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“दोषी के अधिकारों पर जोर नहीं “: कोर्ट

निर्भया गैंगरेप के दोषियों की फांसी में हो रही देरी के बीच उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को बहुत ही अहम टिप्पणी की। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि मौत की सजा का अंजाम तक पहुंचना बहुत महत्वपूर्ण है।

मौत की सजा पाए दोषी जब चाहे तब इसे चुनौती नहीं दे सकते: सुप्रीम कोर्ट

वरिष्ठ पत्रकार जे.पी. सिंह की कलम से

फांसी की सज़ा को लेकर न्यायपालिका विशेषकर उच्चतम न्यायालय के रवैये पर कानून के शासन और संविधान पर विश्वास रखने वाले नागरिकों में बहुत निराशा है,नतीजतन मौके पर ही सज़ा देने यानि माब लिंचिंग या रोड रेज की घटनाओं में तेजी से वृद्धि हुई है।इस पर कोढ़ में खाज कानूनी खामियों की आड़ में फांसी से बचने के पैतरे से आम लोगों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है।इस बीच कानूनी दांवपेच की वजह से निर्भया गैंगरेप के दोषियों की फांसी में हो रही देरी के बीच उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को बहुत ही अहम टिप्पणी की। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि मौत की सजा का अंजाम तक पहुंचना बहुत महत्वपूर्ण है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि ऐसा संदेश नहीं जाना चाहिए कि मौत की सजा ओपन एंडेड है और इसकी सजा पाए कैदी हर समय इसको चुनौती दे सकते हैं। दूसरी तरफ गुरुवार को ही केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा के बाद दोषियों को 7 दिन में फांसी के लिए गाइडलाइन तय करने की मांग वाली याचिका पर जल्द सुनवाई की गुजारिश की।

उच्चतम न्यायालय की यह टिप्पणी ऐसे वक्त में आई है जब निर्भया गैंगरेप और मर्डर केस के 4 दोषी एक के बाद एक याचिका दायर कर रहे हैं जिससे उनकी फांसी में देरी हो रही है। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि यह कानून के हिसाब से होना चाहिए और जजों का समाज व पीड़ितों के प्रति भी कर्तव्य है कि वे न्याय करें।चीफ जस्टिस एस. ए. बोबडे, जस्टिस एस. ए. नजीर और जस्टिस संजीव खन्ना की पीठ ने ये टिप्पणियां मौत की सजा पाए एक प्रेमी जोड़े की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के दौरान की।

यह मामला यूपी में 2008 में एक ही परिवार के 7 लोगों की हत्या से जुड़ा है। परिवार की एक युवती का प्रेम प्रसंग चल रहा था। युवती ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर अपने माता-पिता, 2 भाईयों और भाभियों के साथ-साथ अपने 10 महीने के भतीजे की हत्या कर दी थी। 2015 में उच्चतम न्यायालय ने इस मामले में प्रेमी जोड़े को मौत की सजा पर मुहर लगाई थी।

चीफ जस्टिस एसए बोबड़े ने कहा कि हम ऐसे मामले में दोषी के अधिकारों पर फोकस या जोर नहीं देना चाहते जिसमें 10 महीने के बच्चे सहित सात लोगों की हत्या की गई।शबनम की वकील ने कहा कि उसका जेल में बर्ताव अच्छा है।वह जेल के स्कूल के बच्चों को पढ़ाती है। वह जेल के कई सामाजिक कार्यक्रमों में शामिल होती है। कोर्ट ने वकील से कहा कि आप कह रही हैं कि 10 महीने के बच्चे को मारने के बाद उसके व्यवहार में बदलाव आया है? चीफ जस्टिस ने कहा कि हम समाज के लिए न्याय करते हैं। हम ऐसे अपराधी, जिसको दोषी ठहराया जा चुका है, को माफ नहीं कर सकते क्योंकि उसका दूसरे अपराधियों के साथ व्यवहार अच्छा है।

सात परिजनों की हत्या के जुर्म में मौत की सजा पाए प्रेमी जोड़े की पुनर्विचार याचिका पर उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को अपना फैसला सुरक्षित रख दिया। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि कोई हर चीज के लिए हमेशा नहीं लड़ता रह सकता। सजा-ए-मौत का अंजाम बहुत महत्वपूर्ण है और इसकी सजा पाए कैदियों को इस भ्रम में नहीं रहता चाहिए कि फांसी की सजा ओपन एंडेड है और वे इस पर हर समय सवाल उठा सकते हैं।’

उच्चतम न्यायालय ने यह टिप्पणी उस वक्त की जब सीनियर ऐडवोकेट आनंद ग्रोवर और मीनाक्षी अरोरा ने यह कहते हुए शबनम और उसके प्रेमी सलीम की मौत की फांसी की सजा माफ करने की दलील दी कि उन्हें सुधरने का मौका दिया जाना चाहिए। इसका सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कड़ा विरोध किया। यूपी सरकार की तरफ से कोर्ट में पेश हुए मेहता ने कहा कि अपने मां-बाप को मारकर दोषी दया की गुहार कर रहा है कि अब वह अनाथ हो गया है!

पीठ ने टिप्पणी की कि हर अपराधी के बारे में कहा जाता है कि वह दिल से निर्दोष है लेकिन हमें उसके द्वारा किए गए गुनाह पर भी गौर करना होगा। उच्चतम न्यायालय ने 15 अप्रैल , 2008 को हुए इस अपराध के लिए सलीम और शबनम की मौत की सजा 2015 में बरकरार रखी थी। दोनों मुजरिमों को निचली अदालत ने मौत की सजा सुनाई थी जिसे 2010 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बरकरार रखा था। सलीम और शबनम का प्रेम प्रसंग चल रहा था और वे शादी करना चाहते थे लेकिन महिला का परिवार इसका विरोध कर रहा था।

चीफ जस्टिस बोबडे ने कहा कि हमारे फैसले का सम्मान किया जाना चहिए, मौत की सज़ा को स्वीकार किया जाना चाहिए लेकिन आज कल ऐसा नहीं हो रहा है। मौत की सजा की तार्किक परिणति बेहद जरूरी है और दोषी को इस सोच में नहीं रहना चाहिए कि मौत की सजा हमेशा खुली रहेगी और वो जब चाहे इसे चुनौती दे सकता है, जैसा कि हाल ही की घटनाओं में पता चला है। अंतहीन मुकदमेबाजी की अनुमति नहीं दी जा सकती है।

गौरतलब है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2013 में दोनों को मौत की सजा देने के सेशन कोर्ट के 2010 के फैसले को सही ठहराया था। सलीम और शबनम का एक दूसरे से प्यार था।सलीम बेकार था जबकि शबनम शिक्षामित्र के रूप में एक स्कूल में पढ़ाती थी।वे दोनों शादी करना चाहते थे और शबनम का परिवार इसके सख्त खिलाफ था।

15 अप्रैल 2008 को सलीम और शबनम ने मिलकर पूरे परिवार का गला काटकर हत्या कर दी। शबनम ने राष्ट्रपति से सज़ा माफ़ी की भी गुहार की, लेकिन घटना की वीभत्सता देखते हुए, वहां से भी न तो शबनम की सज़ा माफ़ हुई न कम हुई।साथ ही सलीम को भी वही सज़ा मिली जो शबनम को। उसकी भी माफ़ी याचना पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा अस्वीकार कर दी गई थी।

यूपी के अमरोहा डिस्ट्रिक्ट के बावनखेड़ी गांव में 15 अप्रैल, 2008 को शबनम और उसके प्रेमी सलीम ने मिलकर शबनम के घर में उसके परिवार के सात लोगों की कुल्हाड़ी से काटकर हत्या कर दी थी।मरने वालों में शबनम के मां-बाप, शबनम के दो भाई, शबनम की एक भाभी, शबनम की एक मौसी की बेटी और शबनम का एक भतीजा यानि एक बच्चा था। ये मामला शबनम और सलीम की प्रेम कहानी का है। पहले इन दोनों ने सबके खाने में कुछ मिलाया और उसके बाद एक धारदार कुल्हाड़ी से एक के बाद एक, पूरे परिवार की हत्या कर दी।जिस एक इंसान के साथ शबनम उस रात लगातार कॉल में थी वो दरअसल सलीम ही था। सलीम ने भी अपना जुर्म कबूल कर लिया था और वो कुल्हाड़ी, जिससे क़त्ल किया गया था, वो भी ठीक उसी जगह मिली जहां उसने बताई थी।

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