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“मेरा जीवन” : के. एम. अग्रवाल: 43: मुख्तार अब्बास नकवी

के.एम. अग्रवाल

सालों से मन में यह बात आती थी कि कभी आत्मकथा लिखूँ। फिर सोचा कि आत्मकथा तो बड़े-बड़े लेखक, साहित्यकार, राजनेता, फिल्मकार, अन्तर्राष्ट्रीय खिलाड़ी, वैज्ञानिक, बड़े-बड़े युद्ध जीतने वाले सेनापति आदि लिखते हैं और वह अपने आप में अच्छी-खासी मोटी किताब होती है। मैं तो एक साधारण, लेकिन समाज और देश के प्रति एक सजग नागरिक हूँ। मैंने ऐसा कुछ देश को नहीं दिया, जिसे लोग याद करें। पत्रकारिता का भी मेरा जीवन महज 24 वर्षों का रहा। हाँ, इस 24 वर्ष में जीवन के कुछ अनुभव तथा मान-सम्मान के साथ जीने तथा सच को सच और झूठ को झूठ कहने का साहस विकसित हुआ। लेकिन कभी लिखना शुरू नहीं हो सका।

एक बार पत्रकारिता के जीवन के इलाहाबाद के अनुज साथी स्नेह मधुर से बात हो रही थी। बात-बात में जीवन में उतार-चढ़ाव की बहुत सी बातें हो गयीं। मधुर जी कहने लगे कि पुस्तक के रूप में नहीं, बल्कि टुकड़ों-टुकड़ों में पत्रकारिता के अनुभव को जैसा बता रहे हैं, लिख डालिये। उसका भी महत्व होगा। बात कुछ ठीक लगी और फिर आज लिखने बैठ ही गया।

गतांक से आगे…

सफर के साथी: 12

लगभग 12 वर्ष तक इलाहाबाद में प्रवास के दौरान पत्रकारिता से जुड़े अनेक ऐसे चेहरे हैं, जिनसे मुलाकात हो या न हो, वे प्रायः याद आते हैं। उनके बारे में भी लिखना अच्छा लगता है कि कौन कहाँ से आया और उसकी यात्रा कहाँ तक पहुँची ? इनमें कई ऐसे लोग भी हैं, जिनके बारे पर्याप्त जानकारी के अभाव में नहीं लिख पा रहा हूँ।

मुख्तार अब्बास नकवी

मुख्तार अब्बास नकवी एक ऐसा नाम है, जिसने युवावस्था में इलाहाबाद में सिविल लाइन्स क्षेत्र के ठेले वालों की समस्याओं को लेकर अखबारों में लिखना, संबंधित अधिकारियों को ज्ञापन देना और जरूरत पड़ने पर धरना-प्रदर्शन से अपनी राजनीति शुरू की।

युवा नकवी बहुत ही सौम्य और सरल स्वभाव के थे। प्रेस वालों से उलझना अथवा कभी समाचार न छपने पर शिकायत करना, तो वह जानते ही नहीं थे। सभी से अच्छे संबंध रखते थे। मुझे अच्छी तरह याद है, 25-26 साल के युवा नकवी स्कूटर से अमृत प्रभात कार्यालय आते थे और बहुत ही शांत भाव से अपना प्रेस नोट पकड़ा देते थे।

हमेशा मुस्कुराता हुआ चेहरा, जिस पर शायद ही कभी कोई तनाव हो। उनकी जो उम्र थी उस समय, उसके अनुसार उनके पास संबंध बनाकर उसका लाभ लेने जैसा कोई अनुभव नहीं था जिससे यह समझा जा सके कि वह इस बात को जरूर समझते होंगे कि प्रेस वालों से कभी नाराजगी व्यक्त करेंगे या दबाव बनायेंगे, तब उन्हीं का नुकसान होगा। उनमें अल्हड़पन था और बारीकी से हर चीज समझने की उत्कट अभिलाषा थी जिसने उन्हें सौम्यता दी और विनम्रता भी।

नकवी ने अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत किशोरावस्था में ही कर दी थी। ठेलेवालों, गरीब दस्तकारों, झुग्गी झोपड़ी वालों कै लिए संघर्ष करने का जज्बा उन्हें उस दौर के तमाम संघर्षरत लोगों की भीड़ से अलग करता था। वह विनम्र थे लेकिन भयभीत किसी से भी नहीं होते थे। अधिकतर वह एकला चलो रे में विश्वास करते थे। कोई पुलिसवाला भी कभी उन्हें अर्दब में नहीं ले पाया और न ही उन्होंने किसी की जी-हुजूरी की।

उनकी निडरता का एक रोचक प्रसंग मुझे याद आता है। एक बार इलाहाबाद नगर महापालिका में उस समय के तीन मंत्री सत्य प्रकाश मालवीय, रेवती रमण सिंह और हरिश्चंद्र श्रीवास्तव कोई बैठक कर रहे थे, मंडल स्तर की। नकवी सागरपेशा (झुग्गी झोपड़ी) वालों को लेकर वहां पहुंच गए उस समय के प्रशासक से मिलने। उन्हें मिलने नहीं दिया गया और बताया गया कि मंत्री लोग आए हैं और मीटिंग कर रहे हैं।

नकवी तैश में आ गए और कहा कि जनता परेशान है और मंत्री लोग मीटिंग करने का ड्रामा कर रहे हैं? वह जबरदस्त्ती मीटिंग हाल में पहुंच गए और प्रशासक को खींच यह कहते हुए बाहर लाए कि पहले गरीबों की सुन लो, मीटिंग बाद में करना।

नकवी की इस हरकत से प्रशासन में हड़कंप मच गया और पुलिस आ गई। देर रात तक काफी बवाल चला, नकवी के खिलाफ एफआईआर हुई। बाद में उस समय के प्रभावशाली पूर्व विधायक बाबा राम आधार यादव के हस्तक्षेप से मामला शांत हुआ।

आपातकाल के पहले नकवी की उम्र महज़ 16-17 साल की ही होगी जब उनके भीतर सत्ता के विरोध के बीज अंकुरित होने लगे थे। उस समय की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी इलाहाबाद आयी हुईं थीं। वह खुली जीप में सिविल लाइन से गुजर रही थीं। नकवी ने पुलिसवालों को चकमा देते हुए काला झंडा उनकी जीप पर फेंक दिया था और इंदिरा गांधी मुर्दाबाद के नारे लगाए थे। उस समय नकवी के इस दुस्साहस को देखकर लोग चौंक पड़े थे और समझदार लोगों की प्रतिक्रिया थी, “यह लंबी रेस का घोड़ा है।”

नकवी ने शुरू से ही कांग्रेस की खिलाफत की। खास बात यह थी कि वह वक्त कांग्रेस के उरूज़ का था और चारों तरफ कांग्रेस की जयजयकार होती थी। ऐसे में उन्होंने समाजवादी युवजन सभा से अपनी राजनीति की शुरुआत की। 1981 में युवा जनता पार्टी के सचिव बना दिए गए। राजेन्द्र चौधरी उसके प्रदेश अध्यक्ष थे जो आजकल समाजवादी पार्टी में अखिलेश यादव के साथ दिखते हैं। आपातकाल के दौरान नकवी को फरारी की भी ज़िन्दगी जीनी पड़ी। लेकिन सरकार विरोधी आंदोलनों में भागीदारी का उनका उत्साह बढ़ता ही जा रहा था। प्रेस वालों से उनके अच्छे संबंध थे लेकिन आपातकाल के दौरान उन्होंने एक प्रेस एजेंसी पर हमला बोलने में भी कोताही नहीं की थीं।

असल में आपातकाल के दौरान सरकार ने प्रेस सेंसरशिप लगा दी थी। यू एन आई और पी टी आई को मिलाकर एक सरकारी एजेंसी बना दी गई थी। नकवी प्रेस सेंसरशिप का विरोध करने UNI एजेंसी पहुंच गए और टेलीप्रिंटर में तोड़फोड़ कर दी, सेंसर विरोधी नारे लगाए। उस समय के UNI के ब्यूरो चीफ जे एन दास ने इस तोड़फोड़ की खबर भेज दी तो पूरे देश में हंगामा मच गया। तत्कालीन सूचना प्रसारण राज्य मंत्री आई के गुजराल ने इलाहाबाद प्रशासन को कड़ी फटकार लगाई और नकवी के खिलाफ एफआईआर कराई गई।

अपनी ईमानदारी और जुझारूपन के कारण नकवी इलाहाबाद में सबकी जुबान पर चढ़ने लगे थे। उस दौरान इलाहाबाद में सांप्रदायिक दंगे खूब हुआ करते थे। नकवी ने इस समस्या के समाधान के लिए साम्प्रदायिकता विरोधी मोर्चा भी बनाया था जिसकी सभी लोग प्रशंसा करते थे।

इसी बीच 1983 में युवा नकवी ने प्रेम विवाह करके सबको चौंका दिया। हालांकि नकवी ने अपनी सहपाठी सीमा से विवाह किया था लेकिन चौंकाने वाली बात यह थी कि विवाह के बाद उन्होंने जो संक्षिप्त सा कार्यक्रम रखा था, उसमें जिस तरह से विभिन्न वर्गों और विभिन्न राजनैतिक दलों के लोग एकत्रित हुए थे, उससे नकवी के संपर्कों और पहुंच का उस समय खुलासा हुआ था। नकवी ने हालांकि एक सामान्य हिन्दू परिवार की लड़की सीमा से कोर्ट में विवाह किया था लेकिन दोनों ही धर्मों के रीति-रिवाज के साथ शादी की रस्म भी पूरी की गई थी। यह बात अलग है कि दोनों ही परिवारों में से किसी ने भी इस विवाह में शिरकत नहीं की थी। विवाह के बाद नकवी ने एक छोटी सी पार्टी सिविल लाइन के ग्रीन लॉन होटल में रखी थी जिसमें ग़ज़ल का भी कार्यक्रम था। इस कार्यक्रम में मुझे भी आमंत्रित किया गया था और मैंने एक खबर भी लगाई थी।

मुझे याद है कि इस कार्यक्रम में शहर के कई अफसर, हाई कोर्ट के जस्टिस सप्रू, कांग्रेस और सोशलिस्ट पार्टी के कई नेता भी मौजूद थे। नकवी के बॉलीवुड के लोगों से भी काफी संपर्क थे। नकवी के इन्हीं संपर्कों का लाभ अटल बिहारी बाजपेई की सरकार ने उठाया और फिल्म को उद्योग का दर्जा दिया और तमाम विरोधों के बावजूद 1998 में डी टी एच व्यवस्था को लागू कराने में सफलता मिली जिसे भारत के टेलीविजन के क्षेत्र में बड़ी क्रांति के रूप में देखा गया था।

इलाहाबाद में रहकर ही नकवी ने अपना विशाल नेटवर्क खड़ा कर लिया था जिसका अंदाज़ा किसी को नहीं था। अपने सौम्य स्वभाव, अपनी एवरग्रीन मुस्कुराहट और कभी किसी की आलोचना न करने की प्रवृत्ति की वजह से वह सबका दिल जीत लेते थे। वह सबका अच्छा-बुरा जानते जरूर थे लेकिन कभी न तो उसको प्रगट करते थे और न ही उसका इस्तेमाल करते थे। तमाम दलों के लोगों के उनके संपर्क में रहने का ही लाभ मोदी सरकार को मिला जब अल्पमत में रहकर भी राज्यसभा से तमाम विधेयक पास होते चले गए।

आपातकाल के दौरान जेल में रहने पर नकवी जनेश्वर मिश्र, डॉ मुरली मनोहर जोशी, सत्य प्रकाश मालवीय, जमाते इस्लामी, कम्युनिस्ट पार्टी, सोशलिस्ट और आनंद मार्ग आदि से जुड़े तमाम बड़े नेताओं के संपर्क में आए और जेल प्रवास मासूम नकवी के अध्ययन काल के रूप में परिवर्तित हो गया। जेल में अनगढ़ नकवी को हर तरह की राजनीतिक विचारधाराओं को समझने का अवसर मिला और दिमाग की कई नई खिड़कियां खुलने लगीं। जल्दी ही उनका झुकाव दक्षिणपंथी विचारधारा की तरफ होने लगा। उन्होंने महसूस किया कि राजनैतिक दल अपनी रोटी सेंकने के लिए जनसंघ को बदनाम करते हैं और जनसंघ के बारे में गलतफहमियां फैलाते हैं। जनसंघ की  विचारधारा का काफी अध्ययन करने बाद 1984 में नकवी ने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली और भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिए गए।

1991 में नकवी को भाजपा ने मऊ से विधान सभा का टिकट दे दिया। नकवी पहली बार इस क्षेत्र में नामांकन के दिन ही पहुंचे थे। नकवी जी-जान से नए प्रत्याशी के रूप में अपनी पहचान बनाने में जुट गए। पहले ही चुनाव में वह जीत के करीब पहुंच गए थे और मात्र 13 वोटों के अंतर से वह चुनाव हार गए।

बाद में 1998 में उन्हें रामपुर से एम पी का टिकट मिला। वहां भी नकवी पहली बार गए और विराट जीत हासिल की। यह पहली बार था कि मुस्लिम विरोधी पार्टी की छवि वाली पार्टी में कोई मुस्लिम चुनाव जीत कर आया था। भारतीय जनता पार्टी में वह पहले शक्स हैं जिनके खाते में यह रिकॉर्ड  गया।इसके बाद नकवी इलाहाबाद की गलियों से निकलकर राष्ट्रीय नेता बन गए। पहली ही जीत में वह केंद्रीय सूचना प्रसारण एवं संसदीय कार्य राज्य मंत्री बना दिए गए। उसके बाद नकवी को संगठनात्मक गतिविधियों की भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गईं और उन्हें राष्ट्रीय महामंत्री, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और राष्ट्रीय प्रवक्ता जैसे पदों पर रखा गया। नकवी ने इन संगठनात्मक जिम्मेदारियों का भी बखूबी निर्वहन किया।

वह सौभाग्यशाली हैं जिनकी निकटता अटल बिहारी बाजपेई से रही है, लालकृष्ण आडवानी से रही है और इस समय मोदी से भी उनकी इतनी निकटता है कि मोदी ने 2014 और 2019 दोनों ही संसदीय चुनाव प्रबंधन में नकवी को चुनाव प्रबंधन प्रभारी की जिम्मेदारी दी गई थी और उनके चुनाव प्रबंधन कौशल का सभी ने लोहा माना। सभी वरिष्ठ नेताओं से संपर्क रहने के कारण समय-समय पर अन्य महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व भी उन्हें दिए जाते रहे।

नकवी से बहुत अधिक निकटता तो नहीं थी मेरी, लेकिन एक-दो बार हेमवतीनंदन बहुगुणा के घर के निकट स्थित उनके आवास पर जाना जरूर हुआ है। शहर में वह काफी सोशल थे और हर क्षेत्र के लोगों के बीच उनका आना-जाना था। किसी से भी निकटता कायम कर लेना उनकी विशेषता थी।

नकवी के बारे में सुना जाता है कि वे आम नेताओं की तरह नहीं हैं। वे लोगों की मदद भी करते हैं। कहते हैं कि नकवी लोगो की मदद ऐसे करते हैं जैसे किसी और को पता भी न चले। इसमें अहसान का भाव या कुटिलता नहीं रहती हैं।

शुरू से ही उनमें सबसे अच्छी बात यह रही कि वह कभी किसी प्रकार के धार्मिक पचड़े में नहीं पड़े। वह हिन्दू-मुसलमानों के बीच अच्छे सौहार्दपूर्ण संबंधों के हिमायती रहे। धार्मिक कट्टरता तो कभी उन्हें छू भी नहीं पायी। उनके परिवार में हिन्दू और मुस्लिम दोनों धर्मों के तीज़-त्योहार उत्साह के साथ मनाए जाते हैं। एक तरह से धार्मिक सौहार्द्र का सबसे बड़ा उदाहरण है नकवी दंपत्ति का यह परिवार।

आज की तारीख में वह मोदी सरकार में अत्यंत संवेदनशील अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय के कैबिनेट मंत्री हैं और समय-समय पर चैनलों पर आकर पार्टी के कथन और रुख को स्पष्ट करते रहते हैं।

अल्पसंख्यकों की बेहतरी के लिए वे ढेरों योजनाएं लेकर आते हैं। अल्पसंख्यकों के साथ वे बहुसंख्यकों के बीच भी  लोकप्रिय हैं और अपनी समावेशी सियासी छवि के कारण समाज के सभी वर्गों में वे समान रूप से लोकप्रिय हैं। जांबाज़ वह आज भी हैं, तभी तो धारा 370 हटवाने के बाद सिक्योरिटी को सूचित किए बिना ही वह कश्मीर के लाल चौक जैसे संवेदनशील स्थान पर पहुंच गए थे और वहां पर दुकानदारों और आम लोगों से मुलाकात की थी। उन्हें वहां देखकर लोग चौंक पड़े थे। नकवी का लाल चौक जाना उस समय टेलीविजन की सुर्खियां बना था। जब उनसे पूछा गया था कि आपने बड़ा खतरा उठाया तो उनका मुस्कुराता हुए वहीं जवाब था, “अपनों के बीच कैसा खतरा? जब  हमारे अंदर कश्मीर के लोगों को लेकर आत्मविश्वास नहीं होगा तो इनके भीतर आत्मविश्वास कैसे आएगा?” यह उनके आत्मविश्वास को झलकाता है।

मुख्तार अब्बास नकवी एक उदाहरण हैं कि कैसे एक साधारण परिवार का व्यक्ति, जिसकी कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि न हो, सिर्फ ठेलेवालों से अपनी राजनीति शुरू करके, बिना गाली-गलौज किये, अपने मान-सम्मान की रक्षा करते हुए केन्द्र सरकार में मंत्री बन जाता है, और जिसपर आज तक कोई काला धब्बा नहीं दिखाई दे सका है।


वैसे एक बात यह भी है कि 1989 में मेरे इलाहाबाद छोड़ देने के बाद से कभी मुख्तार अब्बास नकवी से न तो मुलाकात हुई और न ही टेलीफोन पर बात हुई, लेकिन कुछ तो है, जो आज भी वह याद आते हैं। हर रोज उनके बारे में कुछ न कुछ पढ़ने को मिलता रहता है, वे सुर्खियों में रहते ही हैं। उनके बारे में इष्ट-मित्रों से चर्चा होती ही रहती है, वेबसाइटें उनकी गतिविधियों से भरी पड़ी हैं। अच्छा लगता है यह देखकर कि जो पौधा मेरी आंखों के सामने अंकुरित हुआ था, वह आज विशाल वट वृक्ष बन चुका है और लोगों को छांव के साथ फल भी दे रहा है।

क्रमशः 44

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