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“हमें यह चिंता करनी चाहिए कि भारत की ये बोलियां रोमन की जगह देवनागरी लिपि में लिखी जाएं”: प्रोफेसर दिनेश कुमार चौबे

हिन्दी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित ऑनलाइन व्याख्यानमाला में बोलते हुए पूर्वोत्तर पर्वतीय विश्वविद्यालय, मेघालय के हिन्दी विभाग के प्रोफेसर दिनेश कुमार चौबे ने कहा कि पूर्वोत्तर भाषा वैविध्य के लिए प्रसिद्ध है। वहां असमिया, बंगाली और नेपाली के साथ साथ बोडो, कछारी, जयंतिया, कोच, गारो, नागा, खासी जैसी बोलियां भी प्रचलित हैं।

उन्होंने इन बोलियों द्वारा रोमन लिपि के प्रति अधिक आकर्षण पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि हमें यह चिंता करनी चाहिए कि भारत की ये बोलियां रोमन की जगह देवनागरी लिपि में लिखी जाएं। उन्होंने कहा कि हम शब्दों में नहीं वाक्यों में सोचते और बोलते हैं। भाषा दोहराव से आती है। स्वन, शब्द, पद, वाक्य यह सब मिलकर भाषा की रचना करते हैं। अवैज्ञानिक भाषा के कारण भाषानुवाद की समस्याएं जटिल होती जाती हैं।

व्याख्यानमाला के दूसरे सत्र में बोलते हुए उत्तर बंग विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल के हिन्दी विभाग के आचार्य प्रोफेसर सुनील कुमार द्विवेदी ने कहा कि सामाजिक सचेतनता के लिए पारिस्थितिक विमर्श जरूरी है। अतिरिक्त की चाह इस विमर्श का केंद्रीय प्रश्न है। उन्होंने कहा धरती सबकी है। हमें साहचर्य की वृत्ति अपनाना चाहिए। भौम सदाचार, साकल्यता, समावेशन और हरित आध्यात्मिकता के माध्यम से हम पारिस्थितिक दर्शन को समझ सकते हैं। यह पश्चिम से आयातित दर्शन नहीं है। जब तक हम ग्रीड और नीड में अंतर नहीं करेंगे, पुनर्चक्रण में विश्वास नहीं करेंगे, इस विमर्श के मकड़जाल में उलझे रहेंगे।

व्याख्यानमाला में बोलते हुए हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर कृपाशंकर पाण्डेय ने हिन्दी काव्य में अभिव्यक्त और विशेष रूप से कामायनी के पारिस्थितिक दर्शन पर विचार व्यक्त किए।

व्याख्यानमाला के संयोजक, हिन्दी विभाग के डॉ. राजेश कुमार गर्ग ने कहा कि पूर्वोत्तर की बोलियों द्वारा रोमन लिपि अपनाए जाने का सवाल बहुत बड़ा सवाल है और इस सवाल के निहितार्थों को समझने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा की पारिस्थितिक जागरूकता समय की आवश्यकता है यदि यह जागरूकता नहीं होगी तो आसन्न संकटों का समाधान कठिन होगा।

धन्यवाद ज्ञापन हिन्दी विभाग के डॉ जनार्दन ने किया।

व्याख्यानमाला हेतु देश के 24 राज्यों से कुल 660 नामांकन अनुरोध प्राप्त हुए, इनमें 237 प्राध्यापक, 107 शोध छात्र और 316 छात्र हैं। जिनमें 377 पुरुष और 283 स्त्रियां शामिल हैं।

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