मिश्र के गाये मंगलाचरण से हुआ। ट्रस्ट के अध्यक्ष मधुकर झा ने स्वागत अतिथियों का स्वागत किया तथा प्रो. अविनाश झा ने धन्यवाद ज्ञापन किया। इस मौके पर पटना के अनेक जाने-माने शिक्षाविद् उपस्थित थे।

Your devotion and your professionalism combined have been blessed with success 💐🙏- Justice A. P. Sahi

Thank you Tejakar. The book release was a recognition of your inheritance from a wonderful academic to a worthy son that valorised research and contributed valuable knowledge. Congratulations again. Truly proud of you. —Dr Shankar Dutt

I feel proud of this – the legacy continues 👍 —Dr Rajeshwar Mishra

Thank you so much for inviting me for the book launching ceremony.
Enjoyed every moment and it was a treat to listen to Dr. Sajjad saheb. His analysis of the book as well as the way to move forward is worth a note for the current generation.

Once again many good wishes to you and all who are behind this dedicated achievement. — Sri Aditya Jalan

Hearty congratulations.I had always been persuading Baua ( late Hetukar Jha)to take up this project but destiny would have it from his son.
I eagerly look forward to seeing the book.
—Sri Ashutosh Singh Thakur

 

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