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आयुर्वेद भारतीय ज्ञान परम्परा की अमूल्य धरोहर

आयुर्वेद दिवस के अवसर एक भारतीय ज्ञान परम्परा एवं आयुर्वेद विषय पर संगोष्ठी

आयुर्वेद भारतीय ज्ञान परम्परा की अमूल्य धरोहर – डॉ गिरीन्द्र सिंह तोमर
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केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय एवं विश्व आयुर्वेद मिशन के संयुक्त तत्वावधान में हिन्दी पखवाड़ा के अंतर्गत आयुर्वेद दिवस समारोह में भारतीय ज्ञान परम्परा एवं आयुर्वेद” विषय पर एक वैज्ञानिक संगोष्ठी का आयोजन हुआ । जिसकी अध्यक्षता संस्थान के निदेशक डॉ ललित कुमार त्रिपाठी ने की ।

सारस्वत अतिथि के रूप में वैश्विक हिन्दी महासभा के अन्तर्राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ विजयानंद एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में राजकीय आयुर्वेद महाविद्यालय हण्डिया के प्राचार्य डॉ केदार नाथ उपाध्याय, मोतीलाल नेहरु मेडिकल कॉलेज की पूर्व शोध अधिकारी डॉ शांति चौधरी एवं क्षेत्रीय आयुर्वेद अधिकारी डॉ मनोज कुमार सिंह उपस्थित रहे । इस अवसर पर विश्व आयुर्वेद मिशन के संस्थापक अध्यक्ष एवं आरोग्य भारती के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य डॉ जी एस तोमर ने मुख्य वक्ता के रूप में अपना उद्बोधन दिया ।

प्रारम्भ में धन्वंतरि पूजन अर्चन के बाद कार्यक्रम की संयोजक डॉ अपराजिता मिश्रा ने अतिथियों का स्वागत व अभिनंदन किया । उसके बाद विषय प्रवर्तन करते हुए मुख्य वक्ता प्रो.(डॉ.) गिरीन्द्र सिंह तोमर ने वेदों को सृष्टि के उत्पत्ति काल से ही ज्ञान का अजस्र स्रोत बताया । उन्होंने कहा कि अथर्ववेद का उपांग होने के नाते आयुर्वेद की प्राचीनता स्वत: प्रमाणित है । भारतीय वांग्मय में आयुर्वेद, योग, प्राकृत विज्ञान, गणित, ज्योतिष, खगोल विज्ञान, विमान शास्त्र एवं धातु विज्ञान की समृद्ध, बहुआयामी, अद्भुत एवं अकल्पनीय ज्ञान परम्परा का दिग्दर्शन होता है । इसकी वैज्ञानिकता आज सम्पूर्ण विश्व मानने लगा है । मंत्रदृष्टा ऋषियों ने अपनी दिव्य दृष्टि एवं अनुभव से जो ज्ञान तत्कालीन ग्रंथों में उकेरा है वह आज के वैज्ञानिक मापदंडों पर पूरी तरह खरा उतर रहा है ।

डॉ तोमर ने कहा कि आयुर्वेद मात्र एक चिकित्सा विधा ही नहीं सम्पूर्ण जीवन दर्शन है। इसकी गुणवत्ता पूर्ण औषधियाँ जहाँ प्रभावी एवं निरापद हैं वहीं इसकी आदर्श जीवनशैली वैश्विक धरातल पर अनुकरणीय एवं लोकप्रिय सिद्ध हो रही हैं। उन्होंने आगे कहा कि भारतीय ज्ञान- विज्ञान परंपरा न केवल प्राचीन काल में बल्कि आज भी विज्ञान, चिकित्सा, गणित और अन्य क्षेत्रों में अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए हैं। भारत के मनीषियों और वैज्ञानिकों का योगदान आने वाले समय में भी अमूल्य होगा। भारतीय ज्ञान की यह परंपरा हर पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत है। इस अवसर पर डॉ तोमर ने काव्य पाठ भी किया । विशिष्ट अतिथि के रूप में अपने उद्बोधन में डा. विजयानंद ने हिन्दी के महत्व पर प्रकाश डाला एवं काव्य पाठ किया ।

डॉ केदार नाथ उपाध्याय ने आयुर्वेद की बढ़ती हुई लोकप्रियता को शिखर तक पहुँचाने के लिये इसे जन जन तक पहुंचाना होगा । डॉ शांति चौधरी ने आयुर्वेद को निरापद एवं प्रभावी चिकित्सा पद्धति बताते हुए इसे समय की माँग बताया । अपने अध्यक्षीय संबोधन में डॉ ललित कुमार त्रिपाठी ने आयुर्वेद को देश की अमूल्य धरोहर बताया ।

उन्होंने कहा कि आयुर्वेद हमारी परम्परा में इस तरह समाया हुआ है कि इसे भारतीय संस्कृति एवं जीवनशैली से पृथक नहीं किया जा सकता । हमारी ज्ञान परम्परा इतनी समृद्ध एवं शाश्वत है कि इसे आज के वैज्ञानिक युग में भी नकारा नहीं जा सकता । हर नवीन अन्वेषण के मूल में भारतीय ज्ञान परम्परा के छिपे हुए बीज हमारी समृद्ध धरोहर के प्रमाण दे रहे हैं ।

राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय हंडिया के चिकित्साधिकारी डॉ अवनीश पाण्डेय ने कहा कि आयुर्वेद दिवस को मनाने के लिए आयुष मंत्रालय, उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दिए गए दिशा निर्देश के अनुसार आख़िरी छोर पर खड़े हुए व्यक्ति तक आयुर्वेद पहुँचाना है।

कार्यक्रम का संचालन डॉ अवनीश पाण्डेय ने किया एवं धन्यवाद ज्ञापन डा. अंकित मिश्रा ने किया।इस अवसर पर डा.अवधेश कुमार त्रिपाठी, डा.आशीष कुमार मौर्य, डा.सुरेश पाण्डेय, डा.अंजनी कुमार, डा.यशवंत त्रिवेदी, अश्वनी लंके एवं छात्र छात्राएं मौजूद रहे।

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