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तुच्छ मुकदमे किसी भी स्तर पर समाप्त किए जा सकते हैं: दिल्ली हाईकोर्ट ने सब्जी विक्रेता की याचिका खारिज करते हुए कहा
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🟩दिल्ली हाईकोर्ट ने यह देखते हुए कि न्यायिक संस्थान तुच्छ मुकदमों के कारण भारी पेंडेंसी से जूझ रहा है, कहा है कि अदालतों को बिना किसी और देरी के इसे पहली तारीख को खारिज करने का प्रयास करना चाहिए।
🟫जस्टिस दिनेश कुमार शर्मा ने यह कहते हुए कि इस तरह के तुच्छ मुकदमों को “शुरुआत में ही दबा दिया जाना चाहिए”, आगे कहा कि अदालतों के पास ऐसे मामलों को जारी रखने की विलासिता नहीं है, “केवल इसलिए कि कुछ प्रक्रियात्मक गतियों से गुजरना पड़ता है।
अदालत ने कहा,
🟧”अगर कुछ कारणों से इस तरह के आदेश शुरू में तुच्छ मुकदमे में पारित नहीं किए जाते हैं तो अदालत को किसी भी स्तर पर इस तरह की परीक्षा को समाप्त करने से नहीं रोकता।” यह भी देखा गया कि अदालत को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अवैध और अनधिकृत वादियों को न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करने का अवसर न दिया जाए।
अदालत ने कहा,
➡️”अदालत को यह ध्यान में रखना होगा कि कई ईमानदार वादी और वास्तविक दावे लंबित हैं और प्रणाली को तुच्छ मुकदमों और शरारती वादियों द्वारा रोक दिया गया है।
⬛जस्टिस शर्मा ने यह भी कहा कि जहां याचिकाकर्ता अपने अधिकार, दावे, स्वामित्व या हित का दावा करने में विफल रहा या कोई दलील या दावा नहीं है, इस तरह के मुकदमे को जारी रखने का कोई उद्देश्य नहीं होगा।
अदालत ने कहा,
🔵”इस संबंध में न्यायालय को अपने समक्ष लंबित मुकदमे की शुद्धता को भी देखना है। निषेधाज्ञा की राहत इक्विटी की राहत है, जो इक्विटी का दावा करता है उसे साफ हाथों से आना चाहिए।” अदालत ने इस प्रकार 31 अगस्त, 2017 के आदेश को चुनौती देने वाली पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी, जिसमें निचली अदालत ने याचिकाकर्ता (वादी) द्वारा दायर मुकदमे को खारिज कर दिया था।
⏹️याचिकाकर्ता शहर की आजादपुर मंडी में दुकान के बाहर एक बाई-लेन में सब्जियां बेचता है, उसने विभिन्न निजी प्रतिवादियों और एपीएमसी के खिलाफ जबरन बेदखली के खिलाफ स्थायी निषेधाज्ञा की मांग करते हुए मुकदमा दायर किया था।
🟣ट्रायल कोर्ट ने प्रतिवादियों में से एक कृषि उपज मंडी समिति (एपीएमसी) को दो सप्ताह के भीतर आजाद पुर मंडी परिसर के भीतर मौजूद हर अवैध अतिक्रमण को हटाने का निर्देश दिया। ट्रायल कोर्ट ने यह भी नोट किया कि पूरे वाद में याचिकाकर्ता यह निर्दिष्ट करने में विफल रहा कि क्या वह एपीएमसी द्वारा लाइसेंस धारक है या किसी भी तरह से उस स्थान पर सौदा करने के लिए अधिकृत है।
🟤 यह भी देखा गया कि याचिकाकर्ता ने अपने दावे के समर्थन में कोई दस्तावेज दाखिल नहीं किया। हाईकोर्ट के समक्ष अपील में याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि मुद्दों को तैयार किए जाने के बाद और मामला साक्ष्य के स्तर पर है, इसलिए ट्रायल कोर्ट को मुकदमा खारिज नहीं करना चाहिए था।
🟥यह जोड़ा गया कि याचिकाकर्ता को अपना मामला साबित करने के लिए सबूत पेश करने का मौका दिया जाना चाहिए था। याचिका खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि पुनर्विचार क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते हुए यह देखना होगा कि निचली अदालत ने किसी भी तरह से अधिकार क्षेत्र को पार कर लिया है।
❇️अदालत ने आदेश बरकरार रखते हुए कहा, “इस अदालत को यह भी ध्यान रखना होगा कि जिस व्यक्ति ने अदालत का दरवाजा खटखटाया है और अपना दावा पेश किया है, उसका वास्तव में कोई दावा, अधिकार, हक या हित है।”
केस टाइटल: राजन कुमार बनाम लज्जा देवी और अन्य
आनन्द श्रीवास्तव, अधिवक्ता
हाइकोर्ट इलाहाबाद
# 9335771008
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