
“कलम का सिपाही: मुंशी प्रेमचंद” विषय पर आयोजित संगोष्ठी
प्रयागराज।
“प्रेमचन्द खबरों के कथाकार थे। उनकी कहानियों में समाज और समय का सच लोगों को खबरदार करता हुआ प्रस्तुत होता था। उनकी कहानियां आज भी उतनी ही जीवंत जान पड़ती हैं, जितनी कि उनके अपने समय में थीं। उनकी कहानियों में हम अपने आपको सहजता से खोज सकते हैं।“
यह बात वरिष्ठ पत्रकार व इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मीडिया के अध्यापक डॉ. धनंजय चोपड़ा ने कही। डॉ. चोपड़ा शाश्वत मंच द्वारा प्रेमचन्द की जयंती पर “कलम का सिपाही: मुंशी प्रमेचन्द “ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में विचार व्यक्त कर रहे थे।
डॉ. चोपड़ा ने कहा कि आजादी की लड़ाई के समय वे और महात्मा गांधी एक दूसरे के पूरक बन गए थे। वे अपने देश के लोगों को मनोभावों की मजबूती देकर सहयोग व सहचर्य का वह वातावरण तैयार करते थे और सच व अहिंसा के सहभागी बन महात्मा गांधी के संग चल पड़ने को प्रेरित करते थे।
लेखक व निर्देशक विजय पण्डित ने कहा कि प्रेमचन्द ने अपनी कहानियों के माध्यम से रंगमंच को मजबूत किया है। वे अपने समय के ही नहीं बल्कि हर समय के बड़ा कथाकार हैं।
वरिष्ठ पत्रकार रतिभान त्रिपाठी ने कहा कि लमही, वाराणसी में जन्मे एक डाककर्मी के पुत्र मुंशी प्रेमचंद ने साहित्य की नई इबारत लिखी। तमाम साहित्यकार व शोधार्थी लमही में उनकी जन्मस्थली की यात्रा कर आज भी प्रेरणा पाते हैं। हिंदी कहानी तथा उपन्यास के क्षेत्र में 1918 से 1936 तक के कालखंड को ‘प्रेमचंद युग’ कहा जाता है। प्रेमचंद साहित्य की वैचारिक यात्रा आदर्श से यथार्थ की ओर उन्मुख है। मुंशी प्रेमचंद स्वाधीनता संग्राम के भी सबसे बड़े कथाकार हैं।
रंग निर्देशक सुषमा शर्मा ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद यानी एक युग प्रेमचंद युग एक ऐसा रचनाकार जो निबंधकार कहानीकार उपन्यासकार नाटककार अनुवादक चिंतक विचारक सब कुछ था जिसका सिर्फ एक ही उद्देश्य था अपने लेखनी की शक्ति से समाज में मैं व्याप्त बुराइयों कुरीतियों और परंपराओं के नाम पर होने वाले शोषण के खिलाफ निम्न वर्ग और मध्यम वर्ग में चेतना जगाना और यह सारा काम उसने अपनी लेखनी के जरिए जीवन पर्यंत किया इसीलिए उन्हें कलम का सिपाही कहा गया। मुंशी प्रेमचंद की कहानियां मैक्सिम गोरकी टॉलस्टॉय और चेखव के समकक्ष हैं वह एक विश्व स्तर के रचनाकार हैं जिन पर हर भारतीय को गर्व है।

लखनऊ से ‘नाद रंग’ पत्रिका के संपादक आलोक पराड़कर ने कहा कि आज तो प्रेमचंद की जयंती है लेकिन जिन्होंने प्रेमचंद को पढ़ा है उन्हें वे अक्सर याद आते हैं। मृत्यु के करीब 85 वर्षों बाद भी एक लेखक अपने पाठकों के इतने निकट इसलिए है कि उन्होंने अपनी रचनाओं को जीवन की सचाइयों के निकट रखा। उनकी रचनाओं का यथार्थ एक शताब्दी बाद भी आज का यथार्थ लगता है। मृत्यु से कुछ ही महीनों पूर्व इसी लखनऊ में साहित्य को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा था, ‘साहित्य में प्रभाव उत्पन्न करने के लिए आवश्यक है कि वह जीवन की सचाइयों का दर्पण हो। फिर आप उसे जिस चौखटे में चाहे, लगा सकते हैं।’
संगोष्ठी की संयोजिका ऋतंधरा मिश्रा ने प्रारम्भ में सभी का स्वागत करते हुए कहा कि यह बहुत जरूरी है कि हम प्रेमचन्द के लिखे हुए से नई पीढ़ी को परिचित कराने की जिम्मेदारी निभाएं। यह संगोष्ठी भी इसी उद्देश्य के साथ आयोजित की गई है। उन्होंने संचालन व आभार ज्ञापन किया।
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