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‘मेरा जीवन’: के.एम. अग्रवाल: 15

… जया जी का भाषण सुनकर मुझे तो मजा आ गया। तुरंत प्रेस पर आया और समाचार लगा दिया कि जया जी ने अपने को इलाहाबाद की बेटी बताकर अग्रवालों की सभा में वोट माँगा है। समाचार प्रथम पृष्ठ पर छपा। इलाहाबाद के राजनीतिक गलियारे में उठा-पटक होने लगी। तुहिन कांति घोष ने मुझसे कुछ नहीं कहा। उन्होंने स्वयं एक छोटा सा समाचार खेद व्यक्त करते हुए कि गलती से यह समाचार छप गया है, लिखकर सीधे प्रेस में दे दिया…

के. एम. अग्रवाल

सालों से मन में यह बात आती थी कि कभी आत्मकथा लिखूँ। फिर सोचा कि आत्मकथा तो बड़े-बड़े लेखक, साहित्यकार, राजनेता, फिल्मकार, अन्तर्राष्ट्रीय खिलाड़ी, वैज्ञानिक, बड़े-बड़े युद्ध जीतने वाले सेनापति आदि लिखते हैं और वह अपने आप में अच्छी-खासी मोटी किताब होती है। मैं तो एक साधारण, लेकिन समाज और देश के प्रति एक सजग नागरिक हूँ। मैंने ऐसा कुछ देश को नहीं दिया, जिसे लोग याद करें। पत्रकारिता का भी मेरा जीवन महज 24 वर्षों का रहा। हाँ, इस 24 वर्ष में जीवन के कुछ अनुभव तथा मान-सम्मान के साथ जीने तथा सच को सच और झूठ को झूठ कहने का साहस विकसित हुआ। लेकिन कभी लिखना शुरू नहीं हो सका।

एक बार पत्रकारिता के जीवन के इलाहाबाद के अनुज साथी स्नेह मधुर से बात हो रही थी। बात-बात में जीवन में उतार-चढ़ाव की बहुत सी बातें हो गयीं। मधुर जी कहने लगे कि पुस्तक के रूप में नहीं, बल्कि टुकड़ों-टुकड़ों में पत्रकारिता के अनुभव को जैसा बता रहे हैं, लिख डालिये। उसका भी महत्व होगा। बात कुछ ठीक लगी और फिर आज लिखने बैठ ही गया।

गतांक से आगे…

1984 का इलाहाबाद लोकसभा चुनाव

1984 में इलाहाबाद का लोकसभा चुनाव राजनीतिक कारणों से ऐतिहासिक माना जाता है। एक तरफ जन नेता हेमवती नंदन बहुगुणा और दूसरी तरफ युवकों के फिल्मी हीरो तथा राजीव गांधी के मित्र अमिताभ बच्चन थे। हमारे प्रेस के मालिक तुषार कांति घोष के बड़े पौत्र तुहिन कांति घोष की इस चुनाव में अमिताभ बच्चन के पक्ष में काफी रुचि और जुड़ाव था। लगभग चुनाव भर वह भी कलकत्ते से यहाँ आकर इलाहाबाद में ही रहने लगे थे।

इस चुनाव की राष्ट्रीय स्तर पर जबरदस्त चर्चा होती थी। दिल्ली से बड़े-बड़े अखबारों के संवाददाता यहीं जमे रहते थे। यह भी सच्चाई है कि उनके आगे इलाहाबाद के पत्रकारों की पूछ कम थी। मैं निष्पक्ष रिपोर्टिंग करता था। यह अलग बात है कि मेरी सहानुभूति बहुगुणा जी के साथ थी, क्योंकि वह वास्तव में जन नेता थे। लेकिन इस सहानुभूति को कभी अपनी रिपोर्टिंग पर हाबी नहीं होने दिया।

अमिताभ जी के साथ उनकी पत्नी जया बच्चन भी पूरे चुनाव इलाहाबाद में ही रहीं। दोनों अलग-अलग चुनाव प्रचार करते थे। जया जी अपनी सभाओं में कहती थीं कि वह इलाहाबाद की बहू हैं और लोग मुँह दिखाई में अमिताभ जी को वोट दें। यह बात काफी प्रचारित थी।

एक रात लगभग 9 बजे प्रयाग समिति के हाल में इलाहाबाद के अग्रवालों की सभा में जया जी को जाना था। हमारे प्रेस में इस सभा की कोई सूचना नहीं थी। मुझे जानकारी हुई तो मैं अकेले चुपचाप वहाँ पहुँच गया। सभा में जया जी ने कहा कि वह इलाहाबाद की बेटी हैं और अपने दामाद अमिताभ जी को भारी बहुमत से जितायें।

जया जी का भाषण सुनकर मुझे तो मजा आ गया। तुरंत प्रेस पर आया और समाचार लगा दिया कि जया जी ने अपने को इलाहाबाद की बेटी बताकर अग्रवालों की सभा में वोट माँगा है। समाचार प्रथम पृष्ठ पर छपा। इलाहाबाद के राजनीतिक गलियारे में उठा-पटक होने लगी।
तुहिन कांति घोष ने मुझसे कुछ नहीं कहा। उन्होंने स्वयं एक छोटा सा समाचार खेद व्यक्त करते हुए कि गलती से यह समाचार छप गया है, लिखकर सीधे प्रेस में दे दिया, जो दूसरे दिन प्रकाशित हुआ। फिर इस मुद्दे पर मेरी और तुहिन बाबू की कोई बात नहीं हुई। वह भी जानते थे कि संगीत समिति में जया जी ने अपने भाषण में अपने को इलाहाबाद की बेटी ही बताया था। लेकिन इसका खंडन भी जरूरी था क्योंकि बेटी और बहू दोनों एक साथ नहीं चल सकता था। और फिर तुहिन बाबू नहीं चाहते थे कि किसी भी प्रकार से अमिताभ बच्चन को राजनीतिक क्षति पहुँचे।

बहुगुणा जी इस चुनाव में अमिताभ बच्चन से हार गये थे, जिसकी उम्मीद कम से कम इलाहाबाद वासियों को तो नहीं थी। अमिताभ जी की जीत का एक बड़ा कारण यही समझा जाता था कि विशेष कर 25 वर्ष से नीचे का युवा वर्ग उनका दीवाना था। वह चाहे लड़का हो या लड़की। कहा तो यहाँ तक जाता था कि बहुत से लोग जब खाना खा-पीकर दोपहर में वोट देने गये तो पता चला कि उनके वोट पड़ चुके हैं। चर्चा यह भी थी कि बड़ी संख्या में युवा लड़के सबेरे ही जाकर अपने पिता का वोट डाल आये थे, जो निश्चित ही अमिताभ बच्चन को पड़ा होगा।

युवा लड़कियों के बारे में बताऊँ, वैसी दीवानगी मैंने कभी नहीं देखी थी। लड़कियों को पता हो जाता था कि अमिताभ बच्चन कब सर्किट हाउस आने वाले हैं। वे पहले से उनका एक झलक पाने के लिए वहीं पर उनका इंतजार करती रहती थीं। अमिताभ बच्चन के आने पर कई लड़कियाँ अपना दुपट्टा उनके आगे जमीन पर डाल देती थीं, लेकिन वह उसे बचाकर किनारे से निकल जाते थे।
यह भी कहा जाता था कि प्रशासन के चुनाव कर्मचारियों ने भी किसी दबाव में अमिताभ बच्चन का साथ दिया था।
बहुगुणा जी के हारने की खबर शाम होते-होते पूरे शहर में फैल गयी। कहीं खुशी तो कहीं सन्नाटा। रात 9 बजे तो मेरे मन मेें आया कि देखा जाय कि इस समय बहुगुणा जी क्या कर रहे होंगे ? मैं सीधे उनके आवास पर पहुँच गया। देखा, बरामदे से लगने वाले कमरे में बहुगुणा जी अपने छोटे पौत्र को खिला रहे थे, मतलब,उसके साथ बच्चों की तोतली भाषा में खेल रहे थे। शायद मन को बहला रहे थे। बहुगुणा जी से नमस्कार हुआ और मुश्किल से एक-दो मिनट रुककर मैं प्रेस लौट आया। मैंने लौटकर समाचार बनाया कि कैसे वह उस समय मन को बहला रहे थे, जो दूसरे दिन छपा।

उत्तर प्रदेश पत्रकारिता संस्थान

1986 के प्रारंभ में अमृत प्रभात के कुछ साथियों के साथ मिलकर ‘ उत्तर प्रदेश पत्रकारिता संस्थान ‘ का रजिस्ट्रेशन कराकर बाकायदा पत्रकार और पत्रकारिता के विकास और कठिनाइयों के संदर्भ में काम शुरू किया गया। साथ ही ‘ अभिव्यक्ति’ नाम से इसकी वार्षिक पत्रिका का प्रकाशन भी शुरू किया गया। इस पत्रिका के प्रधान संपादक सूचना निदेशालय के पूर्व निदेशक ठाकुर प्रसाद सिंह थे और संपादक कल्याण चंद जायसवाल थे। मैं इसका महासचिव था।

पत्रकारिता संस्थान के गठन के अगले तीन वर्षों में दो बार वार्षिक समारोह, इलाहाबाद तथा गोरखपुर में पत्रकार प्रशिक्षण शिविर तथा पुस्तकालय की स्थापना जैसे प्रमुख कार्य हुए। अक्टूबर 1987 में प्रथम पुरस्कार वितरण समारोह में कुलदीप नैयर, नन्द किशोर त्रिखा, ठाकुर प्रसाद सिंह, सत्यनारायण जायसवाल, के.बी.माथुर के साथ ही प्रख्यात साहित्यकार अमृत लाल नागर जैसे लोग मौजूद थे।


दिसंबर 87 में इलाहाबाद में ही पुस्तकालय की स्थापना हुई। उद्घाटन के अवसर पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जे.एन.दुबे और केन्द्रीय राज्य पुस्तकालय के अध्यक्ष भास्कर नाथ तिवारी मौजूद थे।


फरवरी, 87 में ही गोरखपुर मेन तीन दिवसीय पत्रकार प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया गया। एक दिन उसमें उपस्थित गोरखपुर विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति प्रो. विश्वम्भर दयाल गुप्त ने घोषणा की कि वह शीघ्र ही विश्वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग की स्थापना करेंगे।
मानहानि विधेयक 1988 के विरोध में देश भर के पत्रकारों के साथ संस्थान के बैनर तले इलाहाबाद के पत्रकारों ने भी सड़क पर उतर कर विरोध किया था।

1989 के मार्च में इलाहाबाद छोड़कर गुवाहाटी जाने के पूर्व संस्थान के महासचिव की जिम्मेदारी साथी रामदत्त त्रिपाठी को सोंप दी गयी, जो उन दिनों लखनऊ में रहा करते थे। साथी शिव शंकर गोस्वामी को भी संस्थान के संचालन की खास जिम्मेदारी दी गयी। लेकिन दुर्भाग्य कि कुछ महीनों बाद ही संस्थान की गतिविधियाँ इन दोनों की व्यस्तता के कारण आगे नहीं बढ़ सकी।
क्रमशः 16

 

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