
वह भारत जो कभी था
मानसी प्रसाद
पुणे (महाराष्ट्र)
हिंदू धर्म, संस्कृति और समाज- जो आज है, वह हमारे अतीत की परछाई भर भी नहीं है। हमारा अतीत यह है कि हम कभी समस्त विश्व के सम्मान एवं श्रद्धा के केंद्र थे। हम अतीत में क्या थे, यह जिक्र करने का आशय यह कहना नहीं है कि ” हमारा हाथ सूंघो, हमारे दादा ने घी खाया था।”
हमारा आशय यह है कि आज भी हम वही हैं जो अतीत में थे और आज की हमारी अज्ञानता, पिछड़ापन, दिग्भ्रमित सोच आदि करीब एक हजार साल की हमारी गुलामी का नतीजा है।
आइए देखते हैं- विदेशियों की नजर से हम अपना अतीत (क्योंकि वह निष्पक्ष होगा) और उसी को पुनः पाने की कोशिश करें।
विश्व के शीर्ष वैज्ञानिक और चिंतक आइंस्टीन ने कहा था-” विश्व भारत का एहसानमंद है कि भारत ने उसे गिनती सिखाई।”अर्थात गिनती विश्व को भारत की देन है।
वेदों के अमेरिकी अध्येता विलियम जेम्स ने लिखा है कि ” विश्व को सर्जरी, औषधि, संगीत, भवन निर्माण आदि का परिचय वेदों के माध्यम से भारतीय मनीषियों ने ही दिया है।”
अमेरिकी विद्वान विलियम टॉरेंट अपनी पुस्तक ‘स्टोरी ऑफ सिविलाइजेशन ‘ में लिखते हैं कि “मानवता की जन्मभूमि भारत है। भारत माता हम सब की मां है।”
जर्मन विद्वान मैक्स मूलर अपनी पुस्तक ‘ सैक्रेड बुक्स ऑफ ईस्ट ‘ में लिखते हैं कि ” दुनिया का अगर कोई देश समृद्धि, शक्ति और सौंदर्य से भरपूर है और जिसे धरती का स्वर्ग कहा जा सकता है तो वह भारत है।” विश्व प्रसिद्ध अमेरिकी लेखक मार्क ट्वेन ने भारत को मानव सभ्यता का उद्गम बताया है। उन्होंने कहा है कि “अतिथि देवो भव ” दुनिया की किसी और संस्कृति में है क्या?
जैसा मैंने पहले ही कहा है कि मेरा आशय अतीत की उपलब्धियों से गौरवान्वित होना नहीं है बल्कि अपनी हीन भावना से मुक्त होकर अपने उस गौरव को पुनः प्राप्त करने के लिए प्रेरित करना है।
जहां पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने कहा था कि “भारतीय संस्कृति ने विश्व को बहुत कुछ दिया है”- वहीं ब्रिटिश पत्रकार मार्क टुली ने कहा था कि ” अगर मैं हिंदू होता तो धन्य हो जाता।” श्री टुली ने कहा-” मैं एक ईसाई हूं और उससे पूरी तरह संतुष्ट हूं लेकिन हिंदू संस्कृति तो अद्भुत है।”
ब्रिटिश विद्वान जेम्स ग्लेयर ने कहा था कि “यह कितनी चिंता की बात है कि भारतीय अपने अद्भुत विरासत वैदिक गणित से अनभिज्ञ हैं। वैदिक गणित की तमाम विशेषताओं को बताते हुए उन्होंने कहा था-” जब सभी पश्चिमी देश गुमनामी में डूबे हुए थे तब इसी गणित से भारतीय मनीषी सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण की सही तिथि बता देते थे।”
टर्की के कभी राष्ट्रपति रहे बुलेन्ट इसविल (जो मुस्लिम थे)ने कहा था कि “जब कभी बहुत निराश होता हूं तो भगवद्गीता पढ़ता हूं। उससे मुझे बहुत शांति मिलती है।” 11 वीं सदी के प्रारंभ में भारत आया मुस्लिम पर्यटक अलबरूनी ने भी लिखा है कि “गीता भारत की विश्व को अमूल्य देन है।”
1998 में विश्व बैंक ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा था-” भारतीय, दुनियां का सबसे प्रतिभाशाली समुदाय है।”
बहुत बड़ी संख्या में अरब तथा यूरोपीय यात्रियों, विद्वानों आदि ने भारत के बारे में लिखा है। उन सब का उल्लेख यहां संभव नहीं है।
सबसे रोचक वक्तव्य ब्रिटिश विद्वान थॉमस मुनरो का है। जब ब्रिटिश राजनेता कह रहे थे कि हमारा उद्देश्य भारत पर शासन करना नहीं बल्कि भारतीयों को सभ्य बनाना है तो उसी देश के श्री मुनरो ने कहा था कि ” मैं नहीं समझता कि हमारे पास कुछ ऐसा है कि हम भारतीय संस्कृति में जोड़ सकें। लेकिन अगर सभ्यताओं का व्यापार हो सके तो हमें कुछ सभ्यता भारत से आयात कर लेनी चाहिए।”
दुनिया में एकमात्र भारतीय धर्म, संस्कृति और आस्था ही ऐसी है जो पूर्ण रूप से वैज्ञानिक है। महिलाओं के माथे पर बिंदी से लेकर पुरुषों के सर पर चोटी तक- इन सब के पीछे विज्ञान है। सी.डी.आर.आई. लखनऊ के वैज्ञानिक आमिर नाजिर ने हिंदुओं के व्रत- उपवास, उनका समय और उनमें निर्धारित खानपान को पूर्ण वैज्ञानिक बताते हुए स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभदायक बताया है।
इसके अलावा अभी कुछ वर्ष पूर्व अमेरिका में गोमूत्र पर रिसर्च किया गया तो उसमें अद्भुत औषधीय गुण पाया गया और उसे अमेरिका ने पेटेंट करा लिया। वहां वैज्ञानिकों ने पाया कि गोमूत्र से कैंसर, फंगल इन्फेक्शन आदि की दवाएं बनाई जा सकती हैं और उसमें एंटीबायोटिक गुण पाए जाते हैं। (पेटेंट 2002 में हुआ था)।
यहां यह बता दें कि अमेरिका में तो अब शोध हुआ है, भारत में तो हजारों वर्ष पूर्व लिखित ऋग्वेद में इन्हीं तथा अन्य गुणों के कारण गाय को पूज्य और अवध्य माना गया था।
आज के बौद्धिक और तार्किक युग में बिना तर्क और प्रमाण या अन्ध देशभक्ति के नाम पर किसी भी कथन पर विश्वास करना कठिन है लेकिन आधुनिकता एवं तथाकथित प्रगतिशीलता के कारण अपने गौरवपूर्ण अतीत को नकारना भी उचित नहीं है। इसीलिए मैंने जो भी उद्धरण दिए, विदेशी विद्वानों और विशेषज्ञों के दिए।
हमारे उपनिषदों और पुराणों में अत्यंत दूरस्थ जगहों के नाम या विवरण मिलते हैं। विश्व के जाने-माने भूगोल शास्त्री श्री विलफोर्ड ने हमारे उपनिषदों और पुराणों का अध्ययन करके उसमें अफ्रीका तक का वर्णन किया है और प्राचीन भारत का अफ्रीका तक से परिचय दिखाया है जब कि शेष विश्व अफ्रीका को जानता भी नहीं था। स्वाभाविक है कि उस महाद्वीप या अन्य स्थानों के नाम वर्तमान नाम तो होंगे नहीं लेकिन भौगोलिक विवरण से परिचय मिलता है। अतः गहन अध्ययन करना पड़ेगा।
इस दृष्टि से भी अगर हमारे प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन किया जाए तो मानव सभ्यता पर नया प्रकाश पड़ेगा।
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मानसी प्रसाद एक पर्यावरण एक्टिविस्ट हैं। इसके अतिरिक्त वे प्राचीन भारत, वैदिक कालीन भारत और भारतीय संस्कृति की गहन अध्येता हैं। अपने शोध और अध्ययन से इन्होंने स्थापित किया है कि देश में विभिन्न स्थानों पर खुदाई में जो अवशेष प्राप्त हो रहे हैं जिसे हड़प्पा कालीन कहा जा रहा है, वास्तव में वे महाभारत कालीन अवशेष हैं।
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