
जगदंबे का अष्टम स्वरूप
डॉ दिलीप अग्निहोत्री
नवदुर्गा के अष्टम दिवस पर मां गौरी की उपासना होती है-
श्वेत वृषे समारूढ़ा श्वेताम्बरधरा शुचि:।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा॥
महागौरी गौरवर्ण है। इसलिए इन्हें महागौरी कहा गया। उन्होंने कठिन तपस्या से मां ने गौर वर्ण प्राप्त किया था। उन्हें उज्जवला स्वरूपा महागौरी, धन ऐश्वर्य प्रदायिनी, चैतन्यमयी त्रैलोक्य पूज्य मंगला भी कहा गया। वह माता महागौरी है। इनके वस्त्र और आभूषण आदि भी सफेद ही हैं। इनकी चार भुजाएं हैं। महागौरी का वाहन बैल है। देवी के दाहिने ओर के ऊपर वाले हाथ में अभय मुद्रा और नीचे वाले हाथ में त्रिशूल है। बाएं ओर के ऊपर वाले हाथ में डमरू और नीचे वाले हाथ में वर मुद्रा है। इनका स्वभाव अति शांत है। इनकी उपासना से शुभ प्रवृत्त कर्मों का जागरण होता है। सदमार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है। नैतिक व पवित्र आचरण का बोध प्राप्त होता है। सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है-
सर्वसंकट हंत्री त्वंहि धन ऐश्वर्य प्रदायनीम्।
ज्ञानदा चतुर्वेदमयी महागौरी प्रणमाभ्यहम्॥
सुख शान्तिदात्री धन धान्य प्रदीयनीम्।
डमरूवाद्य प्रिया अद्या महागौरी प्रणमाभ्यहम्॥
त्रैलोक्यमंगल त्वंहि तापत्रय हारिणीम्।
वददं चैतन्यमयी महागौरी प्रणमाम्यहम्॥

माता महागौरी– माँ दुर्गाजी की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है। दुर्गापूजा के आठवें दिन महागौरी की उपासना का विधान है। इनकी शक्ति अमोघ और सद्यः फलदायिनी है। इनकी उपासना से भक्तों को सभी कल्मष धुल जाते हैं, पूर्वसंचित पाप भी विनष्ट हो जाते हैं।
मंत्र-
श्वेते वृषे समारूढ़ा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा॥
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी I
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् II
पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च I
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् II
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिताः I
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना II
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