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के.एम. अग्रवाल
सालों से मन में यह बात आती थी कि कभी आत्मकथा लिखूँ। फिर सोचा कि आत्मकथा तो बड़े-बड़े लेखक, साहित्यकार, राजनेता, फिल्मकार, अन्तर्राष्ट्रीय खिलाड़ी, वैज्ञानिक, बड़े-बड़े युद्ध जीतने वाले सेनापति आदि लिखते हैं और वह अपने आप में अच्छी-खासी मोटी किताब होती है। मैं तो एक साधारण, लेकिन समाज और देश के प्रति एक सजग नागरिक हूँ। मैंने ऐसा कुछ देश को नहीं दिया, जिसे लोग याद करें। पत्रकारिता का भी मेरा जीवन महज 24 वर्षों का रहा। हाँ, इस 24 वर्ष में जीवन के कुछ अनुभव तथा मान-सम्मान के साथ जीने तथा सच को सच और झूठ को झूठ कहने का साहस विकसित हुआ। लेकिन कभी लिखना शुरू नहीं हो सका। एक बार पत्रकारिता के जीवन के इलाहाबाद के अनुज साथी स्नेह मधुर से बात हो रही थी। बात-बात में जीवन में उतार-चढ़ाव की बहुत सी बातें हो गयीं। मधुर जी कहने लगे कि पुस्तक के रूप में नहीं, बल्कि टुकड़ों-टुकड़ों में पत्रकारिता के अनुभव को जैसा बता रहे हैं, लिख डालिये। उसका भी महत्व होगा। बात कुछ ठीक लगी और फिर आज लिखने बैठ ही गया।
गतांक से आगे…
‘मेरा जीवन’: के.एम. अग्रवाल: 87:
नीड़ का निर्माण फिर: 15
महराजगंज :
अवरुद्ध विकास
अगर सरकार की नजर में विकास, सड़कों के बन जाने, काफी क्षेत्रों में बिजली के आ जाने, भ्रष्टाचार के निरंतर तेजी से बढ़ते जाने और बेरोजगारी को बढ़ते जाने को कहते हैं, तब तो कहा जा सकता है कि महराजगंज जिले का विकास हुआ है।
लेकिन यहां स्थिति यह है कि पूरे जिले में उद्योग धंधों का अभाव है। कोई ऐसा गांव नहीं है, जिसके बीस पच्चीस युवा रोजगार के लिए बाहर न गये हों। शिक्षा के नाम पर लोग साक्षर भले हो जाएं, लेकिन शिक्षित लोगों का अभाव है।

महराजगंज का स्टेडियम
महराजगंज जनपद भगवान गौतम बुद्ध का क्षेत्र होने के कारण यहां पर्यटन के विकास की भरपूर संभावना है, लेकिन अब तक जनप्रतिनिधियों एवं राज्य सरकारों के रुचि न लेने के कारण इस दिशा में कुछ हो नहीं पा रहा है। यहां देवदह और रामग्राम नाम से दो ऐसे स्थान हैं, जिसे गौतम बुद्ध के ननिहाल के स्थान और उनका अस्थि कलश रखें होने की बात कही जाती है। लेकिन जब तक इन दोनों जगहों की पुरातत्त्व विभाग की ओर से भरपूर खुदाई नहीं होती, ये दोनों स्थान जमीन में दबे हुए हैं। एक बार सन् 1992 में पुरातत्व विभाग ने कुछ खुदाई करवाई, जिससे यह तो स्पष्ट हो गया कि ये दोनों स्थान बौद्ध कालीन हैं।
इस दिशा में यहां के पी. जी. कालेज के सैन्य विज्ञान विभाग के अध्यक्ष रहे डा. परशुराम गुप्त पिछले दसियों साल से लगातार लिखा पढ़ी करते हुए प्रयासरत हैं, लेकिन अभी तक सफलता नहीं मिल सकी है। उन्होंने इस दिशा में अपने शोध कार्य पर आधारित दो पुस्तकें भी लिखी हैं, जिनमें इस संदर्भ में काफी प्रामाणिक सामग्रियां मौजूद हैं।
इस दिशा में यहां 1997 में पुलिस अधीक्षक रहे विजय कुमार ने काफी काम किया। उनकी रुचि पुरातत्त्व के संदर्भ में काफी थी, इसलिए वह जिले में विभिन्न क्षेत्रों में दोरे के दौरान पुरातात्त्विक महत्त्व के स्थलों को देखते और कुछ न कुछ पुरातात्त्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े तथा ईंट आदि उठा लाते। उनके विषय में वह गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग से प्रामाणिक जानकारियां भी इकट्ठा करते। उन्होंने चौकीदारों से भी इस दिशा में काफी सहयोग लिया।
बनरसिहा का पुरातात्विक महत्व का स्थल
विजय कुमार के प्रयास से इस जिले में पुरातात्त्विक महत्त्व की काफी सामग्रियां इकट्ठी हो गयीं। उनका विचार था यहां एक संग्रहालय बनवाना। उनके यहां से चले जाने के बाद 1998 में तत्तकालीन जिलाधिकारी आलोक टंडन ने थोड़ी रुचि दिखाई और यहां के सदर ब्लाक कार्यालय के एक हाल में कुछ पेडेस्टेल आदि बनवाये और इन सामग्रियों को वहां रखवा दिए, लेकिन इन सामग्रियों पर कोई लेबिल (जानकारी) नहीं लगायी जा सकी। कुछ वर्षों तक ये सारी सामग्री बंद हाल में ऐसे ही उपेक्षित पड़ी रहीं। कुछ समय बाद सारी सामग्रियों को जिला मुख्यालय स्थित एक कमरे में डंप कर दिया गया। फिर कुछ समय के बाद पी.जी.कालेज में बात करके वहां के इतिहास विभाग के एक कमरे में इन सामग्रियों को गोदाम के सामानों की तरह दफना दिया गया। उनका क्या हाल है, कोई नहीं जानता और न तो कोई जानने का प्रयास ही करता है।
किसी भी जिले के विकास का एक और माध्यम होता है, आवागमन के साधन के नाम पर ट्रेनों की उपलब्धता। आजादी से पहले यहां गन्ने की अच्छी पैदावार देखकर अंग्रेजों ने फरेंदा, घुघली और सिसवा में चीनी मिलें लगवायीं और गन्ना आदि लाने ले जाने के लिए तीनों मिलों को रेलवे लाइन से गोरखपुर से जोड़ दिया। आजादी के बाद अब से दस पंद्रह साल पहले राज्य सरकार की उपेक्षा के कारण फरेंदा और घुघली की मिलें बंद हो गयीं, जबकि सिसवा की मिल किसी प्रकार चल रही है। एक उद्योगपति ने प्राइवेट क्षेत्र में एक चीनी मिल लगाती, लेकिन वह भी बंद होने जैसी हालत में है। किसानों का करोड़ों रुपए बकाया है।
आजादी के इतने लम्बे समय बाद भी महराजगंज जिला मुख्यालय रेल लाइन से नहीं जुड़ सकता है, जबकि हर बार लोकसभा चुनाव के दौरान उम्मीदवार जीत जाने पर रेल लाइन लाने की बात करते हैं। जिले में धान की अच्छी पैदावार होती है, लेकिन इससे जुड़ा हुआ भी कोई उद्योग यहां नहीं है।
मुझे तो महराजगंज जनपद का औद्योगिक विकास न हो पाने का मुख्य कारण राजनीतिक प्रयास का अभाव तथा जनप्रतिनिधियों द्वारा लगातार इसकी उपेक्षा लगता है।
खेल कूद के मामले में भी जिले का कोई नाम नहीं है। वर्षों पूर्व यहां स्टेडियम तो बन गया लेकिन शायद ही कभी दो कोच से अधिक यहां नियुक्त रहते हों। बरसात के दो महीने तो स्टेडियम तालाब बना रहता है। कुछ करोड़ रुपए लगाकर बैडमिंटन हाल बन गया, लेकिन कभी कोई कोच यहां नियुक्त नहीं हो सका।
जिले में स्थित सभी राजकीय कालेजों में शिक्षकों का सर्वथा अभाव रहता है। यही स्थिति आई.टी.आई.की है।

क्रमशः 87
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