उन दिनों अखबारों में जनहित की बातें प्रकाशित होने पर ध्यान दिया जाता था। परिणामस्वरूप प्राधिकरण ने आवासीय कालोनी बनाने की अपनी योजना को निरस्त कर दिया। अमरूद के बाग वाले बहुत खुश हुए। अब पता चला है कि इलाहाबाद महापालिका क्षेत्र बढ़ती हुई आबादी को देखते हुए विकास के नाम पर बमरौली से भी काफी आगे तक चला गया है। परिणामस्वरूप, उधर की जमीनें काफी मँहगी हो गयीं। अमरूद पैदा करने वालों ने देखा कि साल भर में अमरूद से जितना वह कमाते हैं, उससे बहुत अधिक जमीन बेचने से मिल जा रहा है…

के. एम. अग्रवाल
सालों से मन में यह बात आती थी कि कभी आत्मकथा लिखूँ। फिर सोचा कि आत्मकथा तो बड़े-बड़े लेखक, साहित्यकार, राजनेता, फिल्मकार, अन्तर्राष्ट्रीय खिलाड़ी, वैज्ञानिक, बड़े-बड़े युद्ध जीतने वाले सेनापति आदि लिखते हैं और वह अपने आप में अच्छी-खासी मोटी किताब होती है। मैं तो एक साधारण, लेकिन समाज और देश के प्रति एक सजग नागरिक हूँ। मैंने ऐसा कुछ देश को नहीं दिया, जिसे लोग याद करें। पत्रकारिता का भी मेरा जीवन महज 24 वर्षों का रहा। हाँ, इस 24 वर्ष में जीवन के कुछ अनुभव तथा मान-सम्मान के साथ जीने तथा सच को सच और झूठ को झूठ कहने का साहस विकसित हुआ। लेकिन कभी लिखना शुरू नहीं हो सका।
एक बार पत्रकारिता के जीवन के इलाहाबाद के अनुज साथी स्नेह मधुर से बात हो रही थी। बात-बात में जीवन में उतार-चढ़ाव की बहुत सी बातें हो गयीं। मधुर जी कहने लगे कि पुस्तक के रूप में नहीं, बल्कि टुकड़ों-टुकड़ों में पत्रकारिता के अनुभव को जैसा बता रहे हैं, लिख डालिये। उसका भी महत्व होगा। बात कुछ ठीक लगी और फिर आज लिखने बैठ ही गया।

गतांक से आगे…
नेहरू जी का जन्म स्थान
एक बार इलाहाबाद के किसी अखबार में पंडित जवाहर लाल नेहरू के जन्म स्थान के बारे में एक छोटा सा लेख छपा था। उसे देखकर मेरी इच्छा हुई कि सही मकान का पता किया जाय। और मैं इसमें लग गया।
कहा जाता था कि नेहरू जी का जन्म इलाहाबाद के चौक बाजार से लगे मीरगंज के उस मकान में हुआ था, जिसके अगल-बगल वेश्यायें रहा करती थीं।

बहरहाल, मैंने इलाहाबाद संग्रहालय में नेहरू जी के जन्म स्थान से संबंधित मकान का माडल पहले भी देखा था और एक बार फिर देखने गया। इसके बाद मीरगंज की गली में एक छोर से दूसरे छोर तक कई चक्कर लगाये और फिर मैंने वह मकान देखा, जो संग्रहालय के माडल से हूबहू मिलता-जुलता था। चुपचाप उस मकान के सामने और भीतर से फोटो खिचवाई। महापालिका में जाकर मोतीलाल नेहरू से संबंधित पुरानी फाइलें निकलवा कर उर्दू फारसी में लिखी बातों को किसी से पढ़वा कर समझा। संग्रहालय के बुजुर्ग निदेशक डा.एस.सी.काला से मिला और फिर राजापुर क्षेत्र में गंगा किनारे रहने वाले उस व्यक्ति से मिला जिसने डा. काला के कहने पर माडल बनाया था।

उस व्यक्ति ने बताया कि मीरगंज में मौके पर जाकर उसने मकान को अच्छी तरह देखा था और तब लकड़ी का माडल तैयार किया था। कुल मिलाकर मैंने हर प्रकार से पुष्टि कर दी कि मीरगंज वाला वही मकान नेहरू जी का जन्म स्थान है। लगभग पौन पृष्ठ का लेख फोटो के साथ छपा। सुबह अखबार आया और कुछ घंटे के भीतर उस मकान के मालिक ने मकान के आगे के हिस्से को तोड़वा दिया, जिससे मकान की माडल के साथ पहचान होती थी। मकान के भीतर सामने की वह खड़ी सीढ़ी भी तोड़वा दी, जैसा कि माडल में बना था। मकान मालिक को डर हो गया कि कहीं शासन इस मकान को ले न ले।
वैसे वर्षों से यह बात कही जाती थी कि चूँकि नेहरू के जन्म स्थान वाले इस मकान के इर्द-गिर्द वेश्यायें रहती हैं और चारों ओर घनी आबादी है, इसलिए इंदिरा जी का परिवार इस मकान को यादगार के रूप में लेने में रुचि नहीं रखता था। शायद इसलिए भी सब कुछ स्पष्ट होने के बाद भी और पहले भी इस ओर ध्यान नहीं दिया गया।

इस लेख के प्रकाशित होने के बाद मजेदार घटना यह रही कि मेरे प्रतिद्वंदी, पत्रिका के चीफ रिपोर्टर दुबे जी भला इसे कैसे बर्दास्त करते! दो दिन बाद ही उन्होंने मीरगंज के एक दूसरे मकान को नेहरू जी का जन्म स्थान बताते हुए एक लेख पत्रिका में लिखा। इसका एक उद्देश्य उस असली मकान से लोगों का ध्यान भटकाना भी था।

इलाहाबादी अमरूद
इलाहाबादी अमरूद को लखनऊ(मलिहाबाद) के दशहरी आम की तरह विश्व प्रसिद्ध माना जाता है। यह लाल चित्तीदार, बाहर से देखने में जितना सुन्दर होता है, भीतर से खाने मैं उतना ही खूशबूदार, मीठा होता है।
लेकिन यह इलाहाबादी अमरूद पूरे इलाहाबाद में नहीं पैदा होता। इलाहाबाद में बमरौली से पहले धूमनगंज क्षेत्र के अबूबकरपुर क्षेत्र में भी लगभग सौ-डेढ़ सौ एकड़ क्षेत्रफल में ही यह विशेष प्रजाति का अमरूद पैदा होता है।
एकबार इलाहाबाद विकास प्राधिकरण ने इसी क्षेत्र में आवासीय योजना बनायी और देखते-देखते दो-तीन एकड़ क्षेत्र में बाग को कटवा भी दिया। दूसरे दिन वहाँ के कुछ लोग अमृत प्रभात प्रेस पर आये और घटना की जानकारी दी। उसी दिन मैं फोटोग्रफर को लेकर बाग वाले क्षेत्र में गया और फिर विकास प्राधिकरण से जानकारी लेकर दूसरे ही दिन एक बड़ी सी रिपोर्ट प्रकाशित हुई कि इस प्रकार न सिर्फ इलाहाबादी अमरूद का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा, बल्कि यह एकमात्र ग्रीन बेल्ट है, जो स्वयं समाप्त हो जायेगा।
उन दिनों अखबारों में जनहित की बातें प्रकाशित होने पर ध्यान दिया जाता था। परिणामस्वरूप प्राधिकरण ने आवासीय कालोनी बनाने की अपनी योजना को निरस्त कर दिया। अमरूद के बाग वाले बहुत खुश हुए।
अब पता चला है कि इलाहाबाद महापालिका क्षेत्र बढ़ती हुई आबादी को देखते हुए विकास के नाम पर बमरौली से भी काफी आगे तक चला गया है। परिणामस्वरूप, उधर की जमीनें काफी मँहगी हो गयीं। अमरूद पैदा करने वालों ने देखा कि साल भर में अमरूद से जितना वह कमाते हैं, उससे बहुत अधिक जमीन बेचने से मिल जा रहा है, तो तेजी से बागीचे वाली जमीनें बिकने लगीं। बताया जाता है कि अब बहुत कम क्षेत्रफल में इलाहाबादी अमरूद के बागीचे रह गये हैं।
क्रमशः 14

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