
नागरिकता कानून में दलित शरणार्थी
डॉ दिलीप अग्निहोत्री
एक तरफ विपक्ष नागरिकता कानून पर हंगामा कर रहा है,दूसरी तरफ इसके समर्थन में भी अभियान चल रहा है। इन दोनों के बीच बड़ा अंतर भी है। एक यह कि विरोध के प्रदर्शन में हिंसा हुई, जबकि समर्थन के अभियान में शांति रही। दूसरा अंतर यह कि विरोधियों की बातों में अवैध घुसपैठियों के प्रति हमदर्दी दिखाई दे रही है, जबकि इस कानून के समर्थकों की संवेदना हिन्दू,दलित बौद्ध उत्पीड़ित शरणार्थियों के प्रति है।

यह मानना पड़ेगा कि नागरिकता कानून के समर्थक अपनी भावनाओं की अभव्यक्ति संवैधानिक तरीकों से कर रहे है। उनका दावा है कि यह कानून संविधान निर्माताओं की भावना के अनुरूप है। खासतौर पर डॉ आंबेडकर का नजरिया अवैध घुसपैठियों के प्रति बिल्कुल साफ था। अवैध घुसपैठ राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए घातक होती है। जबकि इन उत्पीड़ित शरणार्थियों को भारत के अलावा कहीं भी न्याय नहीं मिल सकता। ऐसे में उनको भारत की नागरिकता देना राष्ट्रीय हित मे है। इस कानून में इन्हें नागरिकता देने की बात है।
किसी की नागरिकता छिनने का इसमें कोई प्रावधान नहीं है। ऐसे में इस कानून को लेकर भ्रम फैलाया जा रहा है। यह कार्य जिम्मेदार नेताओ के द्वारा ही किया जा रहा है। गनीमत यह कि इसके समर्थक शांतिपूर्ण ढंग से इस भ्रम का जबाब दे रहे है।
नागरिकता संशोधन अधिनियम विषय पर राष्ट्रीय अनुसूचित विकास परिषद द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में भी विरोधियों से सावधान रहने का आह्वान किया गया। इसमें पूरे देश से क़रीब तीन सौ प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।नागरिकता संशोधन अधिनियम पर पूरे देश में कुछ लोग भ्रांति उत्पन्न कर रहे हैं। वह भ्रम फैला रहे है कि की भारत के मुसलमानों कि नागरिकता ख़तरे में है। यह कथन गलत और शरारतपूर्ण है।

इस अधिनियम द्वारा पाकिस्तान, बांग्लादेश तथा अफगानिस्तान से प्रताड़ित होकर आये हिंदू, सिख , बौद्ध , पारसी और ईसाई को नागरिकता देने का प्रविधान है। नागरिकता छीनने की तो इसमें चर्चा ही नहीं है। बँटवारे के समय पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान,बांग्लादेश में तेईस प्रतिशत हिंदू सिख बौद्ध आदि अल्पसंख्यक थे , जो अब पाकिस्तान में इनकी आबादी करीब दो प्रतिशत रह गई है। बांग्लादेश में यह संख्या सात प्रतिशत है। इनमें अधिकतर दलित है। आये हुए इन शरणार्थियों में करीब अस्सी प्रतिशत दलित है। संगोष्ठी में कानून का विरोध करने वालों से पूंछा गया कि इन दलित शरणार्थी को भारतीय नागरिकता मिलने से वह खुश क्यों नहीं है। ये लोग अब कहाँ जाएँगे। कुछ लोग मुसलमानों को इस अधिनियम से अलग करने पर देश को भ्रमित कर रहे है।इन देशों से कोई मुसलमान प्रताड़ित होकर यहाँ नहीं आया है। जो अवैध घुसपैठिए है जिन्हें किसी भी हालत में नागरिकता नहीं दी जा सकती जो अधिकतर बंगलादेशी मुसलमान है। अनुसूचित जाति जनजाति आयोग उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष बृजलाल ने कहा कि विश्व का कोई संविधान अवैध घुसपैठ की इजाजत नहीं देता। इससे राष्ट्रीय सुरक्षा को नुकसान पहुंचने की आशंका रहती है। हमारे संविधान निर्माताओं ने राष्ट्रीय सुरक्षा,एकता व अखंडता को बहुत महत्व दिया। इसको नुकसान पहुंचाने वाले प्रत्येक बात से सावधान रहने की आवश्यकता है। किसी भी भारतीय मुसलमान को इस अधिनियम से कोई आशंका नहीं होनी चाहिये।अधिनियम का विरोध करने वाले देश हित के बिलकुल विपरीत बात कर रहे है। प्रदर्शनों में राष्ट्रीय ध्वज तथा बाबा साहब आम्बेडकर के चित्रों को लाकर दलितों को गुमराह किया जा रहा है। इस प्रदर्शन में दलित शामिल नहीं है। संविधान बचाओ जैसे आंदोलन निरर्थक है। संविधान मजबूत है। इसको खतरा बताने वालों की सियासत पर अवश्य खतरा आ गया है। देश इनकी वोटबैंक सियासत को समझने लगा है। इंककी राजनीति का पर्दाफ़ाश हो चुका है। आमजन को गुमराह करना,परोक्ष अपरोक्ष रूप से लोगों को उकसाना घृणित कार्य है। कुछ राजनैतिक पार्टियाँ भी अपनी वोटबैंक की राजनीति के तहत इसे हवा दे रही है।जिनकों भारत की नागरिकता मिल रही है,उनमें अधिसंख्य प्रताड़ित दलित है। नागरिकता संशोधन अधिनियम का विरोध करने वाले घोर दलित विरोधी भी है। इन्हीं लोगों ने अनुच्छेद तीन सौ सत्तर को समाप्त करने पर भी विरोध किया था। इसके समाप्त होने पर ही जम्मू कश्मीर में दलितों वर्ग के लोगों को सत्तर वर्ष बाद न्याय मिला। ऐसे में यह देश के नागरिकों की जिम्मेदारी है कि वह नागरिकता कानून की मूल भावना को समझे। यह अपने ही राष्ट्र से जुड़े उत्पीड़ित शरणार्थियों को नागरिकता देने का कानून है।
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