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“मनोज़ झा की पार्टी में ही “बाभन – ठाकुर” को लेकर बमचक शुरू हो गई है”: पी के तिवारी IPS

कुआँ ठाकुर का, स्त्री विमर्श प्रो मनोज झा जी का 

पी के तिवारी IPS 

आजकल ठाकुर के कुएँ को लेकर चारों तरफ हंगामा बरपा है। “नारी शक्ति वंदन अधिनियम विधेयक 2023” पर बोलते – बोलते प्रोफेसर मनोज़ झा, सांसद राज्यसभा (राजद), अपनी रौ में ओमप्रकाश बाल्मीकि की कविता ‘ठाकुर का कुआँ‘ सुना बैठे। हालांकि उसी वक्त उन्होंने ठाकुर शब्द को जाति सूचक न बता के वर्ग सूचक बता करके कविता का दंश कुछ कम करने की कोशिश भी की, परंतु अब उनकी अपनी पार्टी में ही बाभन – ठाकुर को लेकर बमचक मची है।

ओम प्रकाश बाल्मीकि जी हिन्दी साहित्य के अग्रणी हस्ताक्षर हैं । दलित विमर्श उनका भोगा हुआ अतीत है जो उन्होंने बराला, मुज्ज़फ़रनगर से प्रारंभ करके जीवन पर्यंत अनुभव किया होगा । उनकी रचनाओं में दलित की विवशता, पीड़ा और अकुलाहट यों ही नहीं झलकती । उनके दलित विमर्श की अधिकांश बातों से शायद ही कोई असहमत हो, सिवाय इसके कि ग़ैर दलित साहित्यकार दलितों की पीड़ा को शब्दों में उतना वास्तविक नहीं उकेर सकते हैं क्योंकि वह उनका भोगा यथार्थ नहीं है ।

बाल्मीकि की कविता की मौलिकता पर बिना प्रश्नचिन्ह लगाए इसकी तुलना प्रेमचंद की १९३२ में लिखी कहानी ‘ठाकुर का कुआँ’ से की जा सकती है । तब आधुनिक हिन्दी लेखन का शुरुआती दौर था , लेखक का एक सामाजिक सरोकार था । दलित विमर्श तब तक साहित्य की अलग विधा नहीं थी।

प्रेमचंद ने निराला एवं राहुल सांकृत्यायन से कहीं आगे बढ़कर समकालीन दलित जीवन की दारुण व्यथा को व्यक्त किया है । ‘ठाकुर का कुआँ ‘ दूध का दाम ‘ सद्गति ‘ हो या ‘कफ़न’ प्रेमचंद के लिए मानो यह भोगा हुआ यथार्थ हो।

*‘ठाकुर का कुआँ ‘ कहानी में प्रेमचंद गाँव में रहने वाले दलित समाज के मानवाधिकार हनन , शोषण, एवं घोर निराशाजनक एवं शोचनीय जीवनयापन को वर्णित करते हैं । बीमार जोखू जो पानी पीने जा रहा है, वह दूषित है, बदबू के कारण उसे पीना संभव नहीं है । गंगी उसकी पत्नी है , वही प्रेमचन्द्र की दलित नायिका है , जो प्रेमचन्द्र के दलित विमर्श की ध्वजवाहिका भी है । उसे अपने बीमार पति के लिए साफ़ पानी कहीं से लाना है । विकल्प सीमित हैं , या तो साहूकार का कुआँ है या फिर ठाकुर का ।

जोखू ने गंगी को खूब समझाने की कोशिश की ‘हाथ पाँव तुड़वा आएगी और कुछ न होगा । बैठ चुपके से। ब्रह्म- देवता आशीर्वाद, ठाकुर लाठी मारेगें , साहूजी एक के पाँच लेंगे। ग़रीबों का दर्द कौन समझता है! हम तो मर भी जाते हैं तो कोई दुआर भी झाँकने नहीं आता , कंधा देना तो बड़ी बात है। ऐसे लोग कुएँ से पानी भरने देंगे?*

ज़ाहिर है कि प्रेमचंद दलित उत्पीड़न के तीनों किरदारों पर समान रूप से निर्मम हैं । उनका दलित विमर्श फ़िल्मी नहीं है जिसमें विलेन प्रायः ठाकुर ज़मींदार है । दलित उत्पीड़न कहीं बाहर से आरोपित नहीं है । यह समाज से उद्भूत एक बड़ी कुरीति है । प्रेमचंद की रचनाधर्मिता समाज के प्रति समग्र दृष्टि रखती है । उनके लिए अत्याचार एवं शोषण के प्रति आँख मूँद कर बस आशीर्वाद देने वाले ब्रह्म-देवता हों या सूदखोरी से शोषण करने वाला साहूकार हो या बेगार कराने वाला ठाकुर , तीनों ही शोषण को पोषित कराने वाली व्यवस्था के अनिवार्य अंग के प्रतीक चिन्ह हैं।

प्रेमचंद का ठाकुर ग़रीब गड़ेरिये की भेड़ चुराकर खाने वाला है, तो पंडित के घर सालों साल जुआँ खिलाया जाता है, साहूकार घी में तेल मिला कर मिलावट खोरी कर रहा है। दलित केवल अछूत टोलों में रहने वाले गरीब ग़ुरबा ही नहीं हैं। दलित वो बड़े घर की महिलाएँ भी हैं , जो पुरुष प्रधान व्यवस्था में घुटन भरी ज़िंदगी जीने के लिये अभिशप्त हैं । प्रेमचंद के शब्दों में ‘हाँ, यह तो नहीं हुआ कि कलसिया उठाकर भर लाते। बस हुकुम चला कि ताज पानी लाओ, जैसे हम लौंडिया ही तो हैं।

मनोज झा जी से दो ग़लतिया हुई । उन्होंने ग़लत ‘ठाकुर का कुआँ ‘ उद्धृत कर दिया । प्रेमचंद का दलित विमर्श फ़िल्मी नहीं था जहां खल पात्र बस ठाकुर ही होता था । भारतीय इतिहास क्षत्रियों के त्याग एवं बलिदान की गाथाओं से पटा पड़ा है। यदि भाव स्त्रियों की दलित तुल्य स्थिति दिखाने की थी तो भी प्रेमचंद ज़्यादा सटीक उदाहरण थे ।

लेखक उत्तर प्रदेश में सूचना आयुक्त हैं

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