Home / Slider / कारगिल दिवस पर “बजिहैं तबला अब धीन-धीन चढिबै इक-इक पै तीन-तीन। खुपड़ी मजबूत किहे राख्यो परिहैं बेभाव, अभै का भा..!”

कारगिल दिवस पर “बजिहैं तबला अब धीन-धीन चढिबै इक-इक पै तीन-तीन। खुपड़ी मजबूत किहे राख्यो परिहैं बेभाव, अभै का भा..!”

 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस के अवसर पर कारगिल युद्ध के वीर सैनिकों को समर्पित एक अविस्मरणीय कविता

रचनाकार-पँ धर्मपाल अवस्थी

‘अभै का भा’
————–

तुम देखत जाव अभै का भा।

चोरी-चोरी घुसि बैठे हौ
टीलन पै तेहिते ऐंठे हौ।
तुम तीन चोर अस आइ लिह्यो
अब लौं नौ पथिक नचाइ लिह्यो।
गोली-गोला बरसाइ चुक्यो
आधा किस्सा दोहराइ चुक्यो।
अब पूरी करब कहानी हम
दिखलैबै तुम्हैं जवानी हम।
बजिहैं तबला अब धीन-धीन
चढिबै इक-इक पै तीन-तीन।
खुपड़ी मजबूत किहे राख्यो
परिहैं बेभाव, अभै का भा।
तुम देखत जाव………….।।

सामने परौ तो सेंव-सेंव,
बिल्ली अस करिहौ मेंव-मेंव।
चुप्पै पाछे ते करौ वार
का यहै बहदुरी है तुम्हार।
तुम बाज न अइहौ बातन ते
दिउता हौ पूरे लातन के।
तुम कई दफा अजमाइ चुक्यो
ताकत औ मुँह की खाइ चुक्यो।
पै अस जाहिल नाख्वांदा हौ
फिर मरै बदे आमादा हौ।
लगी जैहै रण मा पता दाल-
आटा का भाव,अभै का भा।
तुम देखत जाव…………..।।

जो बहुत चढ़ो है रंग तुम्हैं
जो बहुत पियारी जंग तुम्हैं।
जो बड़े मर्द के पूत हत्यो
जोधा जाँबाज अकूत हत्यो।
तौ आ जात्यो मैदानन मा
हौ काहे छिपे पहारन मा।
ना परै लुहारी मार चहौ
सकुसल खुपरी के बार चहौ।
तौ दुम दबाइ के भागि लेव
जो मरिबे ते उद्धार चहौ।
हम शुरु भएन तौ फिर देखब
ना ठाँव-कुठाँव,अभै का भा।
तुम देखत जाव…………..।।

हैं शिव-स्वरूप गिरिश्रृंग सबै
हैं एकलिंग के लिंग सबै।
हर सैनिक शिव का नंदी है
शिवमस्तक शिखर-बुलन्दी है।
ई सैनिक हैं रखवारी मां
है चूक न चौकीदारी मा।
तुम उनते करन चल्यो संगर
मजहब के ओढ़ि-ओढ़ि डम्बर।
अकड़े-अकड़े ऐंठे-ऐंठे
तुम हौ शिवलिंगन पै बैठे।
ई सनकि गये तो कबरौ मा
सोहरैहो घाव,अभै का भा।
तुम देखत जाव…………।।

छातिन मा घाव मिले उनके
रण मा तन खेत रहे जिनके।
लखि कै तन-त्याग-अदा बाँकी
भै कोख धन्य धरती माँ की।
मर गये अमन की खातिर जो
मर गये वतन की खातिर जो।
यश उनका महकै महर-महर
उइ मरे कहाँ, हुइ गये अमर।
उनके बलिदानन का बन्दन
उनकै पग-धूरि हमैं चन्दन।
श्रद्धा के सुमन सदा पैहें,
उइ जुग-जुग याद करे जइहैं।
उफनैहैं वतन-परस्ती के
घर-घर दरियाव,अभै का भा।
तुम देखत जाव…………..।।

पुरखन कै आनोबान लिए
पानीदारन कै सान लिए।
दुसमन के मनसूबन पै पानी
फेरन के अरमान लिए।
तजि कै सारे सुखसार चले
तजि नार नई सुकुमार चले।
प्रानन ते प्रिय परिवार छाँड़ि
उइ छाँड़ि सकल संसार चले।
जीबे को ढंग निखारि चले।
ई पति हैं ऐसी नारिन के
ई बेटा उन महतारिन के।
जो घृणा करैं मुँह फेरि लेंय
लखि पीठी घाव,अभै का भा।
तुम देखत जाव……….।।

है चाह चमन आबाद रहै
पुर-अमन वतन यह साद रहै।
या जान रहै न रहै लेकिन
भारत माता आजाद रहै।
अस निश्चय भरा हृदय जिनके
को ठहरि सकै आगे उनके।
ई जगजननी के छौना सब
भारत के पूत-पुतौना सब।
इनके आगे का जग वाले
बौना सब औना-पौना सब।
इन सिंहन की हुंकारन ते
इन वीरन की ललकारन ते।
घायल इलाज जो करा रहे
उन ज्वानन के उदगारन ते-
मुरदौ उठि भरिहैं हुंकारें
देख्यो बदलाव,अभै का भा।
तुम देखत जाव………….।।

रण मा शहीद भे नौजवान
पहुँचैं जब गाँवन मा विमान।
हर आँखी ते बहि चलै नीर
को थाह सकै बेथाह पीर।
बहिनी राखी केहिके बँधिहैं
बूढ़ी केहिका बेटवा कहिहैं।
भौजी सब गाँव भरे की अब
होरी मा केहिके रँग डरिहैं।
है गरब भरी छाती बिसाल
ज्वानन की आँखी लाल-लाल।
हम नहीं फौज मा हाय भएन
सीने मा सबके है मलाल।
बूढ़न का ठंढा खून गरम
भा तेज बहाव,अभै का भा।
तुम देखत जाव…………।।

उइ भारत मैया की खातिर
ई सोन चिरैया की खातिर।
पानी अस खून बहा दीन्हेन
आपन सर्वस्व लुटा दीन्हेन।
उइ अपने सोन-पींजरन ते
प्रानन के सुआ उड़ा दीन्हेन।
जिन जननिन के उइ जात रहैं
जिन बहिनिन के अहिबात रहैं।
हम सब उनके हन कर्जदार
भारत के जन-जन बेशुमार।
जब लौं धरती मा बसै गंध
जब लौं नभ सूरज और चंद।
तब लौं भारत की माटी का
कण-कण उनका एहसानमंद।
सुख-दुख मा उनके साथ रहब
हम सहज सुभाव,अभै का भा।
तुम देखत जाव…………।।

*** *** *** ***

 स्व पँ धर्मपाल अवस्थी, कानपुर की कविता है जो उनके संग्रहों में प्रकाशित हुई थी। उनका स्वर्गवास 2008 में हो गया है। उनके 6 कविता संग्रह प्रकाशित हुए हैं।

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