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अनूप कपूर: “खुद को भक्त मान मुझे कृष्ण बना रहा”

अनूप कपूर

भारतीय दर्शन के छह आस्तिक दर्शन सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, वेदान्त और तीन नास्तिक दर्शन चार्वाक, बौद्ध, जैन प्रमुख हैं। ये कविता मानव के अपने अस्तित्व की खोज पर केंद्रित है:

सदियों से जो अपना
अस्तित्व स्वयं तलाश रहा
मेरे वजूद का स्वरूप
वो दावे से बतलाता है।

जड़ चेतन को मान
त्रिगुण में सत्य को खोज रहा
कभी स्वयं में लीन
वो योग समाधि लगाता है।

न्यायशास्त्र के सूत्र पढ़
मुझे प्रमाण में ढूँढ रहा
कभी ऊर्जा का स्त्रोत
सूक्ष्म परमाणु में पाता है।

वेदज्ञान से अभिभूत हो
कर्मकांड को अपना रहा
अद्वैत के सिद्दाँत से
कभी ब्रह्मज्ञान को पाता है।

खुद को भक्त मान
मुझे कृष्ण बना रहा
अपने से अलग बताकर
वो मुझमें लीन हो जाता है।

सुख ही जीवन जान
कभी जीवन में दुःख देख रहा
सत्य के दृष्टिकोण अनेक
मोक्ष को लक्ष्य बतलाता है।

भटक रहा है मानव
दुविधा में पड़ जाता है
क्यों किसी के सत्य के
बहकावे में आ जाता है।

झांक ले भीतर अपने
सत्य अपना मिल जाएगा
अपने अंदर के जीव को
अस्तित्व ज़रूर मिल जाएगा
अस्तित्व ज़रूर मिल जाएगा।।

अनूप कपूर

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