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“अगर कोई दुनिया के किसी भी कोने में शरिया नाफ़िज करने की बात करता है तो वह मुसलमानों का दुश्मन है”: VN Rai IPS

“इन आँखिन देखी” :34: विभूति नारायण राय IPS

…बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता की एक बहुत पुरानी बहस है जो पूरी दुनिया की ही तरह भारत मे भी चलती रहती है । मेरा मानना है कि बहुसंख्यक समाज की साम्प्रदायिकता ज़्यादा ख़तरनाक है क्योंकि उसमें राज्य पर क़ब्ज़ा करने का सामर्थ्य होता है । भारत का अनुभव यही बताता है पर इसका मतलब यह हरगिज़ नही है कि अल्पसंख्यक समुदाय की साम्प्रदायिकता किसी भी मायने मे कम नुक़सानदेह है । दोनो एक दूसरे के लिये खाद का काम करती हैं ।….

“वह मुसलमानों का दुश्मन है”!!!”: 

विभूति नारायण राय, IPS”

विभूति नारायण राय, IPS

लेखक उत्तर प्रदेश में पुलिस महानिदेशक रहे हैं और महात्मा गांधी हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के कुलपति भी रह चुके हैं

अगर समाज पूरी तरह से विभक्त हो तो एक मिनट से कम का बयान भी किस तरह का भूकंप ला सकता है, इसका एक मज़ेदार अनुभव अभी हमे हुआ है । फ़िल्मों मे अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने वाले नसीरुद्दीन शाह वहाँ तो दूसरों का लिखा डायलाग बोलते और तालियाँ वसूलते रहे हैं, पर जैसे ही उन्होंने अपने मन की बात करने की कोशिश की कि आसमान फट पड़ा। कुछ ही महीनों पहले भी उन्होंने अपनी ज़ुबान खोली थी और इसी तरह कुछ लोग़ उन पर टूट पड़े थे और कुछ ने उन्हे हाथों हाथ लिया था। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना हुआ है कि दोस्तों और दुश्मनों के रोल बदल गये हैं।

उस समय उनके बयान का आशय था कि एक मुसलमान की पहचान के साथ भारत मे रहते हुये उन्हे डर लगता है । इस वक्तव्य के आते ही राष्ट्रवादी उन पर हमलावर हो गए और उन्हे किसी ‘सुरक्षित’ जगह जाकर बसने की सलाह दी जाने लगी थी । इस बार जब उन्होने भारतीय मुसलमानों के एक वर्ग द्वारा अफगानिस्तान मे तालिबान की जीत पर जश्न मनाने की प्रवृत्ति की शदीद मज़म्मत की तो वे राष्ट्रवादियों के नायक बन गये । जिन उदारवादियों और धर्मनिरपेक्ष जमातों ने उस समय उन्हे एक महत्वपूर्ण आवाज़ के रूप मे पेश किया था, वे समझ नही पा रहे हैं कि इस बयान पर क्या प्रतिक्रिया दें और वे उनके कथन को न निगल पा रहे हैं और न ही उगल रहे हैं ।

ज़रा देखें कि नसीर ने इस बार क्या कहा है ? उनकी एक मिनट से भी छोटी क्लिपिंग मे दो बाते महत्व की हैं । एक तो उन्हे इस बात पर आपत्ति है कि दुनिया भर के लिये ख़तरनाक तालिबानों की विजय पर भारतीय मुसलमानों का एक बड़ा तबक़ा ख़ुशी ज़ाहिर कर रहा है और दूसरे वह चाहते हैं कि दुनिया भर से भिन्न भारतीय मुसलमान यह तय करें कि वे मध्ययुगीन बर्बरता के साथ हैं या इस्लाम का एक आधुनिक संस्करण चाहते हैं। वे जब बोल रहे थे तो यह स्पष्ट था कि फ़िल्मों की तरह उनके पास कोई लिखित संवाद नही थे, वे भावनाओं की बाढ़ से जूझते हुये अपने दिल की बात कह रहे थे और इस लिये उनके मूल्यांकन के लिये व्याकरण की बारीकियों मे नही जाना चाहिये।

नसीर के वक्तव्य के ख़िलाफ़ उनके अपने समुदाय के अंदर से कई तरह की आवाज़ें उठीं। कुछ तो मुसलमानों के धार्मिक पहचान की राजनीति करने वाले लोग थे जो मानते हैं कि दुनिया मे शरिया आधारित राज्य व्यवस्था क़ायम करने की दिशा मे तालिबान का जीतना एक बड़ा क़दम है और इस लिये नसीर के बयान को एक कमज़ोर यक़ीन वाले मुसलमान के प्रलाप से अधिक और कुछ नही समझा जाना चाहिये । पर ऐसे लोगों की संख्या कम थी ज़्यादा वे लोग हैं जो उनके शब्दों के चयन से दुःखी थे कि उन्होने सारे मुसलमानों को तालिबान की जीत का स्वागत करने वालों की श्रेणी मे रख दिया है। इनमे से कुछ ने तो यहाँ तक दावा किया कि भारत मे मुसलमानों के नगण्य प्रतिशत ने अफगानिस्तान के घटनाक्रम पर ख़ुशी ज़ाहिर की है। सोशल मीडिया पर एक नज़र दौड़ाने से स्पष्ट हो जायेगा कि यह बचाव सही नही है ।

मेरे लिये ये प्रतिक्रियायें प्रत्याशित ही थीं लगभग उसी तरह जैसे हिंदुत्व वादियों को वे अब नायक की तरह लगने लगे हैं । मैं यहाँ नसीर विरोधी उन प्रतिक्रियाओं की बात करने जा रहा हूँ जो उस सेक़ुलर लिबरल समाज की तरफ़ से आयी है जिसके वे तब नायक थे जब उन्हे ‘ड़र’ लग रहा था ।

बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता की एक बहुत पुरानी बहस है जो पूरी दुनिया की ही तरह भारत मे भी चलती रहती है । मेरा मानना है कि बहुसंख्यक समाज की साम्प्रदायिकता ज़्यादा ख़तरनाक है क्योंकि उसमें राज्य पर क़ब्ज़ा करने का सामर्थ्य होता है।

भारत का अनुभव यही बताता है पर इसका मतलब यह हरगिज़ नही है कि अल्पसंख्यक समुदाय की साम्प्रदायिकता किसी भी मायने मे कम नुक़सानदेह है । दोनो एक दूसरे के लिये खाद का काम करती हैं । जहाँ पहली उदार संस्थाओं को नष्ट करती है वहीं दूसरी तो अपने ही समाज के कमज़ोर तबकों पर आघात करती हैं । तालिबान इसके फ़ौरी उदाहरण होंगे जिन्होंने पहले भी अपने बीच की महिलाओं, शिया, खिलाड़ियों और कलाकारों को ही निशाना बनाया है और इस बार भी वही करने की पूरी संभावना है ।

यह एक बड़ा दुर्भाग्य है कि हमारा वाम हिंदू कट्टरता पर तो जम कर हमला करता है पर राजनैतिक इस्लाम पर बाते करते समय कन्नी काटने लगता है । मेरी समझ है कि ऐसा कर के मुसलमानों के बीच के प्रगतिशील तबकों को अकेला छोड़ देते हैं । आज़ादी के फ़ौरन बाद से ही उनकी कपड़े लत्ते से लेकर भाषा तक एक ख़ास पहचान बनायी गयी है और राजनैतिक दलों के लिये उनकी हैसियत एक वोट बैंक से अधिक नही रह गयी है । जैसी प्रतिक्रिया कुछ सेक़ुलर तबकों से नसीर के बयान पर आयी है वह तो उन्हे कट्टरपंथियो के बीच उन्हे और हाशिये पर पंहुचा देगी ।
इस प्रसंग मे मुझे अपना एक अनुभव याद आ रहा है जो शायद मेरी बात ज़्यादा बेहतर ढंग से समझा सकें । अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के एक सेमिनार मे भाग लेते समय मैंने पाया कि हर वक्ता अपने (ज़्यादातर) मुस्लिम श्रोताओं के बीच हिंदुत्व के बढ़ते हुये ख़तरों पर बोल और तालियाँ वसूल रहा था ।

अपने अध्यक्षीय भाषण मे मैंने कहा कि आप सब हिंदुत्व का दंश अपने रोज़मर्रा की ज़िंदगी मे झेलते ही रहते हैं। इस लिये उसके ख़तरों के बारे मे आपको बताने का बहुत फ़ायदा नही है। मैं तो आपके सामने निवेदन करने के लिये खड़ा हुआ हूँ कि इतिहास के जिस मुक़ाम पर हम हैं उस मे अब अल्ला की हुक़ूमत नही क़ायम की जा सकती है और अगर कोई दुनिया के किसी भी कोने मे शरिया नाफ़िज करने की बात करता है तो वह मुसलमानों का दुश्मन है । भाषण के इस अंश पर की धर्मनिरपेक्षता सिर्फ़ भारत के लिये नही बल्कि पाकिस्तान, सऊदी अरब और ईरान के लिये भी ज़रूरी है, मेरे हिस्से मे भी तालियाँ आयीं ।

नसीरुद्दीन शाह के छोटे से बयान के निहितार्थ बहुत बड़े हैं। मुझे बड़ी ख़ुशी हुयी कि मुसलमानों के एक बड़े तबके ने उसका स्वागत किया है । अगर कट्टरपंथी उनका विरोध कर रहे हैं तब तो और भी ज़रूरी है कि देश भर का सेक़ुलर और लिबरल तबका मज़बूती से उनके साथ खड़ा हो और वे उसी तरह से अलग थलग न पड़ जायें जैसा पूर्व मे उन जैसे बुद्धिजीवियों का अपने समाज मे हश्र हुआ है ।

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