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वीर सावरकर और राहुल गांधी: इंदिरा जी के राष्ट्रनायक- सोनिया जी के खयलनायक हो गए?

वीर सावरकर और राहुल गांधी

अज्ञानता गुनाह नहीं

   राम कृपाल सिंह

        वीर सावरकर पर राहुल गांधी का बयान उनकी अज्ञानता का सूचक तो है ही, साथ ही एक महान राष्ट्रभक्त का अपमान भी है। राहुल ने कहा कि ” सावरकर अंग्रेजों के सेवक थे और उन्होंने महात्मा गांधी को धोखा दिया।”

क्या यह सच है?

राहुल गांधी की दादी इंदिरा गांधी ने सावरकर पर डाक टिकट जारी किया था। उन्हीं के प्रधानमंत्री काल में सावरकर की अनेक पुस्तकों का प्रकाशन भारत सरकार ने किया। 26 फरवरी 1966 को सावरकर के निधन पर इंदिरा गांधी ने कहा था कि ” सावरकर भारत की एक महान विभूति थे।वे एक महान देशभक्त और आदर्श क्रांतिकारी थे।”

दादी का महान क्रांतिकारी पोते तक आते-आते अंग्रेजों का सेवक हो गया। क्यों? इसका विवरण बाद में।

राहुल ने कहा सावरकर ने गांधी को धोखा दिया- हो सकता है कि वह अपनी समझ से सच कह रहे हों लेकिन इतिहास तो कुछ और ही कहता है।

मार्च 1927 को महात्मा गांधी रत्नागिरी (महाराष्ट्र)आए। अपनी सभा में ही उन्होंने सावरकर से मिलने की इच्छा प्रकट की। सावरकर उस समय बीमार थे। वे गांधी से मिलने नहीं आ सके तो महात्मा गांधी कस्तूरबा के साथ स्वयं उनसे मिलने गए। सावरकर की पत्नी यमुनाबाई ने लिखा है कि “उन दोनों की 90 मिनट वार्ता हुई और इतनी देर कस्तूरबा उनके साथ रसोई में थी और बातें करती रहीं।”

सावरकर ही शायद भारत के एकमात्र ऐसे नेता थे जिसे क्रांति की प्रत्येक धारा के लोगों ने सम्मान दिया। महात्मा गांधी तो उनके संपर्क में रहे ही, भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारी भी उनसे मिलने गए। और सुभाष चंद्र बोस ने सिंगापुर के अपने भाषण में कहा था कि ” भारत में सिर्फ एक सावरकर ही थे जिन्होंने आजाद हिंद फौज में सैनिकों की भर्ती में मेरी मदद की।” यहां यह भी बता दें कि सुभाष चंद्र बोस ने जब यह भाषण दिया, उस समय भारत में अंग्रेजों का शासन था।

भारत की शीर्ष गायिका लता मंगेशकर ने सावरकर को हमेशा देवतुल्य सम्मान दिया। लता जी के पिता श्री दीनानाथ मंगेशकर की मृत्यु के बाद परिवार के संरक्षक सावरकर ही थे। लता मंगेशकर ने एक इंटरव्यू में कहा था कि ” मुझे राष्ट्रप्रेम के संस्कार मेरे पाल्य पिता सावरकर से ही मिले थे।”

जहां तक रिहाई के लिए सावरकर को अपने को निर्दोष बताते हुए आवेदन की बात है तो वह भी गलत नहीं है। क्रांतिकारी सत्याग्रही नहीं होते थे कि वे जेल में रहकर अपना उद्देश्य भूल जाएं और जेल में अपने को सड़ाते रहें। वे किसी भी तरह बाहर आकर अपने उद्देश्य में फिर जुट जाना चाहते थे।

सावरकर ने अपनी रिहाई की पेटीशन गांधीजी की सलाह पर दिया। इस संबंध में 18 जनवरी 1920 को गांधी जी ने सावरकर को पत्र लिखा था किंतु उसके बाद भी जब सावरकर को माफी नहीं मिली तो गांधी जी ने 26 मई 1920 को ब्रिटिश सरकार को लिखा कि” बहुत से कैदियों को माफी मिली लेकिन सावरकर को नहीं मिली। मैं इसके लिए बराबर संघर्ष करता रहूंगा।”

    सावरकर को ब्रिटिश सरकार ने क्यों नहीं छोड़ा- उसका भी कारण है। सावरकर के पत्र पर ब्रिटिश अधिकारी आर.एच. कैंडी ने अपनी गोपनीय रिपोर्ट सरकार को दी थी कि ” सावरकर का माफीनामा बिल्कुल ढोंग है। उसको अपने किए का न कोई पश्चाताप है, न खेद है। वह किसी भी तरह बाहर निकल कर फिर अराजकतावादियों को संगठित कर सरकार के खिलाफ विद्रोह करेगा।” और उसकी इसी रिपोर्ट के कारण सावरकर काला पानी से नहीं छूट पाए।

यह भी एक रणनीति है जिसे शिवाजी से लेकर फिदेल क्रैस्टो और चेग्वेरा तक ने अपनाया।

अब प्रश्न उठता है कि इंदिरा गांधी की नजरों में जो महान देशभक्त था, वह आज राष्ट्र विरोधी कैसे हो गया? तो इसकी शुरुआत होती है सोनिया गांधी से जिन्होंने संसद में वीर सावरकर का चित्र लगाने का विरोध किया था।

      यहां मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि सोनिया गांधी ने सावरकर का नाम भी नहीं सुना होगा। सोनिया गांधी की कभी घनिष्ठ मित्र रही पत्रकार तवलीन सिंह ने अपनी आत्मकथा- ‘दरबार’ में लिखा है कि “सोनिया गांधी को पढ़ने- लिखने का कोई शौक नहीं। यहां तक कि वह अखबार भी नहीं पढ़तीं।”

जो व्यक्ति कुछ पढ़ेगा ही नहीं, तो वह सावरकर या किसी के भी विषय में जानेगा कैसे?

वास्तविकता यह है कि सोनिया को राजनैतिक सलाह कैथोलिक चर्च के मुख्यालय से मिलती है और अमल उसी पर होता है।

अभी कुछ समय पूर्व तक सोनिया जी के प्रमुख सलाहकारों की सूची देखिए- ऑस्कर फर्नांडीस, ए.के. एंटोनी, विसेंट जॉर्ज आदि ।

बहुत से लोगों को याद होगा कि मध्य प्रदेश के चुनाव के बाद अर्जुन सिंह मुख्यमंत्री बने और अगले ही दिन उनसे इस्तीफा लेकर उन्हें उस समय सुलगते पंजाब का गवर्नर बनाकर भेज दिया गया था क्योंकि उन्होंने एक क्रिश्चियन मंत्री को पुनः सरकार में लेने से मना कर दिया था क्योंकि उसके ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप थे।

इसके अलावा चर्च की ही सिफारिश पर एम.जी. रामचंद्रन को भारत रत्न (इसकी एक लंबी कहानी है) या आंध्र में ईसाई मुख्यमंत्री- यह सब विवरण बहुत विस्तृत है।

और कैथोलिक चर्च की नाराजगी सावरकर से क्यों? क्योंकि सावरकर हिंदू महासभा के अध्यक्ष भी थे और वे ऐसा भारत चाहते थे जहां हिंदू संस्कृति का प्रभुत्व हो।

क्या कोई चर्च, पादरी या कट्टर ईसाई इसे सहन करेगा?

यही कारण है कि इंदिरा जी के राष्ट्रनायक- सोनिया जी के खयलनायक हो गए।

सावरकर के बारे में कांग्रेस की सोच में इस यू टर्न परिवर्तन का कोई और कारण हो सकता है क्या?

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