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‘मेरा जीवन’: के.एम. अग्रवाल: 44:  श्याम कृष्ण पांडेय

के.एम. अग्रवाल

सालों से मन में यह बात आती थी कि कभी आत्मकथा लिखूँ। फिर सोचा कि आत्मकथा तो बड़े-बड़े लेखक, साहित्यकार, राजनेता, फिल्मकार, अन्तर्राष्ट्रीय खिलाड़ी, वैज्ञानिक, बड़े-बड़े युद्ध जीतने वाले सेनापति आदि लिखते हैं और वह अपने आप में अच्छी-खासी मोटी किताब होती है। मैं तो एक साधारण, लेकिन समाज और देश के प्रति एक सजग नागरिक हूँ। मैंने ऐसा कुछ देश को नहीं दिया, जिसे लोग याद करें। पत्रकारिता का भी मेरा जीवन महज 24 वर्षों का रहा। हाँ, इस 24 वर्ष में जीवन के कुछ अनुभव तथा मान-सम्मान के साथ जीने तथा सच को सच और झूठ को झूठ कहने का साहस विकसित हुआ। लेकिन कभी लिखना शुरू नहीं हो सका।

एक बार पत्रकारिता के जीवन के इलाहाबाद के अनुज साथी स्नेह मधुर से बात हो रही थी। बात-बात में जीवन में उतार-चढ़ाव की बहुत सी बातें हो गयीं। मधुर जी कहने लगे कि पुस्तक के रूप में नहीं, बल्कि टुकड़ों-टुकड़ों में पत्रकारिता के अनुभव को जैसा बता रहे हैं, लिख डालिये। उसका भी महत्व होगा। बात कुछ ठीक लगी और फिर आज लिखने बैठ ही गया।

गतांक से आगे…

सफर के साथी: 14

लगभग 12 वर्ष तक इलाहाबाद में प्रवास के दौरान पत्रकारिता से जुड़े अनेक ऐसे चेहरे हैं, जिनसे मुलाकात हो या न हो, वे प्रायः याद आते हैं। उनके बारे में भी लिखना अच्छा लगता है कि कौन कहाँ से आया और उसकी यात्रा कहाँ तक पहुँची ? इनमें कई ऐसे लोग भी हैं, जिनके बारे पर्याप्त जानकारी के अभाव में नहीं लिख पा रहा हूँ।

श्याम कृष्ण पाण्डेय

आजादी की कोख से जन्मे श्याम कृष्ण पाण्डेय, इलाहाबाद की जमीन पर छात्र-युवा आंदोलन से लेकर राजनीतिक, सामाजिक उथल-पुथल दौर में लगातार आंदोलन और संघर्ष से ही गुजरते रहे। कांग्रेस में रहते हुए भी समाजवादी विचारधारा के कारण कभी ठीक से फिट नहीं हो सके, जिस कारण नदी की धारा में लगातार तैरते रहना ही इनके हिस्से में पड़ा। शायद ये भी आज राजनीति की किसी ऊँची कुर्सी पर रहते, लेकिन स्वाभिमान सदैव आड़े आता रहा, जिस कारण कभी झुककर इन्होंने समझौता नहीं किया।

मेरे पत्रकार जीवन का बड़ा हिस्सा इलाहबाद में ही बीता। ‘मेरा जीवन‘ लिखते समय जहाँ कुछ ‘हम सफर’ याद आते रहे और उनपर लिखता रहा, तो सोचा कि शुरू-शुरू में जब इलाहाबाद आया तो श्याम कृष्ण पाण्डेय ही एक ऐसे व्यक्ति थे, जिनसे मैं पूर्व परिचित था और जो सही मायने में अघोषित रूप से मेरे बड़े भाई और संरक्षक के रूप में रहे। मैं जानता था कि कभी ऐसी-वैसी कोई समस्या मेरे सामने आयेगी तो इनका हाथ मेरी ओर बढ़ेगा। इस प्रकार पाण्डेय जी इलाहाबाद में मुझसे हमेशा जुड़े रहे, भले ही कई-कई दिनों के बाद मुलाकात क्यों न हो ?

श्याम कृष्ण पाण्डेय मूल रूप से इलाहाबाद के हंडिया क्षेत्र के निवासी हैं। इनके बाबा पं. राम सुन्दर पाण्डेय काफी पहले इलाहाबाद आकर बस चुके थे। वह दो बार 1920 और 1932 के स्वतंत्रता आंदोलन में गिरफ्तार होकर लम्बे समय तक जेल में रहे। पं राम सुन्दर पाण्डेय के पुत्र  पंडित राम अभिलाष पाण्डेय भी पिता के बताये रास्ते पर चले और 1942 के आंदोलन में अकेले ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार के साथ जेल गये, जिनमें उनके भाई आदि सम्मिलित थे। उनके भाई पं. राम सेवक पाण्डेय आजादी के आंदोलन को जारी रखने के उद्देश्य से बम्बई चले गये, लेकिन वहाँ फिर गिरफ्तार कर लिए गये और जेल गये।

बताया जाता है कि जब पं राम अभिलाष पाण्डेय जेल गये, उसके कुए दिन बाद ही नवम्बर, 1942 में श्याम कृष्ण पाण्डेय का जन्म हुआ। थोड़ा बड़े होने पर उन्होंने देखा कि चारों ओर देश की आजादी की लड़ाई का माहौल है और पूरा परिवार उसके पीछे दीवाना है। निश्चित ही ऐसे परिवार में पैदा हुआ कोई भी व्यक्ति कायर अथवा समझौतावादी तो हो नहीं सकता। यही कारण रहा कि इंटर की पढ़ाई के बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय में आते-आते ये छात्र समस्याओं को लेकर छात्र आंदोलन में कूद पड़े। बी.ए. प्रथम वर्ष के दौरान ही 1961-62 में छात्रसंघ के उपाध्यक्ष हो गये। और फिर अगले साल ही 1962-63 में छात्रसंघ के अध्यक्ष हो गये। 

छात्रों की समस्याओं और हित के मामलों को लेकर ये इतने जुझारू और आक्रामक राजनीति करने लगे कि विश्विद्यालय प्रशासन को एकबार इन्हें विश्वविद्यालय से निष्कासित भी करना पड़ा। इन्होंने किसी प्रकार एल.एल.बी., एल.एस.जी.डी.किया और फिर लगभग तीन वर्षों तक लोअर कोर्ट और हाईकोर्ट में प्रैक्टिस भी करते रहे। एम.ए. पहला साल करते समय कुछ ऐसी कठिनाइयां आयीं कि पढ़ाई आगे जारी नहीं रख सके। उन्हीं दिनों समाजवादियों के आंदोलन में भाग लेने के कारण जेल भी जाना पड़ा।

इस दौरान श्याम कृष्ण पाण्डेय की इलाहाबाद के ही जुझारू नेता और स्वतंत्रता सेनानी सालिग राम जायसवाल से काफी निकटता रही और उनके साथ स्वयं भी आंदोलनों में शामिल रहते रहे। फिर चन्द्रशेखर सिंह से भी काफी निकटता हो गयी।

1971 आते-आते समाजवादियों ने देखा कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी प्रिवीपर्स की समाप्ति और बैंकों के राष्ट्रीयकरण जैसे कदम उठा रही हैं तो उन्हें लगा कि अब इंदिरा जी समाजवाद की ओर बढ़ रही हैं, तो सालिग राम जायसवाल और चन्द्रशेखर सिंह के साथ श्याम कृष्ण पाण्डेय भी कांग्रेस में आ गये।


उन दिनों कमलापति त्रिपाठी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और डा.राजेंद्र कुमारी बाजपेयी प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष हुआ करती थीं। श्याम कृष्ण पाण्डेय के जुझारू तेवर को देखते हुए इंदिरा जी के निर्देश पर इन्हें उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी का संगठन मंत्री बना दिया गया। उन दिनों कांग्रेस पार्टी और राजनीति में भी संगठन मंत्री का काफी महत्व और रुतबा हुआ करता था। लेकिन जल्द ही कांग्रेस में आये समाजवादियों और प्रदेश अध्यक्ष राजेंद्र कुमारी बाजपेयी के बीच कार्यप्रणाली को लेकर काफी मतभेद रहने लगा। परिणामस्वरूप श्याम कृष्ण पाण्डेय ने एक साल बाद ही 1972 के अंत में संगठन मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।

थोड़ा समय इधर-उधर करके बीता और 1974 का वह समय आ गया जब प्रदेश में पी.ए.सी. विद्रोह हो गया। कमलापति त्रिपाठी को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। बताया जाता है कि उस समय सालिग राम जायसवाल के साथ 32 विधायक थे और सालिग राम जी चाहते थे कि हेमवतीनंदन बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाया जाय, जो उन दिनों केन्द्र में संचार राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) थे। 32 विधायकों का यह आँकड़ा इंदिरा जी के लिए भी भारी था और अंततः वह बहुगुणा जी को मुख्यमंत्री बनाने के लिए सहमत हुईं।

बहुगुणा जी के मुख्यमंत्री बनते ही प्रदेश की न सिर्फ राजनीति में बल्कि कार्य करने के तरीके में भी काफी तेजी आयी। अधिकारियों को अपने काम में काफी चुस्त-दुरुस्त होना पड़ा। एक घटना का जिक्र कर दूँ। उन दिनों मैं भी लखनऊ में ही स्वतंत्र भारत अखबार में स्टाफ रिपोर्टर था। लखनऊ के किराना व्यापारियों ने सरसों के तेल का दाम 5 रू लीटर से 50 पैसे बढ़ाना चाहते थे, लेकिन बहुगुणा जी ने ऐसा नहीं करने दिया। आज सोचता हूँ, किसी भी चीज का दाम कितना भी बढ़ जाय, मुख्यमंत्री उधर ध्यान ही नहीं देता।


1974 में ही बहुगुणा जी इलाहाबाद के बारा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने चले गये। श्याम कृष्ण पाण्डेय चुनाव संचालक बनाये गये। बहुगुणा जी का जीतना तो निश्चित ही था और चर्चा होने लगी कि चुनाव बाद श्याम कृष्ण पाण्डेय के लिए भी कोई नया दरवाजा खुले।

लेकिन इसी बीच आजमगढ़ के कल्पनाथ राय का पदार्पण हो गया, जो 1961-62 में गोरखपुर विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष हुआ करते थे और जिन्हें कांग्रेस में लाने में श्याम कृष्ण पाण्डेय ने भी काफी प्रयास किया था। दोनों के संबंध छात्र जीवन से ही काफी अच्छे थे। इस चुनाव प्रचार कार्य में मैं भी आया हुआ था और रात में कल्पनाथ राय वाले कमरे में ही कुछ अन्य लोगों के साथ सोता था और दिन में सबके साथ बारा क्षेत्र में निकल जाता था। कल्पनाथ राय स्वयं में काफी नाटकीय आदमी थे और मैं उन्हें 1962 में तब से जानता था, जब वह गोरखपुर विश्वविद्यालय में छात्रसंघ अध्यक्ष थे और मैं 11वीं कक्षा में पढ़ता था। चुनाव के दौरान रात में नींद का बहाना करके कल्पनाथ राय जानबूझकर ‘बहुगुणा जी जिन्दाबाद’ बड़बड़ाते थे। लोगों ने इस बात को बहुगुणा जी तक पहुँचाया और इस बात ने संभवतः बहुगुणा जी को प्रभावित भी किया।

बताया जाता है कि कभी बहुगुणा जी ने कहा था कि जब भी उन्हें मौका मिलेगा, तो श्याम कृष्ण पाण्डेय का नाम पहला होगा। लेकिन बारा का चुनाव जीतने के बाद जब राज्यसभा में किसी को भेजने की बात आयी तो कुछ ऐसी राजनीतिक गोटी बैठी कि कल्पनाथ राय का नाम आगे हुआ और इंदिरा जी ने अपनी सहमति दे दी।

उन दिनों चन्द्रजीत यादव और राजनारायण, इंदिरा जी के काफी पीछे पड़े रहते थे और लगा कि कल्पनाथ राय का नाम आगे बढ़ा दिया जाय तो वह उन लोगों को उन्हीं की भाषा में जवाब दे सकेंगे। उन दिनों राजनारायण कांग्रेस को बहुत गालियाँ दिया करते थे। और फिर कल्पनाथ राय राज्यसभा में सांसद हो गये।

और फिर 1975 का वह दिन भी आया जब राजनारायण की चुनाव याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आया और इन्दिरा जी का चुनाव रद्द हो गया। फिर तो वह हुआ जो हमेशा के लिए कड़ुआहट बन गया। इन्दिरा जी ने देश में आपातकाल घोषित कर दिया।

1977 आत-आते जब जगजीवन राम, हेमवतीनंदन बहुगुणा और श्यामा नंदन मिश्र आदि ने कांग्रेस छोड़ा तो उन्ही के साथ-साथ श्याम कृष्ण पाण्डेय ने भी कांग्रेस छोड़ दिया। इस समय तक पाण्डेय जी अभी काफी युवा थे, लेकिन उन्हें लगा कि राजनीति में इधर-उधर भटकने से अच्छा अपने लिए कोई एक स्थाई जगह बनाना अधिक उचित होगा। और वह इलाहाबाद स्थित हिन्दी साहित्य सम्मेलन में महत्वपूर्ण सचिव के पद पर आ गये, जिससे आज तक जुड़े हुए हैं।

हिन्दी साहित्य सम्मेलन से जुड़ने के बाद से श्याम कृष्ण पाण्डेय में काफी बदलाव आया। वह फिर किसी राजनीतिक पार्टी से नहीं जुड़े और न ही राजनीतिक रूप से किसी मंच पर ही चढ़े। हाँ, चूकि वह समाजवादी विचारधारा के हैं, तो ऐसे आंदोलनों से जुड़े रहे, जहाँ आम आदमी की बात होती है, जहाँ सांप्रदायिकता के विरुद्ध बात होती है, जहाँ युवकों की बेरोजगारी की बात होती है या जहाँ सरकार की गलत नीतियों पर बात होती है। उनकी ऊर्जा में कहीं कोई कमी नहीं आयी है।

सम्मेलन में रहते हुए उन्होंने सम्मेलन की 60 से अधिक पुस्तकों का संपादन किया, जो स्वयं में काफी गंभीर कार्य था। इस बीच उन्होंने सम्मेलन के वार्षिक समारोहों तथा अन्य गतिविधियों के संदर्भ में देश-विदेश की काफी यात्रायें भी की हैं।

समाजवादी युवजन सभा को धार देने वाले तथा युवजन आंदोलन को एक नयी दिशा देने वाले पाण्डेय जी वर्ष 2000 आते-आते अपनी बाहरी गतिविधियों को कम करके स्वयं को लेखन की ओर मोड़ दिया। दिल में देश की आजादी का आंदोलन, छात्र समस्या, युवा बेरोजगारी को लेकर आग तो जल ही रही थी, पाँच-छह साल की लगातार मेहनत और शोध कार्य सेभारतीय छात्र आंदोलन का इतिहास ‘ ग्रन्थ की रचना कर डाली। 1600 पृष्ठ के दो खण्डों में लिखे इस ग्रंथ का प्रकाशन 2008 में हुआ तथा इसका लोकार्पण दिल्ली के स्पीकर हाल में राम बहादुर राय, सतपाल मलिक, नीतीश कुमार, प्रफुल्ल कुमार महंत, रविशंकर प्रसाद, गोविंदाचार्य, डा.मुरली मनोहर जोशी, प्रभात जोशी, सुभाष कश्यप और जनेश्वर मिश्र आदि जैसे प्रबुद्धजनों की मौजूदगी में हुआ। दर्शक, श्रोता के रूप में बड़ी संख्या में छात्र और युवा हाल में मौजूद थे।

इस ग्रंथ का पहला खण्ड, ‘स्वाधीनता का दौर‘ और दूसरा खण्ड ‘स्वतंत्रता के बाद है। बताते हैं कि भारत में आजादी के पहले से लेकर बाद तक छात्र आंदोलन पर अपने आप में यह अकेला और अनूठा ग्रंथ है, जिसका अध्ययन कर चार छात्र अब तक अपनी पीएच.डी. पूरी कर चुके हैं। वर्तमान में झूसी स्थित गोविंद वल्लभ पंत संस्थान में एक छात्र इस ग्रंथ पर शोध कार्य कर रहा है।

श्याम कृष्ण पाण्डेय ने अपने आपको अब लेखन कार्य में ही समर्पित कर दिया है। इस कारण 2019 में उनकी दूसरी पुस्तक ‘ युवा पहल : संघर्ष और आजादी’
प्रकाशित हो गयी। इसका भी विमोचन हिमांचल प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार और प्रो.सूर्य कुमार दीक्षित ने संयुक्त रूप से किया। इस पुस्तक में भारत की शिक्षा व्यवस्था, छात्रों को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर हुए सम्मेलनों की पूरी रिपोर्ट तथा शिक्षा को लेकर महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, सुभाष चन्द्र बोस तथा मोहम्मद अली जिन्ना आदि तक के सम्मेलनों आदि में दिये गये भाषण संग्रहित हैं।

पाण्डेय जी के दो भागों में लिखे जा रहे एक उपन्यास का पहला भाग प्रेस में है, जबकि दूसरा भाग अभी लिखा जा रहा है। यह उपन्यास भी आजादी के पहले और बाद के परिवेश पर आधारित है।

बागवानी का शौक

श्याम कृष्ण पाण्डेय का बागवानी का शौक कोई साधारण शौक नहीं है, बल्कि इलाहाबाद के रसूलाबाद क्षेत्र में गंगा तट पर बने आवास से लगे लगभग सवा एकड़ जमीन पर फैला अपने आप में पौधों पर केन्द्रित शोधशाला है। इसकी चर्चा दूर-दूर तक है क्योंकि इसमें 27 नक्षत्र, नवग्रह, रूद्राक्ष, कल्पवृक्ष, काफी, सुपारी और नारियल आदि वृक्ष तथा वनस्पतियाँ हैं। प्रायः लोग यहाँ आयुर्वेदिक दृष्टि से लाभकारी पौधों की तलाश में भी आते हैं। इन्होंने अपने बागीचे में देश के कई राज्यों से तरह-तरह के पौधे लाकर लगा रखा है। गर्मी और जाड़े के दिनों में फूलों की अलग ही बहार रहती है।

परिवार

श्याम कृष्ण पाण्डेय जी काफी पहले ही बच्चों संबंधी पारिवारिक जिम्मेदारी से मुक्त हो चुके हैं। उनकी पत्नी श्रीमती किरन बाला पाण्डेय शुरू से शिक्षा क्षेत्र से जुड़ी रहीं और माध्यमिक शिक्षा के उप निदेशक पद से अवकाश ग्रहण किया। उसके बाद भी वह 2000 से 2004 तक मानव संसाधन मंत्रालय के राष्ट्रीय मुक्त शिक्षा केन्द्रों से जुड़ी योजना क्षेत्रीय निदेशक के रूप में कार्यरत रहीं, जिसके अधीन पाँच राज्यों में चल रहे कार्यों को संचालित करना होता था।


इनकी दो लड़कियों में एक एम.टेक. करके किसी अच्छी कम्पनी में हैं, जबकि दूसरी लड़की इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं। इनके लड़के पवन शंकर की लाइन बिलकुल ही बदल गयी। वह फिल्म क्षेत्र में हैं और अब तक अभिनय के क्षेत्र में अपनी अच्छी पहचान बना चुके हैं। शुरू में इन्होंने ‘सिद्धांत‘ नाम से एक सीरियल किया, जो कई देशों में प्रदर्शित हुआ और इन्हें अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बेस्ट ऐक्टर का पुरस्कार मिला। बाद में तीन-चार सीरियल और किये। इसके बाद ‘आधे-अधूरे से हम’ शीर्षक से आधे घंटे की लघु फिल्म में काम किया। अमरीका में उन्हें इस फिल्म के लिए बेस्ट ऐक्टर का पुरस्कार मिला। इस फिल्म को 33 पुरस्कार मिल चुके हैं। इसी प्रकार अनुपम खेर के साथ एक फिल्म बनायी ‘भट्टी की छुट्टी’।

पवन शंकर इन दिनों अजय देवगन की फिल्म ‘ भुज : द प्राइड आफ इंडिया ‘ में अजय देवगन के अपोजिट सेकेण्ड रोल में हैं। इस फिल्म में संजय दत्त, सोनाक्षी सिन्हा और नूरा पाटेहा एक नयी अभिनेत्री हैं। फिल्म लगभग पूरी हो चुकी है।

पाण्डेय जी का बड़ा लड़का विवेक टेबिल टेनिस का राष्ट्रीय चैम्पियन बनने के बाद विदेश दौरे पर जाने की तैयारी में था कि अचानक 18 वर्ष की आयु में ही ब्रेन हेमरेज से उसकी मृत्यु हो गयी।

अस्सी के निकट पहुँच रहे पाण्डेय जी अब तो लेखन कार्य में व्यस्त रहते हुए पत्नी के साथ गंगा किनारे प्रकृति के बीच, आनंद का जीवन जी रहे हैं। राजनीति की चर्चा करने पर कहते हैं,‘ वहाँ अब बहुत गंदगी और झूठ है।’ सोशल मीडिया से भी अब अपने आपको थोड़ा दूर कर लिया है, क्योंकि वहाँ भक्त गाली-गलौज पर उतर आते हैं।

क्रमशः 45

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