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गुजरात: “पी कर जियो या मरो…!”: आनंद मोहन भटनागर

पी कर जियो या मरो…
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आनंद मोहन भटनागर 

शराब किसी भी राज्य की अर्थव्यवस्था का प्रमुख स्तोत्र है ।हमारे प्रदेश की सरकार एक तरफ दारू की नीलामी लाखों करोड़ों मे करती है दूसरी तरफ राजधानी लखनऊ के हज़रत गंज इलाक़े मे ३किलोमीटर दूर अशोक मार्ग पर शराब को छुड़ाने के लिए मध निषेध विभाग खोलती है ताकि लोग मादक पदार्थों को छोड़ दे ।

शराब के मामले मे हर राज्य काफ़ी चूज़ी है एक तरफ दिल्ली राज्य मे दारू की नदियाँ बह रही है गली गली मे शराब की दुकानें खुल रही है शराब उधोग पनप रहा है, वही महाराष्ट्र के पास दारू मे डालने के लिए पानी नही है । बिहार के पास दारू मे डालने के लिए पानी है लेकिन दारू नही है । उत्तर प्रदेश मे दारू भी है, पानी भी है लेकिन सावन चल रहा है । गुजरात मोदी जी का प्रिय राज्य है वहा सब कुछ उपलब्ध है लेकिन दारू का परमिट नही है । इसी परमिट के चक्कर मे गुजरात मे नक़ली शराब पीने से ३७ लोग निपट गये अभी भी बहुत से लोग अस्पताल मे ज़िन्दगी और मौत के बीच फँसे है । कुछ ऐसा ही हाल बिहार का है इस वर्ष बिहार मे ११५ लोग नक़ली शराब पी कर मर गये । ये सरकारी आंकडे हैं, संख्या इससे कही ज़्यादा हो सकती है ।

अपने देश मे नक़ली शराब से मरने वालों की संख्या और नक़ली शराब बनाने बेचने वाले सिडिकेट के ३० लाख से ज़्यादा केस देश की विभिन्न अदालतों मे निर्णय की बाट जोह रहे है जिनकी सुनवाई होनी है जिसमें सबसे ज़्यादा केस गुजरात के बताए जाते है ।

इस नक़ली शराब के धंधे मे एक बहुत बड़ा काकस देश मे काम कर रहा है जिसमें मंत्री सनतरी सभी शामिल हैं। एक समानांतर समानतर अर्थ व्यवस्था चल रही है, जो बुरा असर डाल रही है जिसके कारण राजस्व मे कमी आ रही है । सरकार अगर चाहे तो सख़्ती से गाँव गाँव चल रही नक़ली शराब की भट्टीयो को बंद करवाए या शराब की बिक्री पर से प्रतिबन्ध पूरी तरह से हटा ले । यदि यह भी नही कर सकती तो मीथाईल अल्कोहल जो आज कल बाज़ार मे खुले आम मिल रहा है, उसकी बिक्री पर राशनिंग कर दे ।
—- आनंद मोहन भटनागर

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