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लोकसभा चुनाव 2024: “मोदी या राहुल: कौन तोड़ेगा रिकॉर्ड?”

लोकसभा चुनाव 2024

 मोदी या राहुल: कौन तोड़ेगा रिकॉर्ड?

*भाजपा सबसे अधिक सांसद चुने जाने का कांग्रेस का रिकॉर्ड तोड़ेगी या कांग्रेस सबसे कम सांसद भाजपा के चुने जाने का रिकॉर्ड तोड़ेगी?*

Sneh Madhur senior journalist

 *Sneh Madhur* 

हर तरफ सिर्फ एक ही चर्चा है कि वर्ष 2024 के लोकसभा के चुनावों के जो परिणाम चार जून को आएंगे, वे परिणाम नरेंद्र मोदी को तीसरी बार लगातार प्रधानमंत्री के पद पर सुशोभित करने के लिए पर्याप्त होंगे। लेकिन लोगों का ध्यान भटकाने के लिए मोदी ने चार सौ पार का लक्ष्य देकर अपने कार्यकर्ताओं और विरोधियों दोनों को ही मानसिक कसरत करने के लिए मजबूर कर दिया है। वे यही गिनने में मशगूल रहेंगे कि बीजेपी को कितनी सीटें मिल रही हैं और जब यह संख्या 398 पर रुक जाएगी तो विपक्ष उत्साह से लबरेज होकर आतिशबाजी करने लगेगा कि देखा हमने बीजेपी को चार सौ से पहले रोकने में सफलता हासिल कर ली, यानी मोदी हार गए! ऐसा mental game मोदी जैसा शक्स ही खेल सकता है यानी मोदी खुद पहुंचेंगे शिखर पर और जीतने का भाव रहेगा नीचे खड़े होकर आकाश की तरफ देखने वाले विपक्ष के चेहरे पर! एक तरफ चार जून 2024 को सिंह की तरह दहाड़ते हुए दसों दिशाओं से की जा रही पुष्प वर्षा के बीच मोदी भारतीय जनता पार्टी के कार्यालय की तरफ बढ़ेंगे और दूसरी तरफ संपूर्ण विपक्ष भी इस देव तुल्य शख्शियत का गुणगान करने से खुद को नहीं रोक पाएगा। आखिर सफलता को सलाम हर कोई करना चाहेगा, वह भी तब जब अपने खेमे के तंबू उखड़ कर तितर बितर ही चुके हों और वहां कोई सेनापति तक मौजूद न हो।


मैं इस फेर में नहीं पडूंगा कि बीजेपी को कितनी सीटें मिलेंगी, चार सौ पार होगी कि नहीं? कितनी सीटें किसको मिलेंगी, इसका दावा तो वही कर सकता है जो सभी सीटों पर गया हो और वहां का गुणा भाग सच्चे मन से निष्पक्ष भाव से न सिर्फ किया हो बल्कि उसे वहां की स्थानीय और राष्ट्रीय परिस्थितियों का आकलन करने की समझ भी हो। 2019 के लोकसभा के चुनाव में अधिकांश आकलनकर्ताओं का मानना था कि बीजेपी इतनी ही सीटें पा सकती है जिससे मोदी के अलावा किसी और के पीएम बनने के नाम पर विपक्ष से समझौता हो सके, मोदी को तो पीएम बनना ही नहीं है!

वर्ष 2022 के उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के दौरान मैं लखनऊ के राजनैतिक गलियारे से जुड़े लगभग सौ पत्रकारों से मिला था और सभी का कहना था कि अखिलेश यादव की ही सरकार बनेगी। वर्ष 2017 में दिल्ली के कई पत्रकारों ने पूरे उत्तर प्रदेश का दौरा करके मुझे बताया था कि अखिलेश की लहर चल रही है। मैंने कहा था कि बीजेपी सरकार बनाएगी तो मेरा मज़ाक उड़ाते हुए कटाक्ष किया गया था कि डीमोनेटाइजेशन के बाद कहीं कुछ बचा है? यहां तक कि बीजेपी के प्रदेश स्तर के नेता तक कहते थे कि “ई मोदिया ने सब नाश कर दिया है…!” नतीज़ा क्या निकला था? वर्ष 2014 के चुनाव के दौरान लखनऊ के प्रदेश कार्यालय में प्रबुद्ध प्रवक्ताओं के साथ जब आकलन का दौर चल रहा था तो उन प्रवक्ताओं ने यह माना था कि मोदी की लहर चल रही लेकिन इसके बावजूद मुझसे कहा था कि क्या इस लहर में बीजेपी को आप उत्तर प्रदेश में पचास सीट दे दीजिएगा? मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात में सभी की सभी सीटें दे दीजिएगा?

चूंकि मैं नंबर गेम में फंसना नहीं चाहता क्योंकि कोई भी जो भी आकलन कर रहा है बिना किसी अधिकृत जानकारी के, सिर्फ भक्ति भाव से ही, “जाकी रही बुद्धि और भावना जैसी रही, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।” भक्त दोनों ही तरफ हैं। मेरा मानना है कि भाजपा का यह स्वर्णिम काल चल रहा है। वर्ष 2014 में चारों तरफ की हताशा से ऊबे लोगों में मोदी उम्मीद की एक किरण के रूप में ही दिखे थे और जनता ने “डूबे को तिनके का सहारा” की तर्ज़ पर मोदी की बांह पकड़ ली थी। लेकिन 2014 से 2019 के बीच मोदी ने अपनी मेहनत, अपने विज़न, नेक इरादों, राष्ट्र प्रथम की नीति, केंद्रीय मंत्रिमंडल को भ्रष्टाचार से मुक्त करके और सबका साथ सबका विकास की नीतियों को धरातल पर उतार कर यह साबित कर दिया कि वह तिनका नहीं थे बल्कि पूरा जहाज थे जैसे कि कोई विशाल आइसबर्ग होता है। फलतः जनता ने उन्हें पुनः चुन लिया 2019 प्रधानमंत्री के रूप में।

2019 की विजय के बाद तो मोदी ने पूरी दुनिया पर कहर ही ढा दिया। पिछलग्गू की तरह चलने वाला भारत देश विश्व विजय के अभियान पर निकल पड़ा। जैसे जैसे समय बीतता गया, मोदी ऊर्जा पिण्ड के रूप में अपना आकार बढ़ाते ही गए और विदेशों में अपना झंडा बुलंद करने के साथ घरेलू मोर्चे पर भी उतनी ऊर्जा के साथ डट कर समस्याओं का निराकरण करते रहे। हर क्षेत्र में उनकी सक्रियता देखकर विपक्षी भी खिसियाते हुए व्यंग्य करने लगे थे कि मोदी ने प्रधानमंत्री के स्तर को गिरा दिया है, हर जगह पहुंच जाते हैं। मोदी यह संदेश देने की कोशिश कर रहे थे कि चाहे जितनी भी उपलब्धियां हासिल कर लो लेकिन रुकना नहीं है, ठहरना नहीं है। जैसे सुंदर काण्ड में तुलसी दास जी ने लिखा है कि हनुमान जी जब सीता जी की खोज में लंका जा रहे थे तो देवताओं के कहने पर “मैनाक” पर्वत ने उन्हें थोड़ा विश्राम कर लेने का सुझाव दिया था ताकि लंबी यात्रा के लिए नई ऊर्जा संचित कर लें तो इस पर हनुमान जी का उत्तर था, “हनुमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रणाम, राम काज किन्हें बिना मोहें कहां विश्राम!” यानी लक्ष्य की प्राप्ति से पूर्व विश्राम करने की सोच भी नहीं सकता! चूंकि मोदी के पहले यह परंपरा रही है कि पीएम साल में कई बार छुट्टियां मनाने चले जाते थे। पहले यह माना जाता था कि कोई पद हासिल करने का अर्थ ही यही है कि ऐश ही ऐश ! राहुल गांधी पीएम बनेंगे तो विपक्ष की यह इच्छा भी पूरी हो सकती है, फिर से वह परंपरा जीवित हो जायेगी।

कहने का अभिप्राय यह है कि यह तो सत्य है कि 2019 के चुनाव में जनता ने आंख बंद कर मोदी पर विश्वास जताया था लेकिन सिर्फ अगले पांच वर्षों के लिए नहीं, बल्कि हमेशा के लिए! जनता का भाव यही था कि मोदी ने दिल जीत लिया है, अब दोबारा सोचने की या फिर उनके इरादों को जांचने परखने की कोई जरूरत नहीं रही, मोदी को पक्की नौकरी दे दी पीएम पद की! लोग भूल गए होंगे लेकिन मुझे याद है कि मोदी के विरोधी भी उस समय कहा करते थे कि अब मोदी को अगले चुनाव में भी कोई हरा नहीं सकता है। जैसे हर मैच में कोई बैट्समैन सेंचुरी बनाकर विस्फोटक पारी खेलकर टीम को जिता दे तो फैंस तो क्या, दूसरी टीम वाले भी यही कहेंगे कि इसको आउट करना संभव नहीं है। वे भी यही चाहेंगे कि इतना धुरंधर बैट्समैन उनकी टीम में भी हो! जब उनकी टीम में ऐसा कोई खिलाड़ी न हो तो वे बेचारे क्या कर सकते हैं सिवाय इसके कि जब उनकी टीम खेलने जाए तो वे कहें कि कौन मैच देखने जाए, हारना तो है ही, खाली पीली टाइम क्या वेस्ट करना! वही हो रहा है। मतदान प्रतिशत जो कम हो रहा है, उसके पीछे की वजहें दोनों तरफ की हैं। एक तरफ के भक्त कह रहे हैं कि मैच में रोमांच नहीं है, ऐसा मैच क्या देखना जिसका परिणाम पहले से पाया हो कि जीतना हमारी ही टीम को है। दूसरी टीम के भक्त कह रहे हैं कि जब हारना ही है तो टीम का हौसला बुलंद करने के लिए वहां जाने की क्या जरूरत? मतदान प्रतिशत तभी बढ़ता है जब किसी को सत्याच्युत करना है, कुर्सी से उतारना हो।

स्पष्ट है कि मोदी ने अपने आचरण और बुलंद इरादों से मतदाताओं के मन में जो जगह बनाई है, वहां तक कोई नहीं पहुंच सकता है। उस पर उन्होंने “श्रीराम जी” का तड़का भी लगा दिया है! जो लोग मंदिर जाने में और टीका लगाने में हिचकते थे यह सोचकर कि उनके हिंदू सेकुलर मित्र ही उनका मज़ाक उड़ाएंगे, अब उनकी हिचक दूर हो गई है। मंदिरों में पहले बूढ़े, थके हारे लोग ही दिखते थे, अब तीन चौथाई से भी ज्यादा युवा ही नज़र आते हैं। ये ऐसा युगांतरकारी बदलाव है जो कई पीढ़ियों तक चलेगा जब तक कि फिर कोई आक्रमणकारी न आ जाए। मोदी ने ऐसे लोगो की एक तरह से फौज़ खड़ी कर दी है जो किसी कथित सेकुलर को अब पनपने नहीं देगी। लेकिन मोदी ने किसी दूसरे धर्म का कभी अनादर भी नहीं किया है और उन्हें पल्लवित पुष्पित होने पर प्रतिबंध भी नहीं लगाया है। मोदी का सिर्फ इतना कहना है कि हम किसी धर्म के खिलाफ़ नहीं हैं लेकिन अपने सनातन धर्म पर गर्व करने का अधिकार हमें भी है।

श्री राम मंदिर ने सभी दलों के भीतर हलचल पैदा कर दी है। अन्य दलों के लोग भी महसूस करने लगे हैं कि श्री राम की आस्था को दरकिनार कर अपना अस्तित्व अब नहीं बचाया जा सकता है। जिन दलों का अस्तित्व ही तुष्टीकरण पर टिका हुआ है, वहां के लोग भी पाला बदल रहे हैं। चैनल पर बैठकर वर्षों तक मोदी और भाजपा की खुलकर आलोचना करने वाले भी भाजपा में शामिल हो रहे हैं। सर्वत्र व्यापी इस माहौल को देखकर यह कहना कि अबकी बार चार सौ पार होगी एनडीए, एकदम सटीक आकलन नहीं है। हो सकता है कि यह संख्या चार सौ भी पार कर और आगे बढ़ जाए और एक रिकॉर्ड बना दे! आज की जो राजनैतिक स्थितियां हैं, ऐसा “न भूतो न भविष्यति” जैसी हो गई है, इसलिए कोई भी रिकॉर्ड टूट सकता है, इसके लिए तैयार रहिए। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति लहर में कांग्रेस को 404 और गठबंधन को 414 सीटें मिली थीं। क्या इस रिकॉर्ड को मोदी का करिश्मा तोड़ पाएगा क्योंकि यह संख्या चार सौ पार से ज्यादा दूर नहीं है? कहीं मोदी का असली लक्ष्य यही तो नहीं है?

दशाब्दियों तक देश पर राज करने वाली कांग्रेस को वर्ष 2014 के चुनाव में मात्र 45 सीटें मिली थीं। क्या इससे कम सीटें पाने का भी रिकॉर्ड बन सकता है। हालांकि 2019 में कांग्रेस अपने न्यूनतम में सात सीटें बढ़ाकर 52 तक पहुंच गई थी, तब जब चारों तरफ शोर था कि मोदी जा रहे हैं।

और अंततः कांग्रेस के सर्वेसर्वा राहुल गांधी ने रायबरेली से चुनाव के मैदान में उतरकर यह दर्शाने की कोशिश की है कि वह उत्तर प्रदेश से गांधी परिवार की विरासत को बनाए रखने की कोशिश से पीछे नहीं हटेंगे। लेकिन अपनी मूल सीट अमेठी के ठीक बगल की सीट पर खड़े होकर एक तरह से उन्होंने अमेठी वासियों को अंगूठा दिखाने और चिढ़ाने का ही काम किया है। राहुल गांधी का यह साहसिक कदम ही कहा जायेगा। अगर वह जीत जाते हैं तो वाह वाह, अगर हार जाते हैं तो यह सोचना पड़ेगा कि अगर साहस का ही परिचय देना था तो अमेठी छोड़कर वाराणसी से ही खड़े हो जाते और कुछ दिनों के लिए ही सही, प्याले में तूफान तो ला ही देते!

रायबरेली से सिर्फ तीन बार को छोड़कर हमेशा कांग्रेस ही चुनाव जीती है। दो बार तो अटल बिहारी बाजपाई की लहर में भाजपा के अशोक सिंह चुनाव जीते थे। 1977 में एक बार जनता पार्टी के राजनारायण सिंह ने इमरजेंसी के बाद वाली लहर में इंदिरा गांधी को हराया था। यानी जब बदलाव का समय आता है तो रायबरेली के मतदाता भी वक्त के साथ ही चलते हैं। गांधी परिवार के प्रत्याशियों को उनके क्षेत्रों में हमेशा क्षेत्रीय दलों का समर्थन मिलता रहा है, उनके खिलाफ कोई खड़ा नहीं होता रहा है। इस बार भी सपा का समर्थन कांग्रेस को मिला हुआ है और माना जा रहा है कि सिर्फ राहुल गांधी के लिए “यूपी के दोनों लड़कों में” यह समझौता हुआ है।

लेकिन सोचने वाली बात यह है कि क्या पहले की तरह सपा के मतदाता कांग्रेस की जितने में कामयाब हो पाएंगे? मेरा मानना है कि कांग्रेस प्रत्याशी के लिए यह जिताऊ सीट नहीं बल्कि चूहेदानी है। इस सीट पर कांग्रेस को मिलने वाले वोट प्रतिशत में लगातार गिरावट आ रही है। ,वर्ष 2009 में सोनिया गांधी को 72.2 प्रतिशत वोट मिले थे जो दस प्रतिशत गिरकर मोदी लहर में 2014 में 63.8 हो गया था और 2019 में भी आठ प्रतिशत गिरकर 55.8 प्रतिशत तक आ गया था। 2014 की तुलना में 2019 में सोनिया गांधी को दो लाख कम वोट मिले थे, वह भी तब जब यह माना जा रहा था कि इस बार मोदी नहीं आयेंगे, मोदी का खेल खत्म हो चुका है। इस बार तो मोदी का आना तय है, अब देखते हैं कि कांग्रेस के प्रत्याशी के कितने वोट कम होते हैं!

राहुल गांधी को सपा का समर्थन है लेकिन रायबरेली का किला अब सपा का गढ़ नहीं रहा। पहले अखिलेश सिंह जैसी शख्सियत के बल पर कांग्रेस जीतती रही है। अब अखिलेश सिंह रहे नहीं, उनकी बेटी अदिति सिंह भाजपा से विधायक हैं, सपा के विधायक मनोज पांडे बगावत करके भाजपा में शामिल हो चुके हैं और दो अन्य विधायक भी भाजपा से गलबंहियां कर रहे हैं। यानी सपा का किला ढहने की कगार पर है। ऐसे में क्या राहुल गांधी की कोई मदद हो पाएगी?

एक प्रश्न उठता है कि जिस सीट पर हार के भय से सोनिया गांधी राज्य सभा में चलीं गईं, वह सीट राहुल के लिए सुरक्षित कैसे हो गई, वह भी तब जब बगल की अमेठी सीट से हारने के बाद राहुल गांधी एक बार भी बहां नहीं गए? दूसरा यह कि सोनिया गांधी ने भी राहुल गांधी के लिए कहीं से भी सहानुभूति लहर पैदा नहीं होने दी जैसा की श्रीमती इंदिरा गांधी और राजीव गांधी को मिली थी। सोनिया गांधी ने रायबरेली छोड़ने से पहले वहां की जनता को विश्वास में नहीं लिया और न ही यह बताया कि वह राजनीति से संन्यास ले रही हैं, अब उन का बेटा राहुल रायबरेली के हवाले! इससे सहानुभूति की लहर पैदा हो सकती थी। इसके उलट दूसरे राज्य से राज्य सभा में जाकर सोनिया गांधी ने एक तरह से यह घोषित कर दिया है कि वह अब भी सक्रिय राजनीति में हैं। ऐसे में तो जनता कन्फ्यूजन में आ गई है कि मां भी, बेटा भी, बेटी भी राजनीति में और इसके बाद दामाद जी भी पैड पहनकर और बैट लेकर पेवेलियन में टुकटुकाने लगे हैं। वह बड़ी हसरत के साथ क्रीज की तरफ देखते हुए अपनी सास और साले में से किसी के आउट होने का इंतजार कर रहे हैं!

मेरा मानना है कि राहुल गांधी को किसी साजिश के तहत या अपने मित्र मंडली की बचकानी सलाह पर रायबरेली से उतारा गया है। अगर उनका मकसद उत्तर प्रदेश में अपनी विरासत को बनाए रखने का ही था तो अमेठी से ही चुनाव लड़ते और अमेठी वासियों को अपनी भूल सुधार करने का मौका देते या फिर वाराणसी से मोदी के खिलाफ नामांकन कर सीधे ज्वालामुखी में ही कूद कर शहीद बन जाते! रायबरेली से उन्हें सिर्फ सहानुभूति लहर ही जिता सकती है जो उनके पास नहीं है। मेरा मानना है कि अगर राहुल गांधी रायबरेली से जीत जाते हैं तो यह पूरी भारतीय जनता पार्टी की स्पष्ट पराजय होगी और राहुल गांधी एक महानायक के रूप में उभरेंगे! यूपी, जहां मोदी हैं, योगी हैं, लहर भी है और राहुल के पास कुछ नहीं है सिवाय चमत्कार के, जो होते हैं। अगर किस्मत राहुल गांधी पर मेहरबान हुई तो यह भाजपा की ऐतिहासिक पराजय होगी, अमेठी की सीट से हारे और बगल की सीट से जीत गए?

स्नेह मधुर

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