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लोकसभा चुनाव 2024: माहौल बदलने लगा है…? Sneh Madhur 

Sneh Madhur senior journalist

माहौल बदलने लगा है…?

क्या योगी 2029 तक मुख्यमंत्री बने रहेंगे?

Sneh Madhur 

वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के आखिरी दो चरण ही रह गए हैं और राष्ट्रीय स्तर के मीडिया पटल पर हर रोज़ अवतरित होकर ज़ुबानी हाथापाई करने वाले पंजीकृत प्रवक्ता दहाड़ दहाड़ कर कहने लगे हैं कि माहौल बदलने लगा है, मोदी की लहर कमजोर पड़ने लगी है और भाजपा का ग्राफ बहुमत से नीचे की तरफ तेज़ी से गिरने लगा है। ये ही लोग पिछले साल तक यह मानते थे कि मोदी को हराना असंभव है, फिर कहने लगे कि कड़ी टक्कर देंगे, जीतने नहीं देंगे। अपेक्षित कम मतदान प्रतिशत देखकर उछलने लगे और दावा करने लगे कि मोदी मैजिक खत्म हो गया और चुनाव के अंतिम पायदान में पहुंचने तक तो उनका जोश इलेक्ट्रॉनिक तरंगों के माध्यमों से गुंजायमान होने लगा है कि भाजपा दो सौ के अंदर सिमट रही है। उनके जोश और होश में कोई तालमेल नहीं बैठ पा रहा है। जोश इतना हिलोरें मार रहा है कि उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तो मंचों से कहने लगे हैं कि उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में 79 सीट भाजपा के हाथ से निकल चुकी है और क्वेटा (वाराणसी) में मोदी को कड़ी टक्कर दी जा रही है। जब राष्ट्रीय स्तर के एक राजनीतिक की यह भविष्यवाणी है तो राष्ट्रीय स्तर के प्रवक्ताओं के मानसिक दिवालियापन को समझा जा सकता है।

लोग कह रहे हैं कि देश का माहौल बदल रहा है, यह वक्तव्य बिल्कुल सही है। एक अकेला जिस तरह से सम्पूर्ण राष्ट्र की नस नस में समा गया है और फैलता ही जा रहा है, ऐसी कोई मिसाल कहीं नहीं मिलती है। साबुन के बुलबुले की तरह की शख्शियतें तो बहुत निकली हैं जैसे केजरीवाल, अण्णा हजारे, टी एन शेषन आदि, इंदिरा जी भी लेकिन लंबे समय तक नहीं, राजीव गांधी भी लेकिन इंदिरा जी की शहादत की सहानुभूति लहर पर ही, संजय गांधी एक तानाशाह मात्र इमरजेंसी तक, महात्मा गांधी लेकिन बिना शासन के, लाल बहादुर शास्त्री जिनकी अपील पर पूरे देश ने एक वक्त का भोजन छोड़ दिया था आदि। लेकिन मोदी जैसी शख्सियत नहीं देखी गई जो लगातार 25 वर्षों से शासन में है, जो न तो कभी चुनाव हारा और न ही पार्टी को हारने दिया, वह भी व्यक्तिगत प्रयास से! तीसरी बार प्रधानमंत्री बनकर मोदी बहुत से रिकॉर्ड बनाएंगे और नई इबारत लिखेंगे।

जो लोग कहते हैं कि मोदी की लहर शिथिल पड़ गई है, वे यह नहीं बता पाते कि मोदी ने ऐसा क्या किया है जिससे उनका प्रभाव क्षीण हो रहा है? मोदी विरोधियों की यह भी शिकायत रही है कि मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करते। शिकायत सही है लेकिन मोदी क्या पत्रकारों से बात नहीं करते? मोदी के सैकड़ों पत्रकारों से व्यक्तिगत संबंध हैं और वे जानते हैं कि मोदी किसी को व्यक्तिगत रूप से लाभान्वित नहीं करते, वह समूह को लाभ देते हैं, व्यक्ति को नहीं, इसलिए अधिकतर पत्रकार और मीडिया संस्थान उनसे मुंह फुलाए बैठे रहते हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस में तो एक पत्रकार एक ही सवाल पूछ सकता है, मोदी ने कितने ही लंबे लंबे इंटरव्यू एक एक पत्रकार को दिए हैं, समूह में दिए हैं कि जो चाहे पूछ लो, सारे सवाल भी खत्म हो जाते हैं! किसी और ने इतने सवालों के जवाब दिए हैं?

मतदाताओं की शांति दिखाती है कि वे निश्चित हैं अपने निर्णय को लेकर, कोई शक सुबहा नहीं है, वोट तो मोदी को ही देना है या मोदी को तो नहीं देना है! किसी ने यह सोचा है कि वर्ष 2014 और 2019 में जितने लोगों ने मोदी को वोट दिया था, उनमें से कितने प्रतिशत लोग मोदी को वोट नहीं देंगे इस बार और क्यों? असली सवाल यही है और यही विपक्ष की चिंता है कि जिन लोगों ने मोदी को पिछले दो चुनावों में वोट नहीं दिया था, उनमें से कितने प्रतिशत लोग इस बार मन बदलकर मोदी को वोट दे रहे हैं और क्यों? क्या उनकी सोच में परिवर्तन आया है और मोदी के प्रति उनकी घृणा खत्म हो पाई है, ऐसे लोगों की संख्या कितनी बढ़ी है, यही देखना है इस बार!

मोदी ने एक बड़ा परिवर्तन तो किया है कि पार्टी आधारित चुनाव कर दिया है, प्रत्याशी का महत्व खत्म कर दिया है। पहले होता यह था कि प्रत्याशी की लोकप्रियता, उसकी जाति, उसकी उपलब्धता और उसकी दबंगई के आधार पर उसे वोट मिलते थे। मोदी ने यह कर दिया है कि गाड़ी हमारी तो ड्राइवर क्लीनर भी हमारा, आप हम पर भरोसा करो, हमारे कर्मचारी पर नहीं! जैसे आप ब्रांड का सामान खरीदते हैं उसकी वर्षों की साख के आधार पर! अब प्रत्याशी चुनने की उधेड़बुन से मतदाताओं को मुक्त कर दिया है मोदी ने, यह बड़ा बदलाव है।

विपक्ष महंगाई, बेरोजगारी, नारी सुरक्षा, अपराध आदि जैसे विषयों को मुद्दा बना रहा है जो पारंपरिक मुद्दे हैं जिनको लेकर लोग विष वमन तो कर सकते हैं लेकिन वे उसके निर्णय को प्रभावित नहीं करते हैं।

जहां तक समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन की बात है तो इसमें कोई बड़ी रणनीति नज़र नहीं आती सिवाय इसके कि मुसलमानों के वोट को एकमुश्त लेकर हार का अंतर कम करना ही है। लोग यह क्यों भूल जाते हैं 2014 में जब सपा की सरकार थी, तब उसने मात्र पांच सीटें जीती थीं। 2019 में जब बसपा और रालोद का गठबंधन था तो भी मात्र पांच ही सीटें जीती थीं। 2024 में मात्र कांग्रेस से गठबंधन है, न बसपा है, न रालोद और न ही ओमप्रकाश राजभर, ऐसे में क्या सपा की पांच सीटें भी बच पाएंगी? जहां पर यादव और मुस्लिमों का मत प्रतिशत पचास से अधिक है, सिर्फ उन्हीं सीटों पर जीत की तरफ बढ़ते हुए दिख सकते हैं, जीत सुनिश्चित नहीं है। 

लोग भूल गए होंगे कि वर्ष 2019 की रायबरेली की सीट को बचाने के लिए सोनिया गांधी को मुलायम सिंह यादव जी से गुहार लगानी पड़ी थी और मुलायम सिंह यादव ने सपा के जिस विधायक मनोज पांडे की मदद से सोनिया गांधी की सीट बचाई थी, वह मनोज पांडे इस समय और ओमप्रकाश राजभर भाजपा में शामिल हो चुके हैं। रायबरेली में सोनिया गांधी की नैय्या पार लगाने वाले अखिलेश सिंह दिवंगत हो चुके हैं और उनकी बेटी अदिति सिंह भाजपा में शामिल हो चुकी हैं, ऐसे में ऐसी कौन सी एक भी वजह है  जिससे दावा किया जा सकता है कि राहुल गांधी चुनाव जीत रहे हैं सिवाय इसके कि वह रसूखदार खानदान के शहजादे हैं। मोदी की ज़माने में शहजादों का युग उसी तरह से खत्म हो चुका है जिस तरह से इंदिरा गांधी ने प्रिवी पर्स बंद करके राजाओं के गौरव का युग खत्म कर दिया था। कोई चमत्कार ही राहुल गांधी को जिता सकता है, इंतजार है उस चमत्कार का।

अंतिम मुद्दा, विपक्ष यह नहीं कहता कि मोदी आयेंगे तो संविधान बदल देंगे! विपक्ष यह कहता है कि चार सौ सीट पाएंगे तो संविधान बदल देंगे, यानी असली चिंता चार सौ की संख्या पार न कराने की है! यह चिंता उनकी है जो लगातार संविधान बदलते रहे हैं,  80 बार कांग्रेस ही संविधान में संशोधन कर चुकी है, इस तथ्य से जनता वाकिफ हो चुकी है। मेरा यह मानना है कि अगर संविधान बदल भी जाता है तो क्या बदलेगा और इससे क्या फर्क पड़ता है? क्या होगा नया संविधान? नए संविधान का निर्माण भी तो ये निर्वाचित जन प्रतिनिधि ही करेंगे! वे चाहते हैं कि चुनाव हों लेकिन चुने गए प्रतिनिधियों पर अविश्वास? लोकतंत्र खत्म हो जाएगा? तो क्या लोकतंत्र अभी है देश में? आप तो कहते हैं कि लोकतंत्र खत्म हो गया है, तो फिर क्या खोएंगे? आम जनता चुनकर नहीं पहुंच पाएगी लोकसभा में? तो क्या आप मानते हैं कि कोई भी व्यक्ति जब चाहे चुनाव लड़कर लोकसभा पहुंच सकता है और लोक सभा पहुंचकर जनता की भलाई के काम करता है?

वैसे विपक्ष द्वारा संविधान बदलने की बात कहना बहुत गलत नहीं है, लेकिन असल में बड़ा संविधान संशोधन करने की तैयारी युद्ध स्तर पर जारी है जिसके बारे में विपक्ष को जानकारी है लेकिन वह छिपा रहा है। नए प्रस्तावित संविधान संशोधन के अनुसार वर्ष 2029 में जो लोकसभा का चुनाव होगा, उसके साथ ही सभी विधानसभाओं के भी चुनाव होंगे। इसके लिए बड़े संविधान संशोधन करने होंगे और आप समझ सकते हैं कि इस संशोधन की वजह से योगी जी 2029 तक मुख्यमंत्री बने रहेंगे, यह सोचकर ही विपक्ष का दिल बैठा जा रहा है। लोकसभा सीटों का परिसीमन भी होगा और एमपी की संख्या बढ़कर साढ़े आठ सौ तक पहुंच सकती है। महिला सदस्यों की संख्या 33% प्रतिशत अनिवार्य रूप से हो जायेगी। इस तरह के ढेर सारे संशोधनों की तैयारी हो चुकी है, आप आज जिस लोकसभा या विधान सभा में हैं, कल उसका नाम बदला हुआ मिलेगा। कल कोई यह दावा नहीं कर पायेगा कि यह उसकी पारिवारिक सीट है।

जीत विचार की होनी चाहिए, नीति, सिद्धांत और नीयत की होनी चाहिए, न कि व्यक्ति की। व्यक्ति को तो आप कभी भी बदल सकते हैं लेकिन अगर विचार मर जाता है तो पूरी की पूरी पीढ़ी खत्म हो जाती है। जब अच्छी नीयत वाला व्यक्ति हारता है तो पूरी की पूरी कायनात हिल जाती है, ब्रह्मांड तहस नहस हो जाता है। मैं इस फेर में नहीं पड़ता कि भाजपा को कितनी सीटें मिलेंगी, 334 या 378 या 412, भाजपा बहुमत के साथ सरकार बनाएगी, इसमें कोई शक नहीं है। हां, भाजपा को मिली सीटों की संख्या यह जरूर तय करेगी कि लगातार दस वर्षों तक पूरी शिद्दत के साथ सबकी सेवा करते हुए और अपनी एक उंगली पर संपूर्ण ब्रह्मांड को उठाए रखने वाले मोदी को इस देश की जनता कितना अपने माथे से लगाती है जो अगले दो दशकों की रणनीति तैयार कर रणभूमि में जनता जनार्दन की अदालत में सिर झुकाए खड़ा है। 

कुछ “अभक्त” लोग अगर मुझे “भक्त” निरूपित करते हैं तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है, सबके अपने मौलिक विचार हो सकते हैं, मेरे भी अपने हैं। मैं जनता की आवाज़ होने का दावा नहीं करता हूं। मैं अगर शाकाहारी हूं तो अपने घर में, यह बात दूसरी है कि कुछ अराजक लोग शाकाहारियों के घर में घुस कर मांसाहार पर प्रवचन देने लगते हैं।

अगर भाजपा की सीटें कम होती है तो राजनीतिक पंडितों के लिए यह मंथन करने का विषय हो सकता है कि इतनी मेहनत, समर्पण और हर संभव प्रयास और सारे राजनीतिक दांव चल लेने के बाद भी विविधताओं से भरे पूरे देश में मोदी पचास प्रतिशत लोगों के दिलों में भी आखिर जगह क्यों नहीं बना पाए या अपने भक्तों को मतदान करने के लिए उत्साहित क्यों नहीं कर पाए? हालांकि इस बड़े और पुराने लोकतंत्र में बंपर जीत के दो ही उदाहरण मिले हैं, एक आपातकाल के बाद जनता पार्टी की विजय और दूसरा इंदिरा जी की शहादत के बाद सहानुभूति की लहर के आधार पर राजीव गांधी की चार सौ से ऊपर वाली जीत। अपनी लोकप्रियता से कोई भी  बड़ा नेता बड़ी जीत कभी हासिल नहीं कर पाया है अभी तक। हालांकि 2014 और 2019 का चुनाव मोदी की व्यक्तिगत लहर के आधार पर ही जीता गया था लेकिन अगर इस बार भी ऐसा होता है या पहले से ज्यादा सीटें आती हैं तो यह भी ऐतिहासिक ही होगा।

कुछ असंतुष्ट भाजपाइयों का यह भी कहना है कि लोग मोदी से नाराज़ बिलकुल नहीं हैं लेकिन प्रत्याशियों के चयन से संतुष्ट नहीं हैं, तमाम बेईमानों तक को टिकट कई कई बार मिल जा रहा है, उनकी पहुंच हाई कमान तक है और हाई कमान उनकी करतूतों की तरफ ध्यान नहीं दे रहा है। इसलिए मोदी भक्त भी ऐसे प्रत्याशियों को वोट नहीं देंगे। ऐसा संभव है और इसका प्रभाव पड़ सकता है लेकिन प्रभाव कितना पड़ेगा, क्या यह असंतोष जीत को हार में बदल सकता है, इसका अनुमान लगाना मुश्किल है क्योंकि हर दल में प्रत्याशियों को लेकर असंतोष देखा जाता रहा है लेकिन हरदम यह असंतोष उनकी हार का कारण नहीं बन पाता है।

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