रहबर क़बीरज़ादा
(डा. शिव प्रसाद तिवारी)

ज्ञान की गंगा लिये,
अपने कमण्डल में।
फिर रहा हूँ मैं युगों से,
इस भूमंडल में।
मैं वायोर्विद मैं हूँ चार्वाक,
मैं तथागत बुद्ध हूँ।
मैं तो हूँ शम्बूक,
और मैं ही हिरण्यकश्यप भी हूँ।
मैं कहा करता हूँ सब से,
कि ये जीवन मूल्यवान है।
ये जीवन तो महान है।
इसका मूल्य बडा है।
इसको समझो तुम,
करो बस कर्म,
कर्मो में परिणाम निहित है।
दैव दैव मत करो,
ये तुमको भरमायेगा।
बिना कर्म,
क्या कुछ भी तेरे हाँथ आयेगा।
हे मेरे कर्म हीन पुत्रो,
तुम आओ,
बनो प्रहलाद।
मेरा बध करवाने का कोई यत्न करो।
कोई तो करो षडयंत्र,
कुछ उसमें रंग भरो।
काम कुछ करो,
या काम कुछ करवाओ।
मेरा बध करो,
या कि बध करवाओ।
मैं मर जाऊं तो कह देना
कि तुमने नहीं है मारा मुझको।
यह तो दैव योग था।
दैवीय दर्शन,
ऐसे में ही तो काम आता है।
कौन भला फिर,
अपनों का बध कर पछताता है।
मैं तो हूँ गौतम बुद्ध,
तथागत बुद्ध।
मैने ही तो कहा,
कि ईश्वर कल्पन है।
तुम ही स्वयं ईश्वर हो।
इधर उधर मत भटको,
बात को समझो।
अपने अन्दर तुम झांको।
वह जिसको तुम ढूंढ रहे हो,
सहज ही मिल जायेगा।
यही तुम्हारा सत्य तुम्हें ढूंढेगा,
ढूंढ कर मुक्ति दिखलायेगा।सविनय आग्रह मेरा,
यह अपराध अगर है,
तो फिर आओ,
मेरे बनो अनुयायी।
जीतो फिर विश्वास हमारा,
आओ मेरे समीप,
प्यार दिखलाओ
फिर मेरा प्राण हरण,
सहज ही हो जायेगा।
धीरे से विष पान करा देना,
काम बन जायेगा।
तुम हो जिसके मीत वो खुश हो जायेंगे,
देकर तुम्हें इनाम बहुत गुन गायेंगे।
हे मेरे अनुयायी,
शत्रु के भाई,
तुम आओ मुझे विष पान कराओ।
हे मेरे शुभचिंतक,
छिपे हुये निन्दक,
तुम आओ मुझे विष पान कराओ।
हे गुरुकुल के कंटक,
सामाजिक संताप,
आस्तीन के सांप।
तुम आओ मुझे विष पान कराओ।
मैं तो हूँ शम्बूक,
शूद्र का पुत्र,
एक मैं मानव हूँ।
मैंने देखा है दैन्य,
भुखमरी का मंज़र भी।
मैंने देखा है गोबर से अन्न बीनती मांओं को,
भूख से बिलखते बच्चों को।
मैंने लोगों का यूँ ही मरना देखा है,
कभी भूख से और कमी लाचारी से।
मैंने बच्चों का यूँ ही मरना देखा है,
कभी महामारी से कभी बीमारी से।
पंडित जन कहते हैं,
कि लोग मरा करते है सिर्फ शापित होने से।
आशीर्वाद कारण होता है,
जीवन में सुख पाने का।
और शाप होता है कारण,
जीवन सुख खो जाने का।
दर्शन उनका यह कहता है,
सारा जन यह सहता है,
कि मृत्यु अकारण भी होती है।
कहते हैं,
हर कार्य के पीछे,
कोई तो कारण होता है।
कारण बिना कार्य होता ना।
फसल न होती,
यदि किसान बीज बोते ना।
यही प्रकृति का नियम अगर शास्वत ठहरा है।
सिर तुम्ही बताओ,
इसमें राज क्या तो गहरा है।
क्या तो है शापन,
क्या तो है शापित होना।
भला शाप से मृत्यु कहीं होती है।
कभी अकारण मृत्यु नहीं होती है।
यही नियम शास्वत है,
मैं इसका दीवाना हूँ।
यही नियम है परम,
हमारे विद्यालय का।
सतत अध्ययन,
सतत शोध बस इसी विषय का।
मैं ही शिक्षक हूँ,
मैं ही क्षात्र मैं ही कक्षा हूँ।
यही हमारा विद्यालय है,
मैं ही इसका शिक्षार्थी बच्चा हूँ।
यदि यही हमारा कर्म पाप तुमको लगता है,
फिर आओ मेरे राम,
राम राजा तुम आओ।
करो हमारा बध,
और उस बध को,
सर्वथा अपरिहार्य और वैधानिक ठहराओ।
कर्मवाद है धर्म हमारा,
मैं तो परम धर्मी हूँ।
ज्ञान गंग में सतत नहाता,
मैं नहीं विधर्मी हूँ।
मैं ब्रम्ह का साधक,
ब्रम्ह का वाहक हूँ।
ब्रम्ह प्रकृति का अंग
प्रकृति का भाग है।
ब्रम्ह प्रकृति का हेतु
प्रकृति की आग है।
मैं तो हूँ आग
आग का संवाहक हूँ।
मैं तो द्विज हूँ,
कर्म से द्विज हूँ,
द्विज ही द्विज हूँ ।
हे राम हमारे राम,
मर्यादित श्री राम
पुरुषों में उत्तम मर्यादा पुरुषोत्तम,
भगवान परम,
श्री राम तुम आओ।
मुझे कहो अपराधी,
दण्ड का भागी शूद्र ठहराओ।
बध करो हमारा प्रश्न प्रश्न रख जाओ।
बध करो हमारा प्रश्न प्रश्न रख जाओ।
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